
नई दिल्ली: जमीन सौदे में 2.10 लाख रुपये की ठगी का शिकार हुई एक 65 वर्षीय दलित महिला को न्याय के लिए उड़ीसा उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा। मजिस्ट्रेट के स्पष्ट निर्देश के बावजूद पुलिस ने आठ महीने से अधिक समय तक इस धोखाधड़ी के मामले में एफआईआर दर्ज नहीं की थी। इस बड़ी देरी पर पुलिस को आड़े हाथों लेते हुए हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है।
अदालत ने साफ किया कि 'फाइल गुम होने' या अदालती आदेश 'मिल न पाने' जैसे तर्क अब न्याय प्रक्रिया को कमजोर करने का रूटीन बहाना नहीं बन सकते।
न्यायमूर्ति सावित्री राठो ने 12 जून के अपने आदेश में स्थानीय पुलिस द्वारा अदालती आदेशों के प्रति अपनाए जा रहे रवैये पर गहरी चिंता व्यक्त की। इस मामले की सुनवाई करते हुए उन्होंने कहा कि फाइलों का गुम होना संभव है, लेकिन दुर्भाग्य से यह कोई इकलौता मामला नहीं है।
न्यायाधीश ने बताया कि उनके सामने ऐसे कई मामले आ चुके हैं जहां परिवार अदालत या मजिस्ट्रेट के निर्देशों का स्थानीय पुलिस पालन नहीं करती है। कई बार याद दिलाने और मोहलत देने के बाद भी पुलिस अधिकारियों की नींद नहीं टूटती।
मामले की समयसीमा हैरान करने वाली है। मजिस्ट्रेट ने 6 अगस्त 2025 को मामले में एफआईआर दर्ज करने का स्पष्ट आदेश दिया था। लेकिन रणपुर पुलिस स्टेशन में यह मामला आठ महीने बाद 24 अप्रैल को दर्ज किया गया। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में पुलिस अक्सर यही रटा-रटाया बहाना बनाती है कि कोर्ट का आदेश या वारंट खो गया था, या फिर संबंधित अधिकारी ने हाल ही में ड्यूटी जॉइन की है।
अदालत ने पुलिस के इस स्पष्टीकरण को पूरी तरह से अस्वीकार्य बताया। कोर्ट ने तर्क दिया कि हर पुलिस स्टेशन में विभिन्न अदालतों और अधिकारियों से प्राप्त होने वाले आदेशों तथा पत्रों का रिकॉर्ड रखने के लिए अलग रजिस्टर मौजूद होते हैं, ऐसे में फाइल गुम होने की बात बेमानी है।
इन तमाम लापरवाहियों को देखते हुए उड़ीसा हाईकोर्ट ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) से अपेक्षा जताई है कि वे अपने अधिकारियों को न्यायिक आदेशों का सम्मान करने और उनका त्वरित पालन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करेंगे।
इस पूरे विवाद की जड़ मई 2025 में हुई एक ठगी से जुड़ी है। अनुसूचित जाति समुदाय से ताल्लुक रखने वाली 65 वर्षीय याचिकाकर्ता को आरोपियों ने अपनी जमीन बेचने का झांसा दिया था। उप-पंजीयक के समक्ष बिक्री विलेख (सेल डीड) पंजीकृत करने के नाम पर आरोपियों ने इस बुजुर्ग महिला से 2.10 लाख रुपये की भारी-भरकम रकम ऐंठ ली। लेकिन न तो उन्होंने कभी सेल डीड का निष्पादन किया और न ही बार-बार मिन्नतें करने के बावजूद महिला के पैसे लौटाए।
अपने हक की लड़ाई लड़ते हुए पीड़िता ने सबसे पहले निचली अदालत का रुख किया, जिसने मामले को गंभीरता से लेते हुए एफआईआर दर्ज कर जांच के आदेश दिए। जब पुलिस ने वहां भी उनकी फरियाद नहीं सुनी और कोई कार्रवाई नहीं की, तो उन्हें मजबूरन अधिवक्ता उमाकांत साहू के माध्यम से उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।
दूसरी तरफ, राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए अतिरिक्त स्थायी अधिवक्ता सरोज कुमार राउत ने कोर्ट को बताया कि अब संबंधित मामले में एफआईआर दर्ज कर ली गई है और उप-निरीक्षक हसीना प्रधान इसकी जांच कर रही हैं। हालांकि, इसके बावजूद उड़ीसा हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट के आदेश के पालन में हुई आठ महीने की लंबी देरी और पुलिस द्वारा दिए गए गैर-जिम्मेदाराना स्पष्टीकरण की कड़ी समीक्षा करना जारी रखा।
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