
जून का महीना समाप्त होने के साथ ही वैश्विक स्तर पर मनाया जाने वाला प्राइड मंथ भी विदा ले रहा है। आमतौर पर प्राइड की चर्चाएं भव्य परेडों, उत्सवों और सतरंगी प्रतीकों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाती हैं। लेकिन इस उत्सव की गहरी बुनियाद उन अनगिनत संघर्षों में छिपी है, जो इंसान ने अपनी पहचान, गरिमा और बुनियादी हक के लिए लड़े हैं।
इसी गंभीर विमर्श के बीच फ्रांसीसी लेखक, कला संरक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता पियरे बर्जे की किताब ‘ईव के नाम पत्र’ (Letters to Yves) का एक अंश विचार करने पर मजबूर करता है। 8 मई 2009 को लिखे अपने एक आत्मीय पत्र में बर्जे समलैंगिक पहचान, सामाजिक दृष्टिकोण और छद्म आधुनिकता पर बेहद बेबाकी से टिप्पणी करते हैं। उनका यह लेखन समलैंगिकता को किसी तमाशे या प्रदर्शन के बजाय जीवन के एक सहज सत्य के रूप में स्थापित करता है।
पेरिस लौटकर लिखे इस पत्र में बर्जे समकालीन समाज में बढ़ते जा रहे एक नए किस्म के अलगाववाद या संप्रदायवाद पर गहरी चिंता जताते हैं। वे पेरिस के 'मारेस' जैसे उन इलाकों का उदाहरण देते हैं, जहां पूरी की पूरी आबादी सिर्फ समलैंगिकों की हो चुकी है। बर्जे का मानना है कि रंगभेद, यहूदियों और समलैंगिकों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले नायकों ने कभी ऐसे अलग-थलग पड़ चुके समाज की कल्पना नहीं की थी, जहां लोग अपनी पहचान के आधार पर बस्तियां बांट लें।
बर्जे अपनी और अपने साथी की समलैंगिकता का जिक्र करते हुए एक शाश्वत दर्शन सामने रखते हैं। वे लिखते हैं कि उन्होंने अपनी पहचान को न तो कभी छिपाया और न ही कभी इसका प्रदर्शन किया। उनके अनुसार, अपनी सहज पहचान पर न तो किसी तरह की शर्म होनी चाहिए और न ही कोई अहंकार। हालांकि वे 'गौरव परेड' (Pride Parade) के महत्व को स्वीकार करते हैं, लेकिन उनके लिए इस गौरव का अर्थ सिर्फ इतना है कि समलैंगिक होने के अधिकार की ऐतिहासिक लड़ाई अंततः जीत ली गई है।
इस पत्र का सबसे मारक हिस्सा वह है जहां बर्जे समलैंगिकता को एक 'चॉइस' या चुनी हुई इच्छा मानने की मानसिकता पर प्रहार करते हैं। वे इसे बेहद अपमानजनक मानते हैं कि कोई इसे अपनी मर्जी का विकल्प कहे। वे स्पष्ट करते हैं कि उनके और उनके साथी के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था क्योंकि वे समलैंगिक ही पैदा हुए थे। यह किसी वर्ग की नकल या किसी महत्वाकांक्षा को पूरा करने का जरिया कतई नहीं था।
बर्जे खुद को भाग्यशाली मानते हैं कि वे एक सम्मानजनक और खुला जीवन जी सके, लेकिन वे उन लोगों के दर्द को कभी नहीं भूलते जो सामाजिक, पारिवारिक और पेशेवर दबावों के कारण आज भी अपनी असलियत छिपाकर एक नकली जिंदगी जीने को मजबूर हैं। वे साफ करते हैं कि अधिकारों की उनकी पूरी लड़ाई असल में उन्हीं मूक और विवश लोगों के हक के लिए थी, जिन्हें मुख्यधारा में अपनी जगह बनानी बाकी है।
पत्र के अंत में बर्जे अपनी मां द्वारा लिखे गए एक पुराने पत्र को याद करते हैं, जो उन्होंने बर्जे के 18 साल की उम्र में पेरिस आने पर लिखा था। उनकी मां ने बड़ी संवेदनशीलता से कहा था कि यदि यह समलैंगिकता किसी वर्ग की नकल या अहंकार से प्रेरित है, तो अनुचित है, लेकिन वे हमेशा अपने बेटे की खुशी चाहती हैं। बर्जे इस बात को रेखांकित करते हैं कि वे किसी की नकल नहीं कर रहे थे, बल्कि बस उसी अज्ञात राह पर स्वाभाविक रूप से चल रहे थे जो अंततः उन्हें उनके जीवन के सबसे खूबसूरत सच तक ले आई।
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