
अमरेली- अस्पतालों में मुफ्त भोजन ज़रूरतमंदों को सेवा भाव से दी जाती है, लेकिन गुजरात के एक अस्पताल में फ्री भोजन सेवा में शामिल हुए एक दलित युवक को अपनी जान से कीमत चुकानी पड़ी। गुजरात के अमरेली जिले से यह सनसनीखेज और दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है। शांताबा जनरल होस्पीटल में यह युवक अपने बुजुर्ग चाचा के इलाज के लिए आए थे। भूख मिटाने के लिए वे अस्पताल परिसर में ही चल रही मुफ्त भोजनशाला में जा बैठे, लेकिन तबीयत खराब होने के कारण जब वे थोड़ा सा बचा हुआ भोजन फेंकने लगे, तो वहीं खड़े संगठन के संचालक की नजरों में यह 'बर्बादी' ऐसी खल गई कि उसने युवक से जुर्माना मांगा और बाद में जाति मालूम होने पर प्लास्टिक के पाइपों से पिटवाकर उसे मौत के घाट उतार दिया। परिवार ने शव लेने से इनकार कर दिया है, उनकी मांग है कि पहले सातों आरोपियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाए।
मृतक की पहचान 24 वर्षीय महेश प्रेमजी राठौड़ के रूप में हुई है, जो गोपालग्राम गाँव के रहने वाले थे। माहेश अपने सत्तर वर्षीय चाचा को इलाज के लिए शांताबा सामान्य अस्पताल लेकर आए थे।
मामले के अनुसार, 17 अप्रैल को चाचा को भर्ती कराने के बाद महेश अस्पताल परिसर के पीछे चल रही एक मुफ्त भोजनशाला में भोजन करने पहुँचे, जहाँ मरीजों के परिजनों और तीमारदारों को नि:शुल्क भोजन कराया जाता था। महेश ने दाल-चावल खाना शुरू किया, लेकिन तबीयत खराब होने और मिचली आने के कारण वह पूरा भोजन नहीं कर सके। उन्होंने बचा हुआ थोड़ा सा भोजन फेंक दिया।
इसी दौरान संगठन के प्रमुख भरत आचार्य ने उन्हें रोक लिया और खाना बर्बाद करने पर 50 रुपये के जुर्माने की मांग की। महेश ने कहा कि वह जुर्माना भर देंगे, लेकिन उनके पास छुट्टे पैसे नहीं थे, इसलिए उन्होंने 500 रुपये का नोट दे दिया। आरोप है कि भरत आचार्य ने बचे हुए 450 रुपये वापस लौटाने से इनकार कर दिया और महेश से उनकी जाति और गाँव पूछने लगे।
जब महेश ने बताया कि वह दलित हैं, तो आचार्य ने तीन अन्य लोगों को बुलाया और उनके साथ मिलकर कथित तौर पर प्लास्टिक के पाइपों से महेश की बेरहमी से पिटाई शुरू कर दी। करीब सात लोगों ने मिलकर युवक को तब तक पीटा जब तक वह बेहोश होकर जमीन पर नहीं गिर गया। गंभीर रूप से घायल महेश को तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन तीन दिन बाद 20 अप्रैल को उन्होंने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया।
महेश की मौत के बाद से परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है। पोस्टमार्टम 21 अप्रैल को पूरा हो गया, लेकिन परिवार ने अंतिम संस्कार के लिए शव लेने से इनकार कर दिया है। मृतक के पिता प्रेमजी राठौड़ ने कहा, "मेरे बेटे को महज 50 रुपये के लिए मार डाला। उसे प्लास्टिक के पाइप से तब तक पीटा गया जब तक वह सांस नहीं ले रहा था। पुलिस ने अभी तक हत्या की धारा नहीं जोड़ी है। जब तक सभी आरोपियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज नहीं होता, हम उसका शव नहीं उठाएंगे।"
परिवार शुरू में अस्पताल परिसर में प्रदर्शन कर रहा था, लेकिन अब यह प्रदर्शन उनके गाँव गोपालग्राम में जारी है। ग्रामीणों ने भी परिवार का समर्थन किया है और कहा है कि जब तक न्याय नहीं मिलता, शव को अंतिम संस्कार के लिए नहीं लिया जाएगा।
पुलिस ने इस मामले में भरत आचार्य समेत सात लोगों के खिलाफ मारपीट, दंगा और गैरकानूनी सभा की धाराएँ दर्ज की हैं। हालांकि, परिवार की मांग है कि इन सभी के खिलाफ हत्या की धारा 302 जोड़ी जाए।
विशेष अत्याचार न्यायालय के न्यायाधीश डीएस श्रीवास्तव ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए जाँच अधिकारी को निर्देश दिया है कि वे तत्काल फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) से माहेश की मौत के कारण की रिपोर्ट तलब करें और 1 मई तक इसे अदालत में पेश करें। अदालत इसी रिपोर्ट के आधार पर यह निर्णय लेगी कि मामले में हत्या की धारा जोड़ी जाए या नहीं।
जाँच अधिकारी डीवाईएसपी चिराग देसाई ने बताया कि एफएसएल रिपोर्ट अभी लंबित है। उन्होंने कहा, "हम भावनगर के सर तख्तसिंहजी सिविल अस्पताल के फोरेंसिक विभाग को प्राथमिकता पत्र लिख रहे हैं, ताकि रिपोर्ट जल्द से जल्द प्राप्त हो सके। इसी रिपोर्ट के बाद ही आगे की कार्रवाई तय होगी।"
इस घटना ने पूरे गुजरात में सनसनी फैला दी है। मानवाधिकार संगठनों और दलित नेताओं ने इस घटना की कड़ी निंदा की है और आरोपियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की मांग की है। दलित नेताओं का कहना है कि मामूली विवाद पर किसी व्यक्ति को जाति बताने पर इस तरह प्रताड़ित कर मार डालना जातिगत अपराध है, और दोषियों को फांसी की सजा मिलनी चाहिए।
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