वंदे मातरम् और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का सवाल

भारत सिर्फ दुर्गा को पूजने वालों का देश नहीं है। इस देश में आदिवासियों की एक बड़ी आबादी ऐसी भी है, जिनकी सांस्कृतिक स्मृतियों में महिषासुर राक्षस नहीं, बल्कि उनका अपना पूर्वज है। दलित-पिछड़ों का एक तबका भी हर वर्ष शरद पूर्णिमा के आसपास महिषासुर शहादत/स्मृति दिवस मनाता रहा है।
इसी पूर्ण गीत में भारत माता धीरे-धीरे हिंदू देवी का रूप लेती है और फिर गीत में सीधे कहा जाता है— “त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी” [तुम ही दुर्गा हो, जो दस अस्त्र-शस्त्र धारण करती हो]।
इसी पूर्ण गीत में भारत माता धीरे-धीरे हिंदू देवी का रूप लेती है और फिर गीत में सीधे कहा जाता है— “त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी” [तुम ही दुर्गा हो, जो दस अस्त्र-शस्त्र धारण करती हो]।
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— ✍️प्रमोद रंजन

वंदे मातरम् मूल रूप से दुर्गा वंदना है। बंकिमचंद्र ने इस गीत में भारत माता और दुर्गा माता को एक कर दिया है। यह उनकी भाषा और काव्य-कौशल का कमाल है। लेकिन भाषा के पीछे सच्चाई नहीं छुपाई जा सकती। यह गीत हिंदू देवी दुर्गा को देश से ऊँचा स्थान देता है और भारत माता की कल्पना दुर्गा के रूप में करता है। गीत का आरंभिक हिस्सा देश के बारे में है। उसमें धरती, पानी, फसल, हरियाली और मातृभूमि का सौंदर्य है।

1937 में विवाद उठने के बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने राष्ट्रीय अवसरों पर इसके आरंभिक दो पदों के इस्तेमाल का रास्ता चुना था। नेहरू इस पूरी प्रक्रिया में सहमत थे और उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर से भी इस पर विचार-विमर्श किया था। लेकिन मौजूदा सरकार की नई SOP में पूरे छह पदों को वंदे मातरम् का आधिकारिक संस्करण बनाया गया है। निर्देश यह भी है कि जब राष्ट्रीय गीत गाया जाए तो उसका आधिकारिक संस्करण ही गाया जाए।

इसी पूर्ण गीत में भारत माता धीरे-धीरे हिंदू देवी का रूप लेती है और फिर गीत में सीधे कहा जाता है— “त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी” [तुम ही दुर्गा हो, जो दस अस्त्र-शस्त्र धारण करती हो]।

लेकिन भारत सिर्फ दुर्गा को पूजने वालों का देश नहीं है। इस देश में आदिवासियों की एक बड़ी आबादी ऐसी भी है, जिनकी सांस्कृतिक स्मृतियों में महिषासुर राक्षस नहीं, बल्कि उनका अपना पूर्वज है। दलित-पिछड़ों का एक तबका भी हर वर्ष शरद पूर्णिमा के आसपास महिषासुर शहादत/स्मृति दिवस मनाता रहा है।

इसी सांस्कृतिक दुनिया से शिबू सोरेन जैसे नेता आते हैं। 2008 में झारखंड के मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने दशहरे पर रावण का पुतला जलाने से साफ इनकार कर दिया था। उन्होंने रावण को अपना “कुलगुरु” कहा और पूछा था— जिस कुलगुरु की पूजा की जाती है, उसका पुतला कैसे जलाया जा सकता है?

आज यही टकराव पूर्वोत्तर भारत में दूसरे धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भ में दिखाई दे रहा है। नागालैंड में नागा स्टूडेंट्स फेडरेशन वंदे मातरम् को शैक्षणिक और सरकारी आयोजनों में अनिवार्य किए जाने का लगातार विरोध कर रहा है। नागालैंड विश्वविद्यालय में छात्र इसके बजने के दौरान बैठे रहकर विरोध दर्ज करा चुके हैं।

मिजोरम में राज्य के प्रमुख छात्र संगठन मिज़ो ज़रलाई पावल ने पूरे गीत को स्कूलों में अनिवार्य किए जाने का विरोध किया है। मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने भी कहा है कि आधिकारिक तथा शैक्षणिक प्रयोजनों के लिए केवल शुरुआती दो पद स्वीकार किए जाएंगे, क्योंकि बाद के पदों में हिंदू देवी-देवताओं के धार्मिक संदर्भ आते हैं। आइज़ोल के शिक्षा अधिकारी ने भी स्कूलों को केवल पहले दो पद गाने का निर्देश दिया।

इस तरह केंद्र द्वारा पूरे गीत को आधिकारिक संस्करण बनाए जाने के बावजूद पूर्वोत्तर के इन इलाकों में उसके पूर्ण छह-पद वाले रूप को तीखे सांस्कृतिक-धार्मिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। इसके विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं, रैलियाँ निकाली जा रही हैं।

पूर्वोत्तर भारत देश का अभिन्न हिस्सा है, उनकी इस आवाज़ को अनसुना नहीं किया जाना चाहिए। यह विवाद देशप्रेम का नहीं है। सवाल यह है कि बहुधार्मिक, बहुजातीय और बहुसांस्कृतिक देश में कुछ जातियों के धार्मिक मिथक को पूरे देश का सांस्कृतिक सत्य क्यों माना जाए? आखिर पहले वाली व्यवस्था में क्या दिक्कत थी? क्या वंदे मातरम् के आरंभिक दो पदों को, जो कि मुख्यतः देश के बारे में हैं, गाने से देशभक्ति कम पड़ रही थी? क्या अन्य समूहों को अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए दुर्गा जैसे धार्मिक प्रतीक को स्वीकार करना अनिवार्य है?

जिस कथा में किसी के लिए दुर्गा विजेता देवी हैं, उसी कथा में किसी दूसरे समुदाय का पूर्वज महिषासुर मारा जाता है। यह सवाल राष्ट्रभक्ति का नहीं, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद और उसके प्रतिरोध का है।

-प्रमोद रंजन हिंदी के लेखक हैं। वे सामाजिक और सांस्कृतिक सवालों पर लिखते हैं।

इसी पूर्ण गीत में भारत माता धीरे-धीरे हिंदू देवी का रूप लेती है और फिर गीत में सीधे कहा जाता है— “त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी” [तुम ही दुर्गा हो, जो दस अस्त्र-शस्त्र धारण करती हो]।
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इसी पूर्ण गीत में भारत माता धीरे-धीरे हिंदू देवी का रूप लेती है और फिर गीत में सीधे कहा जाता है— “त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी” [तुम ही दुर्गा हो, जो दस अस्त्र-शस्त्र धारण करती हो]।
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इसी पूर्ण गीत में भारत माता धीरे-धीरे हिंदू देवी का रूप लेती है और फिर गीत में सीधे कहा जाता है— “त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी” [तुम ही दुर्गा हो, जो दस अस्त्र-शस्त्र धारण करती हो]।
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