
भोपाल। मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले में आदिवासी छात्रों की नई पीढ़ी ने अपनी समस्याओं को लेकर जिस तरह खुलकर आवाज उठाई है, उसने प्रशासन और शिक्षा व्यवस्था दोनों के सामने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सेंधवा क्षेत्र के एकलव्य आदर्श विद्यालय, जामली के छात्र-छात्राएं सोमवार दोपहर करीब 12 बजे अपनी विभिन्न समस्याओं को लेकर जिला मुख्यालय बड़वानी पहुंचने के लिए पैदल मार्च पर निकल पड़े। स्कूल से बड़वानी की दूरी करीब 62 किलोमीटर है, लेकिन छात्रों का कहना था कि जब उनकी शिकायतें सुनने वाला कोई नहीं है तो वे सीधे कलेक्टर के सामने अपनी बात रखेंगे। हाथों में किताबों की जगह अधिकारों और समस्याओं से जुड़े पोस्टर लिए छात्र सड़क पर निकले तो यह केवल एक सामान्य प्रदर्शन नहीं था, बल्कि नई पीढ़ी की उस बदलती सोच का प्रदर्शन था, जो अब सवाल पूछना जानती है और जवाब भी चाहती है।
छात्रों का यह पैदल मार्च सेंधवा से करीब 18 किलोमीटर दूर पहुंचने के बाद प्रशासन और पुलिस ने रोक लिया। सूचना मिलते ही प्रशासनिक अमले में हलचल मच गई। एसडीएम, एसडीओपी, तहसीलदार और अन्य अधिकारी मौके पर पहुंचे और बच्चों को समझाने का प्रयास किया। अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन दिया कि उनकी समस्याएं सुनी जाएंगी और उचित कार्रवाई की जाएगी। हालांकि छात्र शुरुआत में इस बात पर अड़े रहे कि वे अपनी बात सीधे जिला कलेक्टर के सामने ही रखेंगे। उनका कहना था कि वे लंबे समय से कई समस्याओं का सामना कर रहे हैं और अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि समाधान चाहते हैं।
छात्रों का यह पैदल मार्च सेंधवा से करीब 18 किलोमीटर दूर पहुंचने के बाद प्रशासन और पुलिस ने रोक लिया। सूचना मिलते ही प्रशासनिक अमले में हलचल मच गई। एसडीएम, एसडीओपी, तहसीलदार और अन्य अधिकारी मौके पर पहुंचे और बच्चों को समझाने का प्रयास किया। अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन दिया कि उनकी समस्याएं सुनी जाएंगी और उचित कार्रवाई की जाएगी। हालांकि छात्र शुरुआत में इस बात पर अड़े रहे कि वे अपनी बात सीधे जिला कलेक्टर के सामने ही रखेंगे। उनका कहना था कि वे लंबे समय से कई समस्याओं का सामना कर रहे हैं और अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि समाधान चाहते हैं।
हम गूगल पर दुनिया देखते हैं, अपना हक भी जानते हैं
प्रदर्शन कर रहे छात्रों की बातों में सबसे खास बात यह रही कि वे अपनी पीढ़ी और बदलते दौर को लेकर पूरी तरह जागरूक नजर आए। छात्रों का कहना था कि आज की पीढ़ी केवल डांट सुनकर या दबाव में आकर चुप बैठने वाली नहीं है। एक छात्र ने कहा, "हम गूगल पर दुनिया देखते हैं, हम जानते हैं कि हमारा हक क्या है। अब हम अपनी समस्याओं को लेकर चुप नहीं बैठेंगे।" छात्रों का कहना था कि उन्हें अच्छी शिक्षा और सुरक्षित वातावरण का अधिकार है तथा हॉस्टल में रहने वाले बच्चों को बुनियादी सुविधाएं मिलना कोई विशेष सुविधा नहीं, बल्कि उनका अधिकार है।
छात्रों का आरोप है कि हॉस्टल और स्कूल परिसर में उन्हें कई बुनियादी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इनमें साफ पेयजल, गुणवत्तापूर्ण भोजन और बेहतर शैक्षणिक सुविधाओं की कमी प्रमुख रूप से शामिल है। छात्रों ने स्मार्ट क्लास की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि एकलव्य आदर्श विद्यालयों की स्थापना आदिवासी बच्चों को बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई है, लेकिन यदि यहां पढ़ने वाले बच्चों को बुनियादी सुविधाओं के लिए भी संघर्ष करना पड़े तो व्यवस्था के दावों पर सवाल खड़े होते हैं।
जातिगत भेदभाव के गंभीर आरोप
छात्रों ने केवल सुविधाओं की कमी का मुद्दा नहीं उठाया, बल्कि कुछ गंभीर आरोप भी लगाए हैं। उनका कहना है कि उनके साथ कथित रूप से जातिगत भेदभाव किया जाता है और उन्हें उनकी जाति का नाम लेकर संबोधित किया जाता है। छात्रों ने कथित गालीगलौज और प्रताड़ना के आरोप भी लगाए हैं। प्रदर्शन कर रहे बच्चों का कहना था कि वे ऐसे व्यवहार को अब सामान्य मानकर चुप नहीं रहेंगे। उनका स्पष्ट कहना था कि शिक्षा के संस्थान में सम्मानजनक और सुरक्षित वातावरण मिलना जरूरी है और किसी भी छात्र के साथ उसकी सामाजिक या जातिगत पहचान के आधार पर भेदभाव स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इन आरोपों ने मामले को और गंभीर बना दिया है। छात्रों का कहना था कि वे पढ़ाई करने और अपना भविष्य बनाने के लिए स्कूल और हॉस्टल में रह रहे हैं, लेकिन यदि वहीं उन्हें अपमान और प्रताड़ना का सामना करना पड़े तो इसका असर उनकी पढ़ाई और मानसिक स्थिति दोनों पर पड़ता है। छात्रों ने प्रशासन से मांग की कि उनकी शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
62 किलोमीटर की दूरी भी नहीं रोक सकी बच्चों का इरादा
जामली से बड़वानी तक करीब 62 किलोमीटर की दूरी तय करने का फैसला आसान नहीं था। छात्र-छात्राएं पैदल ही जिला मुख्यालय पहुंचने की तैयारी के साथ निकले थे। इस दौरान उनके हाथों में अलग-अलग मांगों और अधिकारों से जुड़े पोस्टर थे। बच्चे सड़क पर थे और उनका एक ही उद्देश्य था- कलेक्टर तक अपनी आवाज पहुंचाना। यह दृश्य इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि प्रदर्शन करने वाले अधिकतर बच्चे उस आदिवासी समाज से आते हैं, जिसकी शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं को लेकर लंबे समय से सरकारी योजनाएं और विशेष संस्थान संचालित किए जा रहे हैं।
छात्रों के इस कदम ने यह भी संकेत दिया कि डिजिटल दौर की नई पीढ़ी अब अपने अधिकारों और व्यवस्था के प्रति पहले की तुलना में कहीं अधिक जागरूक है। मोबाइल और इंटरनेट के जरिए दुनिया से जुड़ने वाली यह पीढ़ी अपने साथ होने वाले व्यवहार की तुलना व्यापक सामाजिक और कानूनी अधिकारों से कर रही है। यही वजह है कि छात्रों ने अपनी बात रखते हुए कहा कि वे जानते हैं कि अच्छी शिक्षा, सम्मान और बुनियादी सुविधाएं उनका अधिकार हैं।
प्रशासन ने रास्ते में रोका, अधिकारी मनाने में जुटे
छात्रों के पैदल मार्च की जानकारी मिलते ही प्रशासनिक अधिकारी सक्रिय हो गए। सेंधवा से करीब 18 किलोमीटर दूर छात्रों को रोक लिया गया। मौके पर पहुंचे अधिकारियों ने छात्र-छात्राओं से बातचीत की और उन्हें समझाने की कोशिश की। अधिकारियों का प्रयास था कि बच्चे इतनी लंबी दूरी पैदल तय न करें और उनकी समस्याओं का स्थानीय स्तर पर ही समाधान निकाला जाए।
लेकिन छात्र इस बात पर जोर देते रहे कि वे अपनी बात जिले के सबसे बड़े प्रशासनिक अधिकारी के सामने रखना चाहते हैं। उनका कहना था कि उनकी समस्याएं गंभीर हैं और वे चाहते हैं कि कलेक्टर स्वयं उनकी शिकायतें सुनें। काफी बातचीत के बाद प्रशासन ने बच्चों को भरोसा दिलाया कि उनकी बात उच्च स्तर तक पहुंचाई जाएगी और मामले को गंभीरता से लिया जाएगा।
टीएल बैठक खत्म होते ही जुलवानिया पहुंचीं कलेक्टर जयंती सिंह
मामले की जानकारी मिलने के बाद बड़वानी कलेक्टर जयंती सिंह ने इसे गंभीरता से लिया। बताया गया कि कलेक्टर टीएल बैठक समाप्त होने के बाद बड़वानी से जुलवानिया के लिए रवाना हुईं। जुलवानिया कन्या हाई स्कूल परिसर में उन्होंने छात्र-छात्राओं से मुलाकात की और एक-एक कर उनकी समस्याएं सुनीं। बच्चों ने हॉस्टल की सुविधाओं, पढ़ाई की व्यवस्था, भोजन और पानी के साथ-साथ कथित जातिगत भेदभाव और प्रताड़ना से जुड़े आरोप भी उनके सामने रखे।
कलेक्टर जयंती सिंह ने छात्रों को आश्वासन दिया कि उनकी शिकायतों की जांच कराई जाएगी और तथ्यों के आधार पर कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि बच्चों की समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि जिले के सभी बच्चों को बेहतर शिक्षा और सुरक्षित वातावरण मिले।
कलेक्टर बोलीं- जांच में जो तथ्य आएंगे, उस पर त्वरित कार्रवाई होगी
छात्रों से चर्चा के बाद कलेक्टर ने कहा, "छात्रों की सभी समस्याएं सुनी गई हैं। इस संबंध में एक जांच कमेटी गठित की गई है। कमेटी की जांच में जो तथ्य सामने आएंगे, उस पर त्वरित कार्रवाई की जाएगी।"
कलेक्टर ने कहा कि ये बच्चे जिले के बच्चे हैं और प्रशासन की पूरी संवेदना उनके साथ है। उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन चाहता है कि सभी बच्चे बेहतर वातावरण में अच्छी शिक्षा ग्रहण करें और उनकी किसी भी वास्तविक समस्या का समय पर समाधान हो। कलेक्टर के आश्वासन के बाद छात्रों को जांच और उचित कार्रवाई का भरोसा दिलाया गया।
एकलव्य स्कूलों की व्यवस्था पर उठे सवाल
एकलव्य आदर्श विद्यालयों की स्थापना का उद्देश्य विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराना है। ऐसे में जामली के छात्र-छात्राओं द्वारा स्मार्ट क्लास, साफ पानी, गुणवत्तापूर्ण भोजन और हॉस्टल की अन्य सुविधाओं को लेकर उठाई गई आवाज ने व्यवस्था की जमीनी स्थिति पर सवाल खड़े किए हैं। यदि छात्र लगातार इन सुविधाओं की कमी महसूस कर रहे हैं तो जांच में यह भी सामने आना जरूरी होगा कि उपलब्ध संसाधनों और व्यवस्थाओं में कमी कहां है और उसकी जिम्मेदारी किसकी है।
जातिगत भेदभाव के आरोपों की जांच भी इस मामले का सबसे संवेदनशील पक्ष होगी। शिक्षा संस्थानों को बच्चों के लिए समानता, सम्मान और सुरक्षा का स्थान माना जाता है। ऐसे में यदि किसी छात्र के साथ जाति के आधार पर अपमानजनक व्यवहार किए जाने के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता के संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा गंभीर मामला होगा।
नई पीढ़ी की बदलती तस्वीर, अब सवालों से पीछे नहीं हटेंगे छात्र
बड़वानी के सेंधवा क्षेत्र में छात्रों का यह प्रदर्शन आदिवासी समाज की नई पीढ़ी में बढ़ती जागरूकता की तस्वीर भी पेश करता है। एक समय अपनी समस्याओं को अधिकारियों तक पहुंचाने के लिए दूसरों पर निर्भर रहने वाले समुदायों के बच्चे अब स्वयं संगठित होकर सवाल उठा रहे हैं। वे केवल शिकायत नहीं कर रहे, बल्कि व्यवस्था से जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।
छात्रों का यह पैदल मार्च भले ही 18 किलोमीटर आगे बढ़ने के बाद रोक दिया गया, लेकिन उनके सवाल जिला प्रशासन तक पहुंच चुके हैं। अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी जांच कमेटी और प्रशासन पर है कि बच्चों के आरोपों की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जाए। छात्र-छात्राओं को दिए गए आश्वासन का असर तभी दिखाई देगा, जब जांच के बाद समस्याओं का समाधान होगा और जरूरत पड़ने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई भी की जाएगी।
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