
सीकर- राजस्थान के सीकर जिले के शाहपुरा ठिकरिया स्थित तेजाजी मंदिर में आयोजित सर्व समाज की एक बैठक के दौरान तेजल शिक्षण संस्थान, रींगस के निदेशक बाबूलाल यादव ने एक अत्यंत विवादित बयान दिया। वीडियो में वे कहते सुनाई देते हैं कि आगामी यज्ञ-हवन वैदिक परंपरा के अनुसार आयोजित किया जा रहा है, इसलिए इसमें अनुसूचित जाति के सदस्य नहीं बैठ सकते।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आर्य समाज की परंपरा में भले ही सभी को बैठने का अधिकार हो, लेकिन यह समारोह वैदिक परंपरा से हो रहा है, इसलिए इसमें एससी समाज का कोई भी व्यक्ति नहीं बैठेगा। उन्होंने विशेष रूप से महिलाओं को भी इसमें नहीं बिठाये जाने की बात की। उन्होंने इस भेदभाव को वैदिक परंपरा का हवाला देते हुए उचित ठहराने की कोशिश की और यह भी कहा कि लेडीज चाहें तो कलश यात्रा में शामिल हो सकती हैं, लेकिन यज्ञ में उन्हें स्थान नहीं दिया जाएगा। इसके बाद उन्होंने सभा में मौजूद लोगों से पूछा कि जिन्हें यह मंजूर हो वे हाथ उठाएं, और वहाँ उपस्थित कई लोगों ने हाथ भी उठा दिए।
जैसे ही यह वीडियो सोशल मीडिया पर फैला, दलित संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों में व्यापक आक्रोश उमड़ पड़ा। लोगों ने इसे न केवल जातिवाद की घटिया मानसिकता बताया, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 का सीधा उल्लंघन भी करार दिया, जो अस्पृश्यता को पूरी तरह प्रतिबंधित करता है। यह भी उल्लेखनीय रहा कि बयान देने वाले व्यक्ति का शिक्षा जगत से सीधा जुड़ाव है, जिसने इस विवाद को और गहरा कर दिया। वीडियो वायरल होने और भारी सामाजिक दबाव के बाद बाबूलाल यादव ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी।
राजस्थान में ऐसे मामले कभी-कभी सुर्खियां बनते रहे हैं, हालांकि संविधान Article 17 के तहत अछूतप्रथा निषिद्ध है और सभी नागरिकों को धार्मिक गतिविधियों में समान अधिकार प्राप्त है।
भारी सामाजिक दबाव और आलोचना के बाद बाबूलाल यादव ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी। उन्होंने अपने बयान को गलत स्वीकार करते हुए कहा कि उनसे अनजाने में भूल हुई लेकिन उनका इरादा किसी की भावना को ठेस पहुँचाने का नहीं था। उन्होंने कहा कि वे सभी वर्गों की सामाजिक- धार्मिक भावना का सम्मान करते हैं और वे बिना शर्त माफ़ी मांग रहे हैं, इस विवाद को यहीं विराम दिया जाये। कई लोगों का कहना है कि केवल माफी मांग लेने से यह मामला खत्म नहीं होना चाहिए और SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी होनी चाहिए।
यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद जमीनी हकीकत में जातिगत भेदभाव की जड़ें कितनी गहरी हैं। फिलहाल मामले में किसी आधिकारिक पुलिस कार्रवाई की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सामाजिक दबाव और चर्चा जारी है।
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