आयतुल्लाह खामेनेई की मौत के बाद कश्मीर में युवाओं का विरोध प्रदर्शन, लगे 'अमेरिका मुर्दाबाद' के नारे

खामेनेई का भारत से गहरा नाता था। उनके पूर्वज उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के किंतूर गांव से थे। 1980 में उन्होंने भारत का दौरा किया और कश्मीर में शिया-सुन्नी एकता का संदेश दिया था।
श्रीनगर में कश्मीरी शिया मुसलमानों ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के खिलाफ प्रदर्शन किया।
श्रीनगर में कश्मीरी शिया मुसलमानों ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के खिलाफ प्रदर्शन किया। साभार ANI
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नई दिल्ली/तेहरान- ईरान के सर्वोच्च नेता 86 वर्षीय आयतुल्लाह अली खामेनेई 28 फरवरी को अमेरिका-इजराइल के संयुक्त हवाई हमलों में तेहरान के उनके कार्यालय पर बमबारी में शहीद हो गए। ईरान सरकार ने इसकी आधिकारिक पुष्टि की है। ईरान में 40 दिन का राष्ट्रीय शोक और 7 दिन की सार्वजनिक छुट्टियां घोषित की हैं।

ईरानी राज्य टीवी ने उन्हें "इस्लामिक क्रांति के इमाम" और "शहीद" घोषित किया। हमलों में उनकी बेटी, दामाद और पोते की भी मौत की खबर है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने "इतिहास का सबसे भयंकर जवाबी हमला" करने की कसम खाई है।

खामेनेई की शहादत के कुछ ही घंटे बाद ही कश्मीर घाटी में गुस्से और शोक की लहर दौड़ गई। शिया युवाओं और समुदाय के सैकड़ों लोगों ने आज श्रीनगर के सैदा कदल, सोनावारी, बांदीपोरा और बारामूला में जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने अमेरिका और इजराइल के खिलाफ तीखे नारे लगाए – “अमेरिका मुरदाबाद!”, “इजराइल मुरदाबाद!”, “खामेनेई जिंदा है!”, “शहीदों की शहादत जायज़ है!” और “ईरान का बदला हम लेंगे!”।

लाल चौक पर प्रदर्शन कर रहे लोगों ने कहा कि यह हमला पूरी मानवता और संप्रभुता पर प्रहार है। वहीं, एक प्रदर्शनकारी युवक ने कहा कि हमें ईरान से यह दुखद समाचार मिला है कि क्रांतिकारी सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई अब हमारे बीच नहीं रहे। उन्हें अमेरिका और इजरायल ने बेरहमी से मार दिया गया है। इस घटना से हम सभी बेहद दुखी है। श्रीनगर में शिया समुदाय ने शोक सभाएं और जुलूस निकाले।

आयतुल्लाह खामेनेई ने ईरान को एक छोटे-से देश से मध्य पूर्व की सबसे बड़ी क्षेत्रीय शक्ति बनाया। उनके बिना IRGC, परमाणु कार्यक्रम, "प्रतिरोध की धुरी" की कल्पना मुश्किल है। आलोचक उन्हें कठोर शासक कहते हैं, समर्थक "मजलूमों का आवाज"।

इतिहास उन्हें उस नेता के रूप में याद रखेगा जिसने सत्ता और संघर्ष के बीच कभी झुककर नहीं देखा। खामेनेई का भारत से गहरा नाता था। उनके पूर्वज उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के किंतूर गांव से थे। 1980 में उन्होंने भारत का दौरा किया और कश्मीर में शिया-सुन्नी एकता का संदेश दिया था। 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात में उन्होंने दोनों देशों के सांस्कृतिक संबंधों को याद किया। कश्मीर के शिया समुदाय उन्हें “इमाम” की तरह मानते थे। उनकी शहादत पर यहां शोक की लहर है।

क्यों याद रहेंगे आयतुल्लाह खामेनेई?

आयतुल्लाह खामेनेई 1989 से ईरान के सर्वोच्च नेता थे। अमेरिका और इजराइल के लंबे समय से विरोधी रहे। उन्होंने ईरान को परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव और इस्लामिक क्रांति की रक्षा के लिए अडिग लड़ाई लड़ी। हमलों के बावजूद वे तेहरान में ही डटे रहे। दुनिया भर में उनके समर्थक उन्हें "मजलूमों का आवाज" मानते हैं। इतिहास उन्हें उस नेता के रूप में याद रखेगा जिसने अंतिम सांस तक अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

खामेनेई का जन्म 19 अप्रैल 1939 को ईरान के पवित्र शहर मशहद में हुआ। पिता सैय्यद जवाद खामेनेई एक धार्मिक विद्वान थे। बचपन से ही वे शिया इस्लामी परंपरा में गहरे रुचि रखते थे। 13 साल की उम्र में नव्वाब सफवी के भाषण ने उन्हें शाह की राजतंत्र-विरोधी क्रांति की ओर मोड़ दिया।

1958 में वे क़ोम चले गए, जहां उन्होंने आयतुल्लाह रूहोल्लाह खोमैनी के साथ पढ़ाई की। 1960 के दशक में शाह मोहम्मद रजा पहलवी के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में सक्रिय रहे। उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया, यातनाएं दी गईं। 1979 की इस्लामिक क्रांति में वे खोमैनी के सबसे करीबी सहयोगियों में से एक थे। क्रांति के बाद वे इस्लामिक रिपब्लिक पार्टी के संस्थापक सदस्य बने।

1981 में राष्ट्रपति मोहम्मद अली राजई के शहीद होने के बाद खामेनेई राष्ट्रपति चुने गए। उन्होंने दो टर्म (1981-1989) पूरा किए। इस दौरान ईरान-इराक युद्ध (1980-88) चला, जिसमें उन्होंने देश की रक्षा में अहम भूमिका निभाई। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को मजबूत किया, जो आज ईरान की सबसे शक्तिशाली सेना है।

युद्ध के बावजूद आर्थिक सुधार और इस्लामी कानूनों को लागू किया। वेलायत-ए-फकीह (धार्मिक विद्वान की सर्वोच्चता) की अवधारणा को मजबूत किया।

सर्वोच्च नेता के रूप में 36 वर्ष (1989-2026): सबसे बड़ा योगदान

खोमैनी के निधन (3 जून 1989) के बाद असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स ने उन्हें सर्वोच्च नेता चुना। यह पद ईरान का सबसे शक्तिशाली पद है – सेना, न्यायपालिका, मीडिया, विदेश नीति सब पर नियंत्रण। IRGC को उन्होंने आधुनिक हथियारों, ड्रोन और मिसाइल कार्यक्रम से लैस किया। आज IRGC मध्य पूर्व में "एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस" (हिजबुल्लाह, हमास, हूती, हश्द अल-शाबी) का मुख्य समर्थक है।

उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को "राष्ट्रीय सुरक्षा" का हिस्सा बनाया। JCPOA (2015) समझौते के बावजूद अमेरिकी वापसी (2018) के बाद भी कार्यक्रम जारी रखा। यह ईरान को परमाणु क्षमता की दहलीज पर लाया।

अमेरिका और इजराइल को "शैतान" कहते हुए कभी समझौता नहीं किया। "मृत्यु अमेरिका को" और "इजराइल मिटाओ" के नारे उनके दौर की पहचान बने। उन्होंने ईरान को प्रतिबंधों के बावजूद आत्मनिर्भर बनाया। 2009 के ग्रीन मूवमेंट, 2019-2022 के प्रदर्शनों (महसा अमिनी आंदोलन) को दबाया। 100+ किताबें लिखीं/अनुवाद कीं – कुरान, इस्लामी दर्शन, "दुश्मन पहचान", "सांस्कृतिक आक्रमण" आदि। उन्होंने युवाओं में इस्लामी क्रांति की विचारधारा फैलाई। "जिहाद-ए-खुद-काफाई" (आत्मनिर्भरता) अभियान चलाया। ईरान को ड्रोन, मिसाइल और साइबर क्षमता में मजबूत बनाया।

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