
केरल के कन्नूर जिले में एक बीडीएस (BDS) छात्र की मौत के बाद न्याय की मांग तेज हो गई है। मंगलवार, 28 अप्रैल 2026 की सुबह बड़ी संख्या में दलित और आदिवासी कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने कई इलाकों में यातायात रोक दिया और राज्य परिवहन (KSRTC) सहित निजी बसों की आवाजाही को भी पूरी तरह से ठप कर दिया।
यह हड़ताल मुख्य रूप से कन्नूर, तिरुवनंतपुरम और पतनमतिट्टा जिलों में देखने को मिली, जहां दुकानों को जबरन बंद करवाया गया। प्रदर्शनकारियों ने बस टर्मिनलों पर धरना दिया और ऑटो-रिक्शा, निजी कारों व वैन को आगे नहीं बढ़ने दिया। इस वजह से आम यात्रियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा।
कुछ इलाकों में राष्ट्रीयकृत बैंकों के कामकाज में भी बाधा डालने की कोशिश की गई। हालात यहां तक पहुंच गए कि अस्पताल जाने वाले मरीजों से भी रास्ता देने के लिए उनके मेडिकल रिकॉर्ड मांगे गए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे सच में इलाज के लिए जा रहे हैं।
यह पूरा विवाद 10 अप्रैल को अंचराकांडी (Anjarakandy) स्थित एक कॉलेज में बीडीएस छात्र नितिन राज की मौत के बाद भड़का है। आरोप है कि कॉलेज के कुछ फैकल्टी सदस्यों द्वारा क्लास और स्टाफ रूम में किए गए जातीय भेदभाव के कारण छात्र की जान गई।
इसी के विरोध में 'जस्टिस फॉर नितिन राज एक्शन काउंसिल' के बैनर तले राज्य में सुबह से शाम तक की हड़ताल का आह्वान किया गया था। इस बंद को केरल पुलायर महा सभा (KPMS) के एक गुट सहित कुल 52 दलित और आदिवासी संगठनों का समर्थन प्राप्त था। इन संगठनों का सीधा आरोप है कि पुलिस और कॉलेज प्रशासन इस मामले के मुख्य संदिग्धों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
तिरुवनंतपुरम में पत्रकारों से बातचीत करते हुए एक्शन काउंसिल के प्रवक्ता चलई मोहनन ने पुलिस और प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए।
उन्होंने कहा कि पुलिस मामले में 'दलित उत्पीड़न' के मुख्य पहलू को छिपाने की कोशिश कर रही है। इसके लिए जानबूझकर यह झूठी कहानी फैलाई जा रही है कि मोबाइल लोन ऐप से कर्ज लेने के बाद रिकवरी एजेंटों की प्रताड़ना से तंग आकर नितिन ने यह कदम उठाया।
हालांकि, नितिन राज के परिवार ने इस लोन के मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट की है। परिवार के मुताबिक, छात्र ने अपनी मां के इलाज के लिए महज 15,000 रुपये उधार लिए थे। उसने कोई किश्त बाउंस नहीं की थी, बल्कि सिर्फ अपनी परीक्षाएं खत्म होने तक कर्ज चुकाने का समय मांगा था।
प्रवक्ता मोहनन ने आगे आरोप लगाया कि पुलिस शुरुआत से ही कॉलेज प्रबंधन का साथ दे रही है और इसी वजह से आरोपियों को फरार होने का मौका मिल गया।
उन्होंने कहा कि अदालत में पुलिस ने यह झूठा दावा करके अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act) के तहत मामले को कमजोर करने की कोशिश की कि मुख्य संदिग्ध डॉ. एम.के. राम खुद एससी/एसटी समुदाय से आते हैं।
हालांकि, अदालत ने इस तथ्य की जांच की और पुलिस के झूठ को पकड़ते हुए डॉ. राम की जमानत याचिका खारिज कर दी। मोहनन का कहना है कि अदालत द्वारा जमानत नामंजूर किए जाने के बावजूद डॉ. राम को गिरफ्तार करने के प्रयास सिर्फ कागजों तक ही सीमित नजर आ रहे हैं।
मोहनन ने अपनी बात खत्म करते हुए कहा कि केरल के एडेड और सेल्फ-फाइनेंसिंग कॉलेजों में पढ़ने वाले हजारों गरीब दलित छात्र आज खुद को जातीय भेदभाव का शिकार महसूस कर रहे हैं।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि आज केरल में '10 हजार नितिन राज' हैं। यह एक्शन काउंसिल उन ताकतवर निजी प्रबंधनों को यह साफ संदेश दे रही है कि समाज अब शिक्षण परिसरों, लेक्चर हॉल और स्टाफ रूम में किसी भी तरह का जातिवाद बर्दाश्त नहीं करेगा।
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