
उत्तर प्रदेश: बलिया जिले से एक बेहद दर्दनाक मामला सामने आया है। यहां पुलिस एक 22 वर्षीय युवक की तलाश में उसके घर पहुंची थी, लेकिन उसके न मिलने पर पुलिसकर्मियों ने उसके 44 वर्षीय दलित पिता को हिरासत में ले लिया। कुछ ही घंटों बाद इस मजदूर पिता की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई।
मृतक की पहचान कामजी गोंड के रूप में हुई है। परिजनों का गंभीर आरोप है कि पुलिस ने बेटे का पता उगलवाने के लिए कामजी को बुरी तरह पीटा और प्रताड़ित किया। इस मामले में दो पुलिसकर्मियों, एक ग्राम प्रधान और तीन अन्य लोगों के खिलाफ हत्या की नामजद प्राथमिकी दर्ज की गई है। आरोपी पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है।
हालांकि, पुलिस ने हिरासत में किसी भी तरह की मारपीट के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। इस घटना के बाद मृतक के परिजनों और ग्रामीणों ने जोरदार प्रदर्शन किया। उनका आरोप था कि पुलिस ने कामजी के साथ मारपीट की और उन्हें बेहोशी की हालत में एक खेत में फेंककर फरार हो गई, जिसके बाद अस्पताल में उनकी जान चली गई।
कामजी के बेटे विशाल की शिकायत पर रेवती थाने में छह लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया है। इनमें सब-इंस्पेक्टर सचिन सरोज, कांस्टेबल अंकित सिंह, ग्राम प्रधान आशुतोष शंकर सिंह और तीन स्थानीय नागरिक शामिल हैं। बलिया के पुलिस अधीक्षक ओमवीर सिंह ने बताया कि आरोपी दारोगा और सिपाही को सस्पेंड कर दिया गया है।
एसपी ओमवीर सिंह ने यह भी बताया कि रेवती थाने के एसएचओ राज किशोर सिंह को पद से हटाकर लाइन हाजिर कर दिया गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दे दिए गए हैं। इस मामले में अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है और आरोपियों में दो लोग दलित समुदाय से ही ताल्लुक रखते हैं।
विवाद की असली शुरुआत 7 जुलाई को हुई थी। मृतक के बेटे विशाल का गाईघाट गांव के खेदन चौराहे के पास स्थित एक दुकान पर चिकन खरीदने को लेकर दुकानदार सूरज कन्नौजिया से विवाद हो गया था। यह बहस जल्द ही हाथापाई में बदल गई, जिसे बाद में स्थानीय लोगों के हस्तक्षेप से शांत कराया गया। विशाल का दावा है कि ग्राम प्रधान और अन्य लोगों के दबाव में आकर दुकानदार ने उसके खिलाफ मारपीट की शिकायत दर्ज करा दी।
इसी शिकायत के आधार पर 8 जुलाई की दोपहर 1:20 बजे दो पुलिसकर्मी विशाल की तलाश में उसके घर पहुंचे। विशाल घर पर नहीं था, इसलिए पुलिसकर्मियों ने वहां सो रहे उसके पिता कामजी को उठा लिया। बेटे का आरोप है कि पुलिस उसके पिता को पास के एक ईंट भट्ठे पर ले गई और वहां उनके साथ बेरहमी से मारपीट की गई, ताकि वह विशाल के छिपने की जगह बता दे।
परिजनों के मुताबिक, बुरी तरह पिटाई के कारण जब कामजी बेहोश हो गए, तो पुलिसकर्मी उन्हें ईंट भट्ठे के पास एक बगीचे में लावारिस छोड़कर भाग निकले। शाम करीब 6 बजे स्थानीय लोगों ने उन्हें अचेत अवस्था में देखा और परिवार को सूचना दी। उन्हें तुरंत पास के अस्पताल ले जाया गया, जहां से डॉक्टरों की टीम ने उन्हें वाराणसी रेफर कर दिया। वाराणसी के अस्पताल में इलाज के दौरान कामजी ने दम तोड़ दिया।
दूसरी तरफ, पुलिस की कहानी इससे बिल्कुल उलट है। पुलिस विभाग का कहना है कि पूछताछ के दौरान कामजी को सांस लेने में तकलीफ होने लगी थी। अधिकारियों के अनुसार, 8 जुलाई को ही शाम करीब 4 बजे उन्हें एक पड़ोसी की सुपुर्दगी में छोड़ दिया गया था और वह पड़ोसी ही उन्हें अपने साथ ले गया था। पुलिस ने मारपीट और लावारिस छोड़ने के आरोपों को गलत बताया है।
पुलिस ने यह भी साफ किया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कामजी की मौत के सटीक कारणों की पुष्टि नहीं हो सकी है। इसके चलते डॉक्टरों ने फोरेंसिक जांच के लिए विसरा सुरक्षित रख लिया है, जिसकी रिपोर्ट का फिलहाल इंतजार है। इसके अलावा पुलिस ने यह जानकारी भी दी कि शिकायतकर्ता विशाल पर पहले से ही हत्या समेत कई गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं।
इस पूरी घटना के बाद गुस्साए परिजनों ने आरोपियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग को लेकर शव का अंतिम संस्कार करने से साफ इनकार कर दिया था। भारी विरोध प्रदर्शन के बाद जब पुलिस ने नामजद आरोपियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया, तब जाकर परिवार वाले अंतिम संस्कार की प्रक्रिया के लिए राजी हुए।
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