तमिलनाडु: 40 साल से अंधेरे में रहने को मजबूर 360 दलित परिवार, अब सुविधाओं के अभाव में चुनाव बहिष्कार का किया ऐलान

मदुरै के तीर्थकाडु गांव का दर्द: पट्टे की जंग में पिस रही 3 पीढ़ियां, मंत्री के क्षेत्र में भी विकास से कोसों दूर, अब 'सुविधा नहीं तो वोट नहीं' का नारा।
Election Boycott, Theerthakadu Village
मदुरै में 40 साल से बिना बिजली-पानी के जी रहे 360 दलित परिवार। 'सुविधा नहीं तो वोट नहीं' का नारा देकर किया चुनाव बहिष्कार।(Ai Image)
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मदुरै: मदुरै शहर की सीमा के भीतर वंडियूर के पास स्थित तीर्थकाडु गांव में रहने वाले लगभग 360 दलित परिवारों के लिए, पिछले चार दशक केवल सरकारी फाइलों के चक्कर और अंधेरे में बीते हैं। यहाँ नगर निगम और राज्य राजस्व विभाग के बीच भूमि पट्टे (Land Pattas) जारी करने को लेकर चल रही रस्साकशी का सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर पड़ा है। नतीजा यह है कि 40 साल से भी अधिक समय से यहाँ के लोग बिना बिजली, पीने के पानी, पक्की सड़कों, जल निकासी और स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाओं के बिना जीने को मजबूर हैं।

प्रशासन की अनदेखी और जनता का दर्द

हैरानी की बात यह है कि यह इलाका मदुरै सिटी कॉरपोरेशन के वार्ड 38 के अंतर्गत आता है और मदुरै पूर्व विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा है, जिसका प्रतिनिधित्व वाणिज्यिक कर मंत्री पी. मूर्ति करते हैं। इसके बावजूद, यहाँ रहने वाले 1,200 निवासियों की पीड़ा अधिकारियों के लिए अनकही, अनसुनी और अनदेखी बनी हुई है।

न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के हवाले से बताया गया कि, स्थानीय निवासियों के अनुसार, कई गरीब दलित परिवार सालों पहले शहर के बाहरी इलाके में स्थित बंजर भूमि के टुकड़ों पर बस गए थे। अलग-अलग सरकारों द्वारा उन्हें नौ एकड़ और 13 सेंट भूमि के लिए पट्टा देने का वादा किया गया था। लेकिन हकीकत यह है कि पिछले साल दिसंबर में डिप्टी सीएम उदयनिधि स्टालिन द्वारा केवल 68 परिवारों को ही ई-पट्टे (e-pattas) वितरित किए गए। पट्टों को जारी करने में हुई इस देरी ने विकास कार्यों को रोक दिया है, क्योंकि राजस्व विभाग द्वारा सामान्य भूमि क्षेत्र को सुविधाओं के विकास के लिए नगर निगम को हस्तांतरित करने की प्रक्रिया अटकी हुई है।

"अब बहुत हो चुका": चुनाव बहिष्कार का फैसला

सरकारी उदासीनता को अब और बर्दाश्त न करने की ठान चुके 'तीर्थकाडु एससी रेजिडेंट्स प्रोटेक्शन वेलफेयर एसोसिएशन' ने आगामी चुनावों का बहिष्कार करने का कठोर निर्णय लिया है। गांव और उसके आसपास "अब बहुत हो चुका" जैसे नारों वाले पोस्टर चिपकाए गए हैं, जिसमें साफ तौर पर कहा गया है कि जब तक बुनियादी सुविधाएं नहीं दी जातीं, वे किसी भी चुनाव में वोट नहीं डालेंगे।

एसोसिएशन के अध्यक्ष मुथमिल पांडियन ने अपना रोष व्यक्त करते हुए कहा, "हमने 40 वर्षों से जारी इस उपेक्षा के विरोध में विधानसभा चुनावों का बहिष्कार करने का फैसला किया है। हम अगले कुछ दिनों में चेन्नई में तमिलनाडु विधानसभा तक एक रैली निकालने की भी योजना बना रहे हैं।"

महंगा पानी और अंधेरे का खौफ

गांव की एक निवासी, 35 वर्षीय एन. मुल्लािकोडी ने बताया कि 350 से अधिक अनुसूचित जाति (SC) के परिवार 1983 से यहाँ रह रहे हैं। उन्होंने अपना दर्द बयां करते हुए कहा, "हमने मकान तो बना लिए हैं, लेकिन निगम ने बुनियादी सुविधाएं देने से इनकार कर दिया है। पानी की पाइपलाइन न होने के कारण, हमें गैर-पीने योग्य बोरवेल के पानी के 100-लीटर बैरल के लिए 80 रुपये और पीने के पानी के प्रति घड़े के लिए 15 रुपये चुकाने पड़ते हैं।"

बिजली न होने से गांव में सुरक्षा का भी भारी संकट है। मुल्लािकोडी ने आरोप लगाया कि अंधेरे का फायदा उठाकर असामाजिक तत्व यहाँ अवैध गतिविधियों को अंजाम देते हैं। उन्होंने कहा, "हम दिहाड़ी मजदूर हैं और कहीं और किराए का घर नहीं ले सकते। मोहल्ले में घुप अंधेरा होने के कारण हम सूर्योदय से पहले काम पर नहीं जा सकते और सूर्यास्त के बाद घर नहीं लौट सकते। रात में जहरीले कीड़ों और सांपों का भी खतरा बना रहता है।"

इसके अलावा, शौचालय न होने के कारण महिलाओं और लड़कियों को खुले में शौच के लिए जाते समय उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।

शिक्षा का अंधकार: छात्रों को मिले मुफ्त लैपटॉप बेकार

बिजली की कमी ने बच्चों के भविष्य पर भी ग्रहण लगा दिया है। गांव की एक अन्य महिला, 30 वर्षीय रेणुका ने बताया, "उचित रोशनी न होने के कारण छात्र मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ने को मजबूर हैं। हम किसी भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का उपयोग नहीं कर सकते, यहाँ तक कि छात्रों को सरकार से मिले मुफ्त लैपटॉप भी चार्ज न हो पाने के कारण बेकार पड़े हैं या बेच दिए गए हैं।"

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 40 वर्षों में इस गांव का एक भी बच्चा स्नातक (Graduate) नहीं बन पाया है। रेणुका ने बताया कि उन्हें बुनियादी जरूरतों के लिए भी पैसे खर्च करने पड़ते हैं। लोग फोन चार्ज करने के लिए पास के उन इलाकों में जाते हैं जहाँ बिजली है और इसके लिए प्रति डिवाइस 5 रुपये चुकाते हैं।

अधिकारियों का पक्ष

इस गंभीर मुद्दे पर एक वरिष्ठ राजस्व अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "हम मामले को देख रहे हैं और बिजली व पानी के कनेक्शन सहित ग्रामीणों की मांगों को पूरा करने के लिए कदम उठा रहे हैं।"

वहीं, जब जिला कलेक्टर के.जे. प्रवीण कुमार से संपर्क किया गया, तो उन्होंने कहा कि वह इस मामले के संबंध में निगम आयुक्त से बात करेंगे।

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