विश्वविद्यालय छात्रों से चलता है, बंद दरवाजों से नहीं | वर्धा सत्याग्रह की आवाज

कुलपति कुमुद शर्मा और प्रशासन में जिम्मेदारी संभाल रहे कार्यकारी कादर नवाज के नेतृत्व में विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों की समस्याओं का समाधान करने के बजाय हमारे सामने प्रशासनिक भवन के दरवाजे बंद कर दिए।
विश्वविद्यालय छात्रों से चलता है, बंद दरवाजों से नहीं | वर्धा सत्याग्रह की आवाज
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— ✍️राजेश सारथी

डेढ़ माह से सत्याग्रह पर बैठे छात्र, लेकिन कुलपति कुमुद शर्मा और कादर नवाज को छात्रों से संवाद करने के बजाय FIR और बंद दरवाजे ही नजर आ रहे हैं।

मैं अपनी पीड़ा, अपनी व्यथा और पिछले 46 दिनों से विश्वविद्यालय में जो कुछ देख रहा हूँ, उसे अपनी बात के रूप में लिख रहा हूँ।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के हम छात्र 8 जुलाई 2026 से विश्वविद्यालय की विभिन्न शैक्षणिक और बुनियादी समस्याओं को लेकर प्रशासनिक भवन के बाहर सत्याग्रह पर बैठे हैं। हमारी मांगें आज की नहीं हैं। वर्ष 2022 से लंबित पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया पूरी करने से लेकर महिला अध्ययन विभाग और फिल्म अध्ययन विभाग को वर्धा मुख्य परिसर में पुनः शुरू करने, बंद किए गए डिप्लोमा कार्यक्रमों को फिर से शुरू करने तक—हम लगातार अपनी बात विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने रखते आए हैं।

हमारी मांग इतनी भी बड़ी नहीं है कि विश्वविद्यालय प्रशासन उसे पूरा न कर सके। हम स्वच्छ पेयजल, वाटर कूलर, समय-समय पर फिल्टर और मेम्ब्रेन बदलने, लाइब्रेरी में अपडेटेड किताबें उपलब्ध कराने, लाइब्रेरी के पास रीडिंग रूम खोलने, प्रत्येक हॉस्टल की मेस चालू करने, बेहतर मेस व्यवस्था और गुणवत्तापूर्ण भोजन तथा छात्रावासों में रीडिंग रूम जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे हैं।

लेकिन कुलपति कुमुद शर्मा और प्रशासन में जिम्मेदारी संभाल रहे कार्यकारी कादर नवाज के नेतृत्व में विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों की समस्याओं का समाधान करने के बजाय हमारे सामने प्रशासनिक भवन के दरवाजे बंद कर दिए।

पिछले 46 दिनों से प्रशासनिक भवन के चारों गेट बंद हैं।

सवाल यह है कि आखिर किससे डरकर ये दरवाजे बंद किए गए हैं?

छात्रों से?

उनके सवालों से?

या फिर उन सवालों के जवाब देने से?

इन बंद दरवाजों का खामियाजा केवल आंदोलनकारी छात्रों को नहीं भुगतना पड़ रहा है। सामान्य छात्र और शोधार्थी भी परेशान हैं। जिस प्रशासनिक काम को 10 मिनट में पूरा होना चाहिए, उसके लिए छात्रों को घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। कई बार डेढ़ घंटे तक खड़ा रहना पड़ता है।

हम लगातार कह रहे हैं—दरवाजे खोलिए, छात्रों से बात कीजिए।

लेकिन कुलपति कुमुद शर्मा को छात्रों से संवाद करना मंजूर नहीं है।

प्रशासनिक अधिकारी कादर नवाज को छात्रों की समस्याओं का समाधान करना मंजूर नहीं है।

बल्कि ऐसा लगता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपनी पूरी ताकत छात्रों के सवालों को दबाने में लगा दी है।

और अब बात केवल बंद दरवाजों तक नहीं रही।

20 अगस्त की देर रात आंदोलन से जुड़े मेरे सहित छह दलित-बहुजन छात्रों के खिलाफ FIR दर्ज कर दी गई। यानी जिस विश्वविद्यालय में छात्रों को पढ़ना, शोध करना और अपने अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाना चाहिए, वहां प्रशासन छात्रों के सवालों का जवाब पुलिस और मुकदमे से दे रहा है।

यह कैसी शिक्षा व्यवस्था है?

यह कैसा लोकतंत्र है?

और यह कैसा विश्वविद्यालय प्रशासन है?

कुलपति महोदया, यदि छात्रों की मांग गलत है तो सामने आइए और खुले मंच पर जवाब दीजिए।

यदि वर्ष 2022 से लंबित पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया, जो उच्च न्यायालय, नागपुर के निर्णय पर आपने शुरू की और 2023 से 2026 तक अभी तक शुरू नहीं की, के बारे में आपका निर्णय सही है तो छात्रों के सामने उसका कारण बताइए।

यदि महिला अध्ययन और फिल्म अध्ययन विभाग मुख्य केंद्र, वर्धा में बंद रखना सही है तो उसका आधार बताइए।

यदि प्रशासनिक भवन के चारों गेट बंद करना उचित है तो उसका लिखित आदेश और कारण सार्वजनिक कीजिए।

लेकिन छात्रों से बात करने के बजाय दरवाजे बंद करना और फिर छात्रों पर मुकदमे दर्ज करवाना किसी भी लोकतांत्रिक विश्वविद्यालय की पहचान नहीं हो सकती।

कार्यकारी कुलसचिव कादर नवाज, जिन पर विभिन्न वित्तीय अनियमितताओं और शिक्षक नियुक्तियों में धांधली में कुलपति रजनीश शुक्ल के सहयोगी के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने तथा यौन शोषण के आरोपों में रजनीश शुक्ल के अपराधों को छुपाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के आरोप हैं, किंतु कुमुद शर्मा कार्रवाई करने की जगह उन्हें कार्यकारी कुलसचिव के पद पर बैठाए रखा है। शिकायतों पर जांच न कर कुमुद शर्मा आरोपी को संरक्षण दे रही हैं।

हमने सुना था कि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों का अभिभावक होता है। लेकिन पिछले 45 दिनों में हमें ऐसा प्रशासन दिखाई दे रहा है, जो छात्रों की बात सुनने के बजाय उन्हें डराने, दबाने और मुकदमों में उलझाने में अधिक सक्रिय नजर आ रहा है।

और इस पूरे घटनाक्रम के बीच आंदोलनरत छात्र राकेश अहिरवार को कुलपति कुमुद शर्मा की गाड़ी से चोट लग गई। जब छात्र उन्हें घेरकर बात करना चाह रहे थे, तब कुलपति के कहने पर गाड़ी तेजी से पीछे भागने के क्रम में राकेश पर गाड़ी चढ़ा दी गई। घटना का प्रत्यक्ष गवाह मैं हूँ।

मैं यह सब इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि अब चुप रहना मुश्किल हो गया है।

हमने बहुत इंतजार किया।

हमने संवाद की कोशिश की।

हमने शांतिपूर्ण सत्याग्रह किया।

हमने अपनी मांगें रखीं।

लेकिन हमें मिला क्या?

बंद दरवाजा।

प्रशासनिक उदासीनता।

धमकी का माहौल।

साथी राकेश पर गाड़ी चढ़ा दी गई।

और अब FIR।

कुमुद शर्मा, विश्वविद्यालय छात्रों से चलता है, बंद दरवाजों से नहीं।

हम किसी व्यक्ति की निजी कृपा नहीं मांग रहे हैं। हम अपने अधिकार और विश्वविद्यालय में एक सम्मानजनक, पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था की मांग कर रहे हैं।

46 दिन हो गए हैं।

अब भी समय है—दरवाजे खोलिए, छात्रों के बीच आइए, संवाद कीजिए और समस्याओं का समाधान कीजिए।

वरना इतिहास यह जरूर पूछेगा कि जब विश्वविद्यालय के छात्र अपने भविष्य, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं के लिए 46 दिनों तक सड़क पर बैठे थे, तब विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों के साथ खड़ा था या उनके खिलाफ?

हम डरेंगे नहीं।

हम झुकेंगे नहीं।

हम सवाल पूछना बंद नहीं करेंगे।

क्योंकि विश्वविद्यालय किसी कुलपति की निजी जागीर नहीं, छात्रों और समाज की सार्वजनिक संस्था है।

- लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के स्त्री अध्ययन विभाग के शोधार्थी हैं। वे वर्ष 2008 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं और लंबे समय से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्य कर रहे हैं। उनकी रुचि सामाजिक न्याय, शिक्षा, छात्र-युवा मुद्दों, लोकतांत्रिक अधिकारों और समकालीन सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर स्वतंत्र एवं जनपक्षधर पत्रकारिता में है।

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