
आज महान कथाकार और सामाजिक चेतना के प्रखर संवाहक ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की जयंती है। इस विशेष अवसर पर उनकी कालजयी और झकझोर देने वाली आत्मकथा ‘जूठन’ का एक अत्यंत मार्मिक अंश यहाँ प्रस्तुत है। यह अंश ग्रामीण जीवन की बीभत्स सच्चाई, भीषण अभावों और सामंती क्रूरता के बीच उपजे एक ऐतिहासिक प्रतिरोध को पूरी प्रामाणिकता के साथ बयां करता है।
यह कहानी साल 1962 की है, जब देश के एक हिस्से में मूसलाधार बारिश आफत बनकर टूटी थी। बस्ती में रहने वाले सभी शोषित परिवारों के घर कच्ची मिट्टी से बने थे। कई दिनों की लगातार और बेरहम बारिश ने मिट्टी के इन कमजोर मकानों पर गहरा कहर बरपा दिया था।
लेखक का पैतृक घर जगह-जगह से बुरी तरह टपकने लगा था। छत से गिरते पानी को रोकने के लिए जहाँ-तहाँ खाली बर्तन रख दिए गए थे। उन बर्तनों में गिरने वाली बूंदों से लगातार 'टन-टन' की आवाजें आ रही थीं। पूरा परिवार जागकर खौफ के साए में रातें काटने को मजबूर था, क्योंकि हर वक्त दीवार के धसक जाने का डर बना रहता था।
उसी मूसलाधार बारिश की एक खौफनाक रात में अचानक छत के बीचों-बीच एक बड़ा सूराख हो गया। गीली मिट्टी की कच्ची छत और दीवारों पर चढ़ना किसी बड़े खतरे से कम नहीं था। लेखक का वजन उस समय परिवार में सबसे कम था, इसलिए छत पर चढ़कर सूराख बंद करने की कठीन जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई।
तेज बारिश और घनघोर अंधेरी रात में कुछ भी सूझ नहीं रहा था। लेखक अपने पिताजी के मजबूत कंधों पर पाँव रखकर किसी तरह छत पर चढ़ गए। नीचे खड़े पिताजी लगातार अपनी अनुभवी आवाज में उनका हौसला बढ़ा रहे थे और मार्गदर्शन कर रहे थे।
पिताजी की आवाज अंधेरे में गूँज रही थी, "सँभल के मुंशी जी, पैरा जमा के... छत पर मत जाणा... दीवाल की तरफ ही रहणा।"
लेखक के एक हाथ में मिट्टी का एक बड़ा सा ढेला था और दूसरे हाथ से वे अंधेरे में सूराख तलाश रहे थे। पिताजी नीचे से लगातार पूछ रहे थे, "मुंशी जी, मिला गड्ढा..." आखिरकार कड़ी मशक्कत के बाद लेखक को वह सूराख मिल गया और उन्होंने ढेला रखकर उसे बंद कर दिया।
सूराख बंद करने के बाद वापस नीचे लौटना एक अत्यंत कठिन परीक्षा थी। तेज बारिश के कारण आँखें खोलना भी दूभर था। पिताजी की आवाज का अंदाजा लगाते हुए लेखक धीरे-धीरे वापस आ रहे थे कि अचानक उनका पाँव फिसल गया। एक क्षण के लिए ऐसा लगा जैसे वे हवा में तैर रहे हों, लेकिन उस घने अंधेरे में भी पिताजी की पारखी आँखों ने उन्हें देख लिया और अपनी मजबूत पकड़ में सुरक्षित थाम लिया।
लेखक की चीख सुनकर माँ भी घबराकर बाहर आ गई थीं, लेकिन अपने बच्चे को पूरी तरह सुरक्षित देखकर उन्होंने राहत की सांस ली। लेखक ठंड से बुरी तरह काँप रहे थे, जिसके बाद माँ ने उन्हें सूखे कपड़े से पोंछकर चूल्हे के पास बैठा दिया ताकि शरीर में कुछ गर्माहट आ सके।
आपदा की रात और मामराज तगा की बैठक में पनाह
वह रात पूरी बस्ती के लिए किसी कयामत से कम नहीं थी। लेखक के घर की बैठक का एक बड़ा हिस्सा भरभराकर गिर गया। माँ और पिताजी रात भर एक पल के लिए भी नहीं सोए। पूरी बस्ती में हाहाकार मचा हुआ था और कई मकान जमींदोज हो चुके थे। चारों तरफ से लोगों के चीखने-चिल्लाने की हृदयविदारक आवाजें आ रही थीं।
उसी शोर के बीच पिताजी ने बाहर निकलकर बेहद ऊँची आवाज में पूछा था, "मामू... सब ठीक तो है?" उधर से मामू की भी उतने ही जोर से रोती हुई आवाज आई थी, "ठीक है... पिछवाड़े की कोठरी गिर गई है।"
सुबह होते ही पूरी बस्ती में अपनी जान और आशियाने को बचाने की भगदड़ मच गई। हर कोई किसी सुरक्षित छत की तलाश में बदहवास दौड़ रहा था। बारिश अभी भी लगातार जारी थी और बचे-खुचे जर्जर मकान किसी भी समय गिरकर मलबे में तब्दील हो सकते थे।
पिताजी सुबह होते ही मदद की उम्मीद में उच्च जाति के तगाओं की तरफ निकल गए। वे कुछ ही देर में वापस लौटे और आते ही राहत भरे शब्दों में बोले, "जल्दी करो... मामराज की बैठक खुलवा दी है।" लेखक ने तुरंत जरूरी सामान समेटा और पूरा परिवार सामान सिर पर लादे, बारिश में भीगते हुए मामराज तगा की बैठक में पहुँच गया।
मामराज तगा की वह बैठक बरसों से वीरान और बंद पड़ी थी, जिसका कोई उपयोग नहीं होता था। उसकी दीवारों का प्लास्टर तक उखड़ चुका था। इसके बावजूद, उस भयानक आपदा के समय वह जर्जर पनाहगाह भी उन बेघर लोगों के लिए बेहद सुरक्षित और अनमोल थी।
लेखक के परिवार ने अभी उस बैठक में अपना सामान रखा ही था कि उनके पीछे-पीछे बस्ती के करीब तीस-चालीस लोग और वहाँ पहुँच गए। बाकी अन्य लोग गाँव में दूसरी जगहों पर शरण लेने चले गए थे। देखते ही देखते वह पूरी बैठक इंसानों और उनके घरेलू सामानों से खचाखच भर गई।
अभावों के बीच एकजुटता और चने का वह अद्भुत स्वाद
वहाँ सबसे बड़ी विकट समस्या यह खड़ी हुई कि चूल्हा कैसे जलाया जाए। किसी भी परिवार के पास सूखा ईंधन नहीं बचा था। जो कुछ भी पास में था, वह सब इस मूसलाधार बारिश में पूरी तरह भीगकर बेकार हो चुका था।
आखिरकार, तगाओं के घरों से मिन्नतें करके उपले माँगकर लाए गए और चूल्हे सुलगाने की कोशिश शुरू हुई। उस बंद बैठक के भीतर एक साथ आठ-दस चूल्हे तैयार हो गए। वे चूल्हे और कुछ नहीं, बल्कि महज़ तीन-तीन ईंटों को जोड़कर बनाई गई अस्थायी व्यवस्था थे। जिन्हें ईंट भी नसीब नहीं हुई, उन्होंने आस-पास से पत्थर ढूँढ़कर चूल्हा खड़ा कर लिया था।
उन चूल्हों से उठने वाले घने और काले धुएँ ने पूरी बैठक का नक्शा ही बदल दिया था। उस घुटन भरे माहौल में सांस लेना भी भारी पड़ रहा था। मर्दों की टोली बैठक के बरामदे में इकट्ठा होकर हुक्का गुड़गुड़ा रही थी, औरतें धुएँ से जूझते हुए चूल्हा जलाने का प्रयास कर रही थीं, और बच्चों की चीख-पुकार से पूरा माहौल गूँज रहा था।
साँझ होते ही उस बड़ी बैठक में स्याह अंधेरा छा गया। किसी के पास भी रोशनी का कोई साधन नहीं था; न कोई दीया था, न कोई ढबरी और न ही कोई लालटेन। चूल्हों में जल रही उपलों की मद्धम आग ही उस घने अंधेरे से लड़ने का एक असफल और कमजोर प्रयास कर रही थी।
परंतु, उस भयंकर आपदा और विवशता के वातावरण में एक सकारात्मक बदलाव यह दिखा कि आपसी पुरानी रंजिशें भूलकर बस्ती के सभी शोषित लोग एक ही छत के नीचे आ गए थे। जिसके पास जो कुछ भी खाने को उपलब्ध था, वे उसे आपस में मिल-बाँटकर साझा करना चाहते थे।
उस ऐतिहासिक और कठिन रात को लेखक की माँ ने केवल थोड़ा सा नमक डालकर चने उबाले थे। पूरे परिवार के लिए रात का यही एकमात्र भोजन था। लेखक के शब्दों में, उस रात उन उबले हुए चनों में जो अद्भुत स्वाद और आत्मिक संतुष्टि थी, वैसी अलौकिक संतुष्टि उन्हें जीवन में कभी बड़े-बड़े पाँच सितारा होटलों के महंगे और आलीशान खाने में भी प्राप्त नहीं हुई।
उस पूरी रात किसी भी चूल्हे पर कोई सब्जी या दाल नहीं पकी थी। सूखी रोटी, प्याज और नमक—इसके आगे किसी भी लाचार इंसान के पास कुछ भी उपलब्ध नहीं था।
भूख की बेबसी, क्रूर शर्तें और अमृत समान 'माँड़'
मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं; अगले दिन सुबह से लेकर दोपहर तक किसी भी घर का चूल्हा नहीं जल सका था। लगातार जारी बरसात ने बस्ती में फाकों और भुखमरी की नौबत पैदा कर दी थी। ऐसा लग रहा था मानो पूरा जीवन ही पंगु हो गया हो। लोग अनाज की तलाश में गाँव भर में भटक रहे थे कि कहीं से थोड़ा चावल या गेहूं मिल जाए, ताकि बच्चों का पेट भरा जा सके।
ऐसे संकट के दिनों में शोषितों को कोई उधार भी नहीं देता था। दर-दर भटकने के बाद भी कई लोग खाली हाथ वापस लौट आए थे। लेखक के स्वाभिमानी पिताजी भी गाँव से खाली हाथ ही लौटे थे और उनके चेहरे पर गहरी बेबसी साफ झलक रही थी। गाँव के रसूखदार सगवा प्रधान ने उन्हें अनाज देने के बदले एक बेहद क्रूर और सामंती शर्त सामने रख दी थी।
सगवा प्रधान की सामंती शर्त थी: "अपने किसी लड़के को मेरे यहाँ सालाना नौकर (बंधुआ मजदूर) के रूप में रख दो, और इसके बदले में तुम यहाँ से जितना अनाज चाहो ले जाओ।"
पिताजी इस अपमानजनक और शोषक शर्त को स्वीकार न करते हुए चुपचाप वापस लौट आए थे। लेकिन इसी बीच माँ के प्रयासों से एक बड़ी राहत मिली; उन्हें मामराज तगा के घर से कुछ सेर चावल प्राप्त हो गए थे, जिससे पूरे परिवार को थोड़ी उम्मीद बंधी। कई दिनों के बाद घर में भरपेट खाना बनने का संयोग बना था।
माँ ने चावल उबालने के लिए चूल्हे पर एक बड़ा सा बर्तन चढ़ाया। बर्तन में चावल की मात्रा तो बेहद कम थी, लेकिन पानी ऊपर तक लबालब भर दिया गया था। थोड़ी ही देर में चावल उबलने की सोंधी महक पूरी बैठक में फैल गई, जिसे सूंघकर भूखे छोटे-छोटे बच्चे ललचाई नजरों से चूल्हे की ओर देखने लगे।
जब चावल पूरी तरह उबल गए, तो माँ ने उसका अतिरिक्त उबला हुआ पानी छानकर अलग कर लिया। उस पानी को दो हिस्सों में बाँटा गया। एक हिस्से को माँ ने छौंककर दाल की शक्ल दे दी और दूसरे हिस्से में से सभी भूखे बच्चों को एक-एक कटोरी गरम पानी पीने के लिए दे दिया।
इस उबले हुए चावल के गाढ़े पानी को 'माँड़' कहा जाता था। यह साधारण माँड़ उन गरीब और भूखे बच्चों के लिए किसी पौष्टिक दूध से कम नहीं था। जब भी घर में चावल बनते, पूरी बस्ती के बच्चे खुश हो जाते थे, क्योंकि गरम-गरम माँड़ पीकर उनके कमजोर शरीरों में एक नई स्फूर्ति और ऊर्जा आ जाती थी।
लेखक बताते हैं कि बस्ती के ठीक पास में जुलाहों के घर थे। जब कभी उनके घरों में शादी-विवाह के अवसरों पर दाल-चावल बनते थे, तो लेखक की बस्ती के बच्चे बड़े-बड़े बर्तन लेकर माँड़ माँगने के लिए वहाँ दौड़ पड़ते थे। संपन्न लोगों द्वारा फेंक दिया जाने वाला वह माँड़ इन अछूत बच्चों के लिए गाय के दूध से भी कहीं अधिक मूल्यवान और जीवन रक्षक था।
कई बार जुलाहे उन बच्चों को बुरी तरह डाँट-फटकारकर और अपमानित करके भगाने की कोशिश भी करते थे, लेकिन भूख से लाचार वे बच्चे बेशर्म बनकर वहीं डटे रहते थे। माँड़ पीने का तीव्र लालच उन्हें उस सामाजिक डाँट-फटकार के दर्द से कहीं ज्यादा बड़ा और प्रिय लगता था।
माँड़ में केवल नमक मिलाकर पीना भी बहुत स्वादिष्ट लगता था, और यदि किसी दिन सौभाग्य से थोड़ा सा गुड़ मिल जाता, तो माँड़ का स्वाद अत्यंत लजीज हो जाता था। लेखक स्पष्ट करते हैं कि माँड़ पीने की यह आदत किसी शौक, संस्कृति या फैशन की देन नहीं थी, बल्कि यह घोर अभावों और भुखमरी के फाकों से अपने प्राण बचाने की एक दर्दनाक विवशता थी। समाज की नजरों में जो चीज फेंक देने लायक कचरा थी, वही शोषितों की भूख मिटाने वाली संजीवनी थी।
कक्षा का वह तीखा सवाल और पीठ पर रचा गया 'महाकाव्य'
यह अभाव केवल भोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने लेखक के बालमन को सामाजिक चेतना के एक गहरे बिंदु पर ला खड़ा किया। एक दिन स्कूल में मास्टर साहब महाभारत के महान पात्र द्रोणाचार्य का प्रसिद्ध पाठ पढ़ा रहे थे। मास्टर साहब ने अत्यंत भावुक और रुआँसे होकर कक्षा को बताया कि द्रोणाचार्य इतने गरीब थे कि उन्होंने भूख से तड़पते अपने पुत्र अश्वत्थामा को दूध के स्थान पर आटा पानी में घोलकर पिलाया था।
गुरु द्रोण की इस दारुण और मर्मस्पर्शी गरीबी का नक्शा सुनकर पूरी कक्षा सहानुभूति में 'हाय-हाय' कर उठी थी। यह पूरा प्रसंग द्रोणाचार्य की निर्धनता को स्थापित करने के लिए महाकवि व्यास ने महाभारत में रचा था।
तभी कक्षा में बैठे बालक ओमप्रकाश वाल्मीकि ने हिम्मत जुटाकर खड़े होने की धृष्टता की और मास्टर साहब से एक सीधा, तार्किक और भेदने वाला सवाल पूछ लिया:
"अश्वत्थामा को तो दूध की जगह आटे का घोल पिलाया गया और हमें चावल का माँड़। फिर किसी भी महाकाव्य में हमारा जिक्र क्यों नहीं आया? किसी महाकवि ने हमारे इस दारुण जीवन पर एक भी शब्द क्यों नहीं लिखा?"
यह सवाल सुनते ही समूची कक्षा सन्न रह गई और लेखक का मुँह देखने लगी, मानो उन्होंने कोई बेहद निरर्थक या वर्जित प्रश्न पूछ लिया हो। लेखक का यह बुनियादी सवाल सुनते ही मास्टर साहब क्रोध से तमतमा उठे और चीख पड़े, "घोर कलियुग आ गया है... जो एक अछूत जबान जोरी कर रहा है।"
क्रूर मास्टर ने पढ़ाना छोड़कर लेखक को तुरंत पूरी कक्षा के सामने 'मुर्गा' बना दिया और बार-बार जातिसूचक अपशब्दों का इस्तेमाल करते हुए उनके 'चूहड़े' होने का क्रूर उल्लेख करने लगा। उसने एक छात्र को आदेश देकर शीशम की एक लंबी और मजबूत छड़ी मँगवाई।
मास्टर ने चिल्लाते हुए कहा, "चूहड़े के, तू द्रोणाचार्य से अपनी बराबरी करे है... ले तेरे ऊपर मैं महाकाव्य लिखूँगा..." और इसके बाद उसने लेखक की मासूम पीठ पर सटाक-सटाक छड़ी बरसाकर प्रताड़ना का एक खूनी खेल खेला। लेखक लिखते हैं कि मास्टर की छड़ी से उनकी पीठ पर जो घाव बने, वही असल में शोषितों का 'महाकाव्य' था, जो आज भी उनकी पीठ पर और उनके मस्तिष्क के रेशे-रेशे पर गहराई से अंकित है।
लेखक स्वीकार करते हैं कि अश्वत्थामा के प्रतिशोध की वह सुलगती हुई ज्वाला उन्होंने जीवन में अनेक बार अपने भीतर महसूस की है, जो उनकी सामाजिक बेचैनी और चेतना को हमेशा बढ़ा देती है। बरसों-बरस चावल के इसी माँड़ और अभावों के बीच रहकर उन्होंने अपने जीवन के अंधेरे तहखानों से बाहर आने का एक लंबा और अनवरत संघर्ष किया है।
बचपन में उस माँड़ को पी-पीकर उनके पेट फूल जाते थे और भूख मर जाती थी। वही पतला माँड़ उनके लिए गाय का शुद्ध दूध था और वही उनका सबसे स्वादिष्ट भोजन भी था। यही वह दारुण और शोषित जीवन था, जिसकी आग में झुलसकर उनके जिस्म का रंग हमेशा के लिए बदल गया।
लेखक हिंदी साहित्य और उसके विचारकों को कटघरे में खड़ा करते हुए अंत में एक बेहद कड़वा और वास्तविक सत्य कहते हैं कि पारंपरिक साहित्य में नरक की केवल काल्पनिक और आध्यात्मिक व्याख्याएँ की गई हैं। परंतु, उनके और उनकी बस्ती जैसे करोड़ों शोषितों के लिए बरसात के वे दिन किसी वास्तविक नारकीय जीवन से कम नहीं थे। उन्होंने इस नरक को किसी कल्पना में नहीं, बल्कि अपने जीते-जी साकार रूप में भोगा है। विडंबना यह है कि भारतीय ग्राम्य जीवन की यह इतनी गहरी, दारुण और बीभत्स व्यथा हिंदी के बड़े-बड़े महाकवियों और साहित्यकारों की संवेदना को कभी छू तक नहीं सकी।
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