धर्मेंद्र प्रधान के बाद अब राजस्थान के शिक्षा मंत्री की बारी, गुस्साए शिक्षकों ने दिल्ली कूच का एलान किया

तृतीय श्रेणी शिक्षक सबसे ज्यादा पीड़ित, 6 साल से रुकी प्रमोशन, सियाराम संघ ने दिल्ली मार्च का ऐलान किया
राजस्थान के सरकारी स्कूलों में छात्र हैं तो शिक्षक पद खाली हैं और जहां दोनों हैं वहां स्कूल जर्जर हैं, चारदीवारी, बिजली, पानी, मूत्रालय-शौचालय तक नहीं हैं।
राजस्थान के सरकारी स्कूलों में छात्र हैं तो शिक्षक पद खाली हैं और जहां दोनों हैं वहां स्कूल जर्जर हैं, चारदीवारी, बिजली, पानी, मूत्रालय-शौचालय तक नहीं हैं।
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जयपुर- केंद्र के पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के बाद अब राजस्थान के शिक्षा मंत्री से नाराज सरकारी शिक्षकों ने दिल्ली कूच का एलान कर दिया है। राजस्थान शिक्षक संघ (सियाराम) ने साफ चेतावनी दी है कि शिक्षकों की लंबित मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई नहीं हुई तो हजारों शिक्षक दिल्ली पहुंचकर प्रधानमंत्री को शिक्षा विभाग में स्थानांतरण, प्रमोशन, काउंसलिंग और पदस्थापन व्यवस्था के नाम पर चल रहे भ्रष्टाचार का काला चिट्ठा सौंपेंगे।

मंगलवार को संघ के प्रांतीय कार्यालय में संरक्षक मंडल एवं स्थाई समिति के सदस्यों की संयुक्त विचार गोष्ठी मुख्य संरक्षक व प्रशासनिक अध्यक्ष सियाराम शर्मा के सानिध्य तथा प्रदेश अध्यक्ष वीरेन्द्र शर्मा की अध्यक्षता में संपन्न हुई। गोष्ठी की शुरुआत में शिक्षकों की विभिन्न मांगों और समस्याओं पर विस्तार से चर्चा हुई। वक्ताओं ने स्पष्ट कहा कि राजस्थान में शिक्षा विभाग की धरातलीय विषम परिस्थितियों में सुधार नहीं किया गया तो शिक्षकों का मार्च दिल्ली कूच करेगा। संगठन ने तृतीय श्रेणी अध्यापकों के स्थानांतरण और प्रमोशन की मांग को लेकर 5 अगस्त को जयपुर में आयोजित कूच-धरना-प्रदर्शन को अपना पूर्ण नैतिक समर्थन देने की घोषणा की।

वक्ताओं ने कहा कि सरकारी स्कूलों में सर्वाधिक कर्मठ कर्मचारी तृतीय श्रेणी अध्यापक ही हैं, जो स्कूलों में 48 पीरियड लेने वाले इकलौते कर्मचारी होने के साथ-साथ विभिन्न सर्वे, एसआईआर, बीएलओ, शिविरों में भागीदारी, एमडीएम प्रभारी सहित कई गैर-शैक्षणिक कार्यों से परेशान हैं। राजस्थान सरकार में उनकी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं है। तृतीय श्रेणी अध्यापकों का न तो इच्छित स्थान पर पदस्थापन हेतु स्थानांतरण हो रहा है और न ही पदोन्नति दी जा रही है। पदोन्नति प्रक्रिया पिछले छह साल से रुकी हुई है। तृतीय वेतन श्रृंखला अध्यापक पद से कार्यग्रहण करने वाले मास्टरसाब उसी पद से सेवानिवृत्त हो रहे हैं, जबकि उनके पढ़ाए शिष्य उनके अफसर बनकर हुकुम चला रहे हैं।

राजस्थान भर में सरकारी स्कूलों की बदहाल दशा ओर दिशा पर चिन्तन करते हुए शिक्षकों ने कहा कि शिक्षा विभाग अधिकारियों के भ्रष्ट आचरण ओर तरीकों से पटरी से उतर गया हैं ।
राजस्थान भर में सरकारी स्कूलों की बदहाल दशा ओर दिशा पर चिन्तन करते हुए शिक्षकों ने कहा कि शिक्षा विभाग अधिकारियों के भ्रष्ट आचरण ओर तरीकों से पटरी से उतर गया हैं ।

स्कूल जर्जर, मूत्रालय-शौचालय तक नहीं

यथास्थान पदोन्नति पर कार्यग्रहण भ्रष्टाचार का बीज बन गया है। एक ओर उप प्रधानाचार्य और प्रधानाचार्य के पद तीन से पांच गुना बढ़ गए हैं, वहीं दूसरी ओर दूरस्थ ग्रामीण अंचलों के सैकड़ों स्कूल संस्था प्रधान के इंतजार में हैं। सत्र 2016 से उप प्रधानाचार्य-प्रधानाचार्य को पुनः पदनावत करने के न्यायालय निर्णय की तलवार भी एक साल बाद लटक रही है। 180 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी अधिकारियों के निकम्मेपन और तुगलकी आदेशों से सिस्टम लचर हो रहा है। प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष नवीन कुमार शर्मा ने बताया कि संगठन पिछले एक वर्ष से शिक्षकों की लंबित मांगों को लेकर आंदोलनरत है।

उन्होंने कहा कि शिक्षा विभाग अधिकारियों के भ्रष्ट आचरण से पटरी से उतर चुका है। आज डेढ़ लाख शिक्षकों के विभिन्न संवर्ग के पद रिक्त हैं, लेकिन सरकार स्टाफिंग पैटर्न और नामांकन वृद्धि का रोना रो रही है। स्कूलों में छात्र हैं तो शिक्षक पद खाली हैं और जहां दोनों हैं वहां स्कूल जर्जर हैं, चारदीवारी, बिजली, पानी, मूत्रालय-शौचालय तक नहीं हैं। पीईईओ-प्रधानाचार्य हजार हाथों वाले जीव बनकर फाइलों और कागजों में कैद हो गए हैं। हर आदेश प्रशासन से लेकर शिक्षा विभाग तक उन्हीं के भरोसे है। आए दिन वीसी-मीटिंग के अलावा जनगणना, पशु गणना, सर्वे, स्कूल सेफ्टी ऑडिट, ड्रॉपआउट, आधार-जनाधार ऑथेंटिकेशन, बैंक खातों से लिंक, वर्कबुक, पालनहार, आपकी बेटी योजना, निःशुल्क पाठ्य पुस्तकें, गणवेश, साइकिल, ट्रांसफर वाउचर, छात्रवृत्तियां, गार्गी योजना जैसी तमाम योजनाओं की वर्षों बाद मिनमेख निकालकर जांचें होती हैं।

स्कूली शिक्षा विभाग में 1.50 लाख पद खाली हैं। स्टाफिंग पैटर्न, नामांकन वृद्धि और नव-क्रमोन्नत विद्यालयों में व्याख्याता, वरिष्ठ अध्यापक पदों को शामिल करें तो यह आंकड़ा 2.19 लाख तक पहुंच जाता है।

वृक्षारोपण अभियान के नाम पर एक ठेला भी जारी नहीं होता। बजट आवंटन ग्राम पंचायत को होता है, काम सरकारी स्कूलों से कराया जाता है। जनजाति टीएसपी परिक्षेत्र में स्थानीय परिस्थितियों में भामाशाह उपलब्ध नहीं होते। वन विभाग की नर्सरी से 10-15 रुपये प्रति पौधे के लिए जाना पड़ता है, फिर ट्रक-ट्रैक्टर में लवाई-भाड़ा, चढ़ाई-उतराई, गड्ढे खुदाई, गैंती-फावड़े सहित कई संसाधनों पर खर्च होता है। एक शिक्षक को 100 पौधे यानी हजार रुपये और प्रति बालक-बालिका 15 पौधे यानी 150 रुपये प्रति विद्यार्थी खर्च हो रहे हैं। राज्य सरकार को निःशुल्क पौधे उपलब्ध कराने चाहिए। वृक्षारोपण के तुगलकी आदेशों को वापस लेने की मांग की गई क्योंकि आदेश शिक्षा विभाग को जारी किए जाते हैं। बजट आवंटन लाखों रुपये ग्राम पंचायत को दिए जाते हैं, लेकिन सरपंच कोई राशि नहीं देते उल्टे समारोह में पगड़ी-शाल-माल्यार्पण-श्रीफल भेंट में हजारों का खर्चा अलग से आता है। स्कूली शिक्षा विभाग में 1.50 लाख पद खाली हैं। स्टाफिंग पैटर्न, नामांकन वृद्धि और नव-क्रमोन्नत विद्यालयों में व्याख्याता, वरिष्ठ अध्यापक पदों को शामिल करें तो यह आंकड़ा 2.19 लाख तक पहुंच जाता है।

संगठन ने उप शाखा और जिला स्तर पर प्रदर्शन, ज्ञापन, जिला मुख्यालयों पर सद्बुद्धि यज्ञ तथा रामगंजमंडी में विशाल शिक्षक रैली का आयोजन किया, लेकिन शिक्षा मंत्री और विभाग ने मांग पत्र पर अब तक कोई सकारात्मक रवैया नहीं अपनाया। संघर्ष समिति के संयोजक उम्मेद सिंह डूडी ने बताया कि शिक्षा, शिक्षार्थियों और शिक्षकों की मांगों को लेकर शिक्षा मंत्री के उदासीन व तानाशाहीपूर्ण रवैये के विरोध में संगठन आगामी दिनों में हजारों शिक्षकों के साथ दिल्ली कूच करेगा।

बैठक में पीईईओ सहित शिक्षा विभाग के अधिकारियों द्वारा प्रति माह चार रात्रि विश्राम गांवों में करने के हालिया आदेश को पूर्णतया अव्यावहारिक बताते हुए वापस लेने की मांग की गई। विचार गोष्ठी में संगठन के सदस्यता अभियान, कार्यकर्ताओं के अभ्यास वर्ग, प्रवास कार्यक्रम और संगठनात्मक मुद्दों पर भी चर्चा हुई।

राजस्थान के सरकारी स्कूलों में छात्र हैं तो शिक्षक पद खाली हैं और जहां दोनों हैं वहां स्कूल जर्जर हैं, चारदीवारी, बिजली, पानी, मूत्रालय-शौचालय तक नहीं हैं।
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