कर्नाटक हाईकोर्ट: बाबा साहब की तस्वीर तोड़ने और SC/ST अत्याचार के 17 वर्ष पुराने मामले में 26 आरोपियों की बरी का फैसला बरकरार

राज्य की ओर से सरकारी वकील के. नागेश्वरप्पा ने तर्क दिया कि बरी करने का फैसला "अवैध, अमान्य और कानून, साक्ष्य तथा रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के विपरीत" है। उनके अनुसार निचली अदालत ने गवाहों के साक्ष्य का सही मूल्यांकन नहीं किया, जिससे न्याय की विफलता हुई।
कर्नाटक हाईकोर्ट
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बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट ने 1 अक्टूबर को चामराजनगर की विशेष अदालत द्वारा सुनाए गए बरी के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी। यह मामला गुंडलुपेट तालुक के बोम्मनहल्ली गांव में वर्ष 2009 में हुई घटना से जुड़ा है, जिसमें डॉ. बी.आर. आंबेडकर की तस्वीर और समुदाय भवन के साइनबोर्ड को गिराने तथा अनुसूचित जाति के लोगों के साथ मारपीट व जातिसूचक गाली-गलौज के आरोप थे।

जस्टिस जी. बसवराज की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया। यह अपील राज्य सरकार की ओर से टेरकणांबी पुलिस के माध्यम से दायर की गई थी।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 6 जून 2009 को शाम करीब 7 बजे बोम्मनहल्ली गांव में 29 आरोपियों ने गैरकानूनी जमावड़ा बनाया। उनके पास घातक हथियार थे और वे दंगा करने के साझा उद्देश्य से इकट्ठा हुए थे। आरोप था कि उन्होंने "समुदाय भवन" का साइनबोर्ड और डॉ. आंबेडकर की तस्वीर गिरा दी। अभियोजन के अनुसार यह कृत्य अनुसूचित जाति समुदाय की भावनाओं को आहत करने और उसे अपमानित करने की मंशा से सार्वजनिक रूप से किया गया।

आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की धाराओं 143, 147, 148, 341, 323, 324, 506, 427 और 295(ए) तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(x) और (xi) के तहत आरोप लगाए गए थे।

आरोपपत्र दाखिल होने के बाद अदालत ने संज्ञान लिया और समन जारी किए। सभी आरोपी पेश हुए और उन्हें जमानत मिली। हालांकि:

  • आरोपी संख्या 2 नॉन-बेलेबल वारंट के बावजूद अदालत में हाजिर नहीं हुआ, इसलिए उसके खिलाफ अलग विशेष प्रकरण संख्या 51/2010 दर्ज किया गया।

  • आरोपी संख्या 25 की मृत्यु हो जाने से उसके खिलाफ मामला समाप्त (abate) कर दिया गया।

निचली अदालत ने आरोप तय कर आरोपियों को उनकी भाषा में पढ़कर सुनाए। आरोपियों ने खुद को निर्दोष बताया और मुकदमे का सामना करने की बात कही।

अभियोजन ने कुल 13 गवाह, 21 दस्तावेज (Ex.P1 से P21) और 25 भौतिक वस्तुएं प्रस्तुत कीं। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत दर्ज बयानों में आरोपियों ने अपने खिलाफ सभी साक्ष्यों से पूरी तरह इनकार किया, लेकिन बचाव में कोई साक्ष्य पेश नहीं किया। सुनवाई के बाद निचली अदालत ने आरोपी संख्या 1, 3 से 12, 14 से 24 और 26 से 29 को बरी कर दिया।

राज्य ने अपील में दी ये दलीलें

राज्य की ओर से सरकारी वकील के. नागेश्वरप्पा ने तर्क दिया कि बरी करने का फैसला "अवैध, अमान्य और कानून, साक्ष्य तथा रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के विपरीत" है। उनके अनुसार निचली अदालत ने गवाहों के साक्ष्य का सही मूल्यांकन नहीं किया, जिससे न्याय की विफलता हुई।

उन्होंने कहा कि 7 घायल गवाह थे और उन पर अविश्वास का कोई कारण नहीं था। इन गवाहों ने स्पष्ट बताया कि आरोपियों ने हाथों, डंडों और हंसिए से हमला किया, जिससे पूरे शरीर पर चोटें आईं। उन्होंने यह भी कहा कि जाति का नाम लेकर गाली दी गई और डॉ. बी.आर. आंबेडकर की तस्वीर व नाम वाले समुदाय भवन के साइनबोर्ड को तोड़ने के लिए पत्थर फेंके गए।

सरकारी वकील ने यह भी दलील दी कि दलित वर्ग के विरुद्ध अत्याचार को विशेष कानून के तहत दंडनीय बनाया गया है, जो एक सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति करता है, इसलिए निचली अदालत को कानून की कठोर व्याख्या पर जोर नहीं देना चाहिए था।

आरोपियों की ओर से अधिवक्ता मंजूनाथ एन.डी. ने कहा कि निचली अदालत ने कानून और तथ्यों के अनुसार साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया है और फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। उन्होंने अपील खारिज करने की मांग की।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में निचली अदालत के फैसले के पैराग्राफ 30 को उद्धृत किया। उसमें दर्ज है कि शिकायतकर्ता घायल हैं, अन्य गवाह उनका बेटा, पत्नी और उनके बड़े भाई की पत्नी हैं, जबकि चार अलग गवाह एक ही समुदाय के हैं। सभी प्रत्यक्षदर्शियों ने माना कि घटनास्थल पर अंधेरा था और उस दिन शाम 6.45 बजे से गांव में बिजली नहीं थी। इस पर निचली अदालत ने टिप्पणी की कि "किसी भी प्रत्यक्षदर्शी ने यह नहीं बताया कि उन्होंने घटना को कैसे देखा और किस रोशनी में देखा।" अदालत ने यह भी कहा कि साक्ष्य में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं, जो घटना के घटित होने के बारे में संदेह पैदा करते हैं।” निष्कर्ष में निचली अदालत ने माना कि "संदेह का लाभ आरोपियों को मिलना चाहिए" और अभियोजन पक्ष आरोपियों का अपराध युक्तिसंगत संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा, इसलिए सभी 10 मुद्दों का उत्तर नकारात्मक में दिया गया।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की पूरी सामग्री की दोबारा समीक्षा के बाद निचली अदालत के निष्कर्षों में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। जस्टिस जी. बसवराज ने अपने आदेश में कहा, "साक्ष्यों के पुनर्मूल्यांकन, पुनर्विचार और पुनः परीक्षण के बाद मुझे निचली अदालत द्वारा की गई कोई कानूनी या तथ्यात्मक त्रुटि नहीं दिखती।" इसके साथ ही अदालत ने अपील खारिज कर दिया।"

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