
आगरा- आगरा के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में 25 जनवरी को होने वाली 'संवैधानिक अधिकार बचाओ, भाईचारा बनाओ महारैली' दलित और वंचित समाज के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होने जा रही है। आज़ाद समाज पार्टी के संस्थापक नगीना सांसद चन्द्रशेखर आज़ाद ने इस महारैली को अपनी भावुक अपील के माध्यम से एक ऐतिहासिक अवसर के रूप में रेखांकित किया है, जो भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर की 70 वर्ष पूर्व की सभा से प्रेरित है। आज़ाद ने कहा कि यह उनके लिए मात्र एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक अवसर है। वे बाबासाहेब के अनुयायी के रूप में रामलीला मैदान से ही अपनी बात रखेंगे, जहां अंबेडकर ने समाज के दर्द को साझा किया था।
आपको बता दें, 18 मार्च 1956 को डॉ. अंबेडकर आगरा के रामलीला मैदान में शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के 15वें अधिवेशन में हिस्सा लेने आए थे। इसी मैदान पर उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने का संकेत दे दिया था। उन्होंने शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के अधिवेशन में भारी मन से कहा था कि "मुझे पढ़े लिखे लोगों ने धोखा दे दिया। पढे़ लिखे लोग मेरे काम में हाथ बटाएंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं।"
आज़ाद ने अपील में महारैली को संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और भाईचारे की मजबूती का प्रतीक बताया। "यह मेरी बड़ी चाहत है, बड़ी सिद्दत से किया गया इंतजार है, उस दिन का, जब मैं आप सभी के बीच आगरा के रामलीला मैदान में उपस्थित होऊंगा, उसी ऐतिहासिक स्थल पर, जहां हमारे मसीहा, देश के नायक, देश को एकता के सूत्र में पिरोने वाले, भारतीय संविधान के निर्माता, राष्ट्र के गौरव, भारत रत्न डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर जी स्वयं पहुंचे थे।" उन्होंने जोर देकर कहा कि बाबासाहेब ने अपने दर्द को समाज के साथ साझा किया था और वहां से क्रांति के बीज पैदा हुए। "मैं छोटा सा सिपाही हूं कमजोर वर्ग का... आज की परिस्थिति में जो आज महसूस करता हूं अपने हक वंचित शोषित समाज के सामने रखूंगा। हम सबके मसीहा, देश के नायक, एकता के सूत्र में पिरोने वाले राष्ट्र के गौरव बाबासाहेब पहुंचे थे।" अपील में सभी से भागीदारी की अपील की गई है। यह महारैली वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक चुनौतियों के बीच संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने का संकल्प लेगी।
सेवानिवृत्त आई.पी.एस. एस.आर. दरापुरी लिखते हैं, डॉ. अंबेडकर ने अपने ऐतिहासिक भाषण में अपने अनुभवों को साझा किया और भविष्य की रणनीति प्रस्तुत की। इस भाषण में उन्होंने समाज के विभिन्न वर्गों को संबोधित किया।
बहुजन समुदाय को संबोधित करते हुए बाबा साहब ने कहा था, "पिछले तीस वर्षों से आप लोगों के राजनैतिक अधिकार के लिये मै संघर्ष कर रहा हूँ। मैने तुम्हें संसद और राज्यों की विधान सभाओं में सीटों का आरक्षण दिलवाया। मैंने तुम्हारे बच्चों की शिक्षा के लिये उचित प्रावधान करवाये। आज, हम प्रगित कर सकते है। अब यह तुम्हारा कर्त्तव्य है कि शैक्षणिक, आथिर्क और सामाजिक गैर बराबरी को दुर करने हेतु एक जुट होकर इस संघर्ष को जारी रखें। इस उद्देश्य हेतु तुम्हें हर प्रकार की कुर्बानियों के लिये तैयार रहना होगा, यहाँ तक कि खून बहाने के लिये भी।"
युवाओं और छात्रों के लिए उनका सन्देश था, " मेरी छात्रों से अपील है की शिक्षा प्राप्त करने के बाद किसी प्रकार कि क्लर्की करने के बजाय उसे अपने गांव की अथवा आस-पास के लोगों की सेवा करना चाहिये। जिससे अज्ञानता से उत्पन्न शोषण एवं अन्याय को रोका जा सके। आपका उत्थान समाज के उत्थान में ही निहित है।" आज मेरी स्थिति एक बड़े खंभे की तरह है, जो विशाल टेंटों को संभाल रही है। मै उस समय के लिये चिंतित हूँ कि जब यह खंभा अपनी जगह पर नहीं रहेगा। मेरा स्वास्थ ठीक नहीं रहता है। मै नहीं जानता, कि मै कब आप लोगों के बीच से चला जाऊँ। मै किसी एक ऐसे नवयुवक को नहीं ढूंढ पा रहा हूँ, जो इन करोड़ों असहाय और निराश लोगों के हितों की रक्षा करें। यदि कोई नौजवान इस जिम्मेदारी को लेने के लिये आगे आता है, तो मै चैन से मर सकूंगा।"
सरकारी कर्मचारियों को संबोधित करते हुए बाबा साहब बोले, " हमारे समाज में शिक्षा में कुछ प्रगति हुई है। शिक्षा प्राप्त करके कुछ लोग उच्च पदों पर पहूँच गये है। परन्तु इन पढ़े लिखे लोगों ने मुझे धोखा दिया है। मै आशा कर रहा था कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे समाज की सेवा करेंगे। किन्तु मै क्या देख रहा हूँ कि छोटे और बडे क्लर्कों कि एक भीड़ एकत्रित हो गई है, जो अपनी तौदे (पेट)भरने में व्यस्त है। वे जो शासकीय सेवाओं में नियोजित है, उनका कर्तव्य है कि उन्हें अपने वेतन का 20 वां भाग (5 प्रतिशत )स्वेच्छा से समाज सेवा के कार्य हेतु देना चाहिये। तब ही समाज प्रगति करेगा अन्यथा केवल एक ही परिवार का सुधार होगा। एक वह बालक जो गांव में शिक्षा प्राप्त करने जाता है।,संपूर्ण समाज की आशाएं उस पर टिक जाती है। एक शिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता उनके लिये वरदान साबित हो सकता है।"
भूमिहीन मजदूरों के लिए उनका सन्देश था, "मै गाँव में रहने वाले भूमिहीन मजदूरों के लिये काफी चिंतित हूँ। मै उनके लिये ज्यादा कुछ नहीं कर पाया हूँ। मै उनकी दुख तकलीफों को सहन नहीं कर पा रहा हूँ। उनकी तबाहियों का मुख्य कारण यह है कि उनके पास जमीन नहीं है। इसलिए वे अत्याचार और अपमान के शिकार होते हें, वे अपना उत्थान नहीं कर पायेंगे। मै इसके लिये संघर्ष करूंगा। यदि सरकार इस कार्य में कोई बाधा उत्पत्र करती है तो मै इन लोगों का नेतृत्व करूंगा और इनकी वैधानिक लड़ाई लडूँगा ।लेकिन किसी भी हालात में भूमिहीन लोगों को जमीन दिलवाने का प्रयास करूंगा।"
उस एतिहासिक भाषण में बाबा साहब ने बौध धर्म अपनाने की भी घोषणा की थी. उन्होंने कहा, "बहुत जल्दी ही मै तथागत बुद्ध के धर्म को अंगीकार कर लूंगा। यह प्रगतिवादी धर्म है। यह समानता, स्वतंत्रता एवं बंधुत्व पर आधारित है। मै इस धर्म को बहुत सालों के प्रयासों के बाद खोज पाया हूँ। अब मै जल्दी ही बुद्धिस्ट बन जाऊंगा। तब एक अछूत के रूप में मै आपके बीच नहीं रह पाऊँगा लेकिन एक सच्चे बुद्धिस्ट के रूप में तुम लोगों के कल्याण के लिये संघर्ष जारी रखूंगा। मै तुम्हें अपने साथ बुद्धिस्ट बनने के लिये नहीं कहूंगा क्योंकि मै अंधभक्त नहीं चाहता । केवल वे लोग ही जिन्हें इस महान धर्म की शरण में आने की तमत्रा है, बौद्ध धर्म अंगीकार कर सकते है, जिससे वे इस धर्म में दंद विशवास साथ रहे और इसके आचरण का अनुसरण करें।"
बौद्ध धर्म स्वीकार करने से सात महीने पहले उन्होंने उसी दिन चक्की पाट में पूर्वोदय बुद्ध विहार में भगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थापित की। उसी दिन से चक्कीपाट का नाम बुद्ध विहार पड़ गया।
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