नई दिल्ली: बिहार के भोजपुर जिले में दस महीने से लापता एक दलित युवक के मामले में पटना हाई कोर्ट की सख्ती के बाद पुलिस ने बड़ा कदम उठाया है। इस सनसनीखेज मामले में आबकारी (उत्पाद) विभाग के दो अधिकारियों और तीन होमगार्ड समेत कुल सात लोगों को गिरफ्तार किया गया है।
भोजपुर के पुलिस अधीक्षक (एसपी) राज ने पुष्टि की है कि गिरफ्तार किए गए सात आरोपियों में से छह को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है, जबकि एक को पुलिस रिमांड पर लिया गया है। गिरफ्तार किए गए अधिकारियों में असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर (एएसआई) धीरज कुमार और राज कुमार शामिल हैं।
इनके अलावा होमगार्ड धर्मेंद्र पासवान, उमेश कुमार यादव और राजू कुमार सिंह को भी पकड़ा गया है। इन पांच सरकारी कर्मियों के साथ-साथ दो निजी ड्राइवरों, सुरेंद्र कुमार सिंह और विकास कुमार की भी गिरफ्तारी हुई है।
यह पूरा मामला 31 वर्षीय दलित युवक सनोज कुमार की गुमशुदगी से जुड़ा है। अगस्त 2025 में भोजपुर जिले के बिहिया के पास धरहरा मुसहर टोली में उत्पाद विभाग ने शराब से जुड़े एक मामले में छापेमारी की थी। परिजनों का आरोप है कि 13 अगस्त 2025 को हिरासत में लिए जाने के बाद से ही सनोज लापता है।
उत्पाद विभाग लगातार यह दावा करता रहा कि युवक उनकी गिरफ्त से भाग निकला था, लेकिन परिवार ने पुलिस कस्टडी में उसकी हत्या करने और साक्ष्य मिटाने का गंभीर आरोप लगाया है।
सनोज के पिता गौरी शंकर राम द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस कुमार मनीष की खंडपीठ के सामने 2 जुलाई के आदेश का हवाला देते हुए भोजपुर एसपी ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया।
एसपी ने अदालत को बताया कि गिरफ्तार किए गए उत्पाद विभाग के कर्मियों से पूछताछ में घटना के विरोधाभासी बयान सामने आए हैं। जांच में पता चला है कि हिरासत के दौरान सनोज के साथ हाथापाई हुई थी और उत्पाद विभाग की गाड़ी चला रहे एक निजी ड्राइवर ने उसके गले में तौलिया डालकर उसे ऊपर की तरफ खींचा था।
आबकारी अधिकारियों ने अदालत में सनोज के भागने की थ्योरी को सही साबित करने के लिए सीसीटीवी फुटेज का भी सहारा लिया था। उनका दावा था कि युवक गाड़ी का पिछला हिस्सा खोलकर फरार हो गया। हालांकि, फुटेज देखने के बाद पटना हाई कोर्ट ने अपनी मौखिक टिप्पणी में कहा कि यह पूरी तरह से बंद रहने वाली 'बोलेरो' गाड़ी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना पीछे का दरवाजा खोले कूदकर भागना किसी भी सूरत में संभव नहीं है।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत ने प्रमुख गवाहों को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराने का निर्देश दिया है। पुलिस ने कोर्ट को बताया था कि सनोज के साथ हिरासत में लिए गए दो अन्य लोग डर की वजह से सच बोलने से कतरा रहे हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने सनोज के पिता गौरी शंकर राम के उस बयान को भी रिकॉर्ड पर लिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि कई लोग इस मामले को रफा-दफा करने का दबाव बना रहे हैं। अदालत ने पुलिस को इन आरोपों की निष्पक्ष जांच करने को कहा है।
पिछली दो सुनवाइयों में भी हाई कोर्ट ने जांच की कार्यशैली पर कई गंभीर सवाल उठाए थे। 30 जून को अदालत ने दर्ज किया कि छापेमारी वाले दिन सनोज ने शाम 6:35 और 6:43 बजे अपने पिता को फोन करके बताया था कि उसे उत्पाद विभाग के अधिकारियों ने पकड़ लिया है। जांचकर्ताओं को यह भी पता चला कि सनोज के एक मोबाइल फोन की आखिरी टावर लोकेशन जगदीशपुर आबकारी पुलिस स्टेशन में ही थी।
कोर्ट ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई कि आबकारी अधिकारियों ने अगले दिन मोबाइल फोन पुलिस को सौंप तो दिया, लेकिन उसे फोरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा गया। 24 जून को अदालत ने टिप्पणी की थी कि 10 महीने पहले संदिग्ध पाए जाने के बावजूद टीम के सात सदस्यों से कोई पूछताछ या गिरफ्तारी नहीं हुई थी।
हाई कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर जांच की गति धीमी रही, तो यह मामला किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपा जा सकता है। अब इस केस की अगली सुनवाई 7 जुलाई को होगी, जहां भोजपुर पुलिस को कोर्ट के सामने जांच की आगे की रिपोर्ट पेश करनी होगी।
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