
रामगढ़- बिहार के बेऊर जेल में बंद पत्रकार रूपेश कुमार सिंह के साथ जेल प्रशासन द्वारा लगातार मानवाधिकारों के हनन का एक गंभीर मामला सामने आया है। उनकी पत्नी ईप्सा शताक्षी ने राज्य मानवाधिकार आयोग, पटना को एक लिखित पत्र भेजकर आरोप लगाया है कि जब भी उनके पति ने जेल के अंदर बंदियों को मिलने वाली खराब सुविधाओं, जेल मैनुअल के उल्लंघन और अमानवीय खान-पान के खिलाफ आवाज उठाई, तो उन्हें प्रशासनिक आदेश देकर एक जेल से दूसरी जेल धकेल दिया गया।
ईप्सा शताक्षी के पत्र के अंश यहां दिए गये हैं:
"मेरे द्वारा इससे पूर्व मेरे पति रुपेश कुमार सिंह के संबंध में राजकीय मानवाधिकार आयोग को शिकायत की गई थी कि उनके स्वास्थ्य समस्याओं के बावजूद उन्हें आदर्श केन्द्रीयकारा, बेऊर जेल प्रशासन द्वारा न तो उचित स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराई जा रही थी, न ही जेल प्रशासन द्वारा जेल मैन्युअल के अनुसार खान पान ही दिया जा रहा था। इस संबंध में एनआईए कोर्ट द्वारा दो बार समुचित इलाज के लिए आदेश भी पास हुए पर उसका अनुपालन भी नहीं किया गया। माननीय द्वारा इस पर पहल लिया गया था-(for Bihar SHRC proceedings in case no. 1234/4/0/2026.- HRCNET, NHRC) और बेऊर जेल ने एक बार पटना के पीएमसीएच में दिखाया भी, जहां खून जांच में बताया गया कि Direct LDLC तथा Total Cholesterol बढ़ा हुआ है साथ ही एन्जायटी की समस्या भी है। पर यहां भी पीठ व कमर दर्द तथा एलर्जी से संबंधित जांच या इलाज नहीं करवाया गया।
पूरा घटनाक्रम कुछ इस प्रकार है कि मेरे पति ने 2024 में बेऊर जेल में रहते हुए वहाँ पर जेल मैन्युअल के अनुसार डाइट देने व सुविधा उपलब्ध कराने के संबंध में पहल किया था तो उसके तुरंत बाद उनका स्थानांतरण शहीद जुब्बा सहनी सेंट्रल जेल, भागलपुर 22 जनवरी 2024 को कर यह कहते हुए कर दिया गया कि प्रशासनिक आदेश है। और छह माह के जेल ट्रांसफर की जगह 1 साल 8 महीने वहां रखा गया, वह भी लगातार सेल में।
चूंकि जेलों की व्यवस्था बंदियों के लिए लगभग जेलों में बदतर होती जा रही है, तो यहां भागलपुर में भी उन्हें पढ़ने की सामग्री, लाइट, डाइट, स्वच्छ पानी जैसे मूलभूत जरूरतों के लिए पहल करनी पड़ी थी, जो उपलब्ध नहीं कराने और नारकीय स्थिति होने के कारण उन्होंने जेल से ही डीएम को खत भी लिखा था और मानवाधिकार आयोग में शिकायत भी की थी जिसके उपरांत कुछ सुधार हुए थे, चूंकि शिकायत का मूल उद्देश्य जेल में बंदियों की बदतर स्थिति में सुधार था, स्थिति बदलने के बाद कोई शिकायत नहीं की गई। पर कुछ दिनों बाद से उन्हें कुछ स्वास्थ्य संबंधित तकलीफ हो रही थी निरंतर सर्दी, हाई ब्लडप्रेशर, शुगर लेवल बढ़ना, बैचेनी, जिसे कोर्ट में बार बार आवेदन देने के बाद आदेश होने पर खून जांच हुआ और पता चला था कि मेरे पति का VL DL CHOLESTEROL -125 था जबकि Normal range under 30 होना चाहिए। Serum Triglycerides-519 था जबकि Normal range under 150 होना चाहिए। जो काफी खतरनाक स्थिति थी, कोर्ट द्वारा तुरंत डाक्टर को दिखाने के आदेश होने पर भागलपुर जेल प्रशासन द्वारा तुरंत भागलपुर के मायागंज अस्पताल में दिखाया गया, और कुछ ही दिनों में वह लगभग कंट्रोल हो गया हालांकि कौन सी दवा दी गई मुझे नहीं पता, पर डाक्टर ने रेगुलर चेकअप की सलाह दी। उसके बाद फिर चेकअप कराने के पहले उन्हें 23 सितम्बर 2025 को वापस बेऊर भेज दिया गया।
चूंकि मेरे पति से संबंधित केस, पटना सिविल कोर्ट में चल रहा है और मामला गवाही के स्टेज पर है, अतः फेयर ट्रायल के लिए हमने कोर्ट में पटना ट्रांसफर के लिए अर्जी लगाई थी इसके बाद काफी टाल-मटोल के बाद उन्हें पटना के आदर्श केन्द्रीय कारा, बेऊर 23 सितंबर 2025 को भेजा गया। हमारे अर्जी लगाने के पीछे की एक उम्मीद यह भी थी कि पटना में अच्छे हास्पिटल हैं और यहाँ मेरे पति को उचित उपचार मिल सकेगा।
"अभी 23 मार्च 2026 को बेऊर जेल में लगभग छः महिने बाद हार्ट संबंधित कुछ चेकअप करवाए गए। इसमें भी हालांकि मेरे पति की समस्या बनी रही। स्वास्थ्य परेशानी से ग्रस्त होने के बावजूद 9 अप्रैल को उन्हें प्रशासनिक आधार बताकर पुनः शहीद जुब्बा सहनी केंद्रीय कारा ट्रांसफर कर दिया गया है जबकि उनके केस का ट्रायल एनआइए पटना सिविल कोर्ट में चल रहा है। किसी भी बंदी को मेडिकल रिपोर्ट और संबंधित कोर्ट के आदेश के बाद ही एक जेल से दूसरे जेल भेजा जा सकता है, पर मेरे पति के ट्रांसफर के लिए न ही कोर्ट की अनुमति ली गई न ही मेडिकल रिपोर्ट दी गई।
माननीय, जब भी किसी जेल में बदतर स्थिति पर मेरे पति द्वारा आवाज उठाई जाती है और जानवरों को दिए जाने लायक खान-पान पर में जेल प्रशासन से संबंधित जेल मैन्युअल के हिसाब से खान-पान मांगा जाता है, तब उन्हें शांति व्यवस्था भंग करने के नाम पर और मनगढ़ंत आरोप लगाकर बार-बार प्रशासनिक ट्रांसफर कर दिया जा रहा है। जो इस बार भी हुआ, इसकी आंशका मेरे पति ने पटना के डीएम को लिखे पत्र में भी की थी। और माननीय न्यायालय के समक्ष भी जताई थी।
जेल ट्रांसफर के लिए जेल प्रशासन द्वारा मनगढ़ंत आरोपों की न तो जांच होती है न ही बंदी को अपना पक्ष रखने का ही मौका दिया जाता है। साथ ही न कभी परिवार को ही जानकारी दी जाती है, न तो ट्रांसफर के पहले न ही बाद।
माननीय क्या कोई आरोप लगा देने मात्र से ही कोई दोषी सिद्ध हो जाता है? माननीय को बताना है कि भागलपुर का जुब्बा सहनी केंद्रीयकारा मेरे निवास स्थान से लगभग 350 किलोमीटर दूर है, मेरा एक छोटा सा बच्चा है जो स्कूल जाता है। भागलपुर में केस नहीं है अतः वहां हमारे वकील भी नहीं हैं ऐसे में मेरे लिए यह सब बहुत ही परेशानी भरा व आर्थिक रूप से भी बोझिल हो जाता है।
पटना में रहने से 'फेयर ट्रायल' के साथ-साथ वकील से बातचीत व कोर्ट में पेशी के दौरान मेरा बेटा जो चार सालों से अपने पिता से दूर है दो बार अपने पिता से आमने-सामने मिल भी सका, अपने मन की बात कह सका व पिता को छू भी सका।
वरना जेल से मात्र 5 मिनट की कॉल, वह भी महीने में केवल छह बार होती है। जिसमें हाल चाल पूछते ही खत्म हो जाता है तो कभी खराब नेटवर्क के कारण वह भी नहीं हो पाता है।
माननीय, मेरे पति पेशे से पत्रकार है और हमेशा मानवाधिकार मुद्दों पर, वंचित लोगों के आवाज के लिए लिखते रहे हैं, उन्होंने अपनी कलम के साथ हमेशा न्याय किया है, जिसके कारण ही गलत तरीके से फंसाए गए हैं। जेल के अंदर भी बंदियों के स्वास्थ्य सुविधा, डाईट, बंदी अधिकार जो कि हमारा संविधान बंदियों को देता है, जेल मैन्युअल में लिखा है, उसी की ही बात उन्होनें की है। जिसके बदले में उनका जेल ट्रांसफर कर दिया गया है। वे स्वास्थ्य समस्या से जूझने के बावजूद भी लगभग 2 वर्षों से लगातार सेल में रखे गए हैं, जो एंजायटी और स्लिप डिस्क जैसी समस्या को और बढ़ाते हैं। चूंकि सेल में न तो टहलने-घूमने की ही पर्याप्त जगह होती है, न तो मनोरंजन जैसे खेल या संगीत की ही व्यवस्था होती है। जिसके कारण शारीरिक और मानसिक परेशानी बनी रहती है।
उनकी स्वास्थ्य परेशानियों को जीवन शैली में सुधार करके शायद संभाला जा सकता है पर वास्तव में एक 'पनिशमेंट अवस्था' में वे दो साल से रखे गए हैं आज भी एक बार फिर जेल ट्रांसफर इसी चीज को दिखा रहा है।
माननीय, अगर ऐसा होगा तो कोई भी बंदी जेल के अनियमित और भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ कैसे बोलने की हिम्मत कर सकेगा? मेरे पति का इस प्रकार जेल ट्रांसफर करना मानवाधिकार का हनन है। इससे न ही सिर्फ इनका स्वास्थ्य प्रभावित हुआ है बल्कि आगे उनका अपना 'फेयर ट्रायल' भी प्रभावित होगा। अपने अधिवक्ता से संपर्क मुश्किल होगा, और हमें भी फिर से कई किलोमीटर दूर मुलाक़ात के लिए जाने की एक नयी मानसिक, आर्थिक और शारीरिक परेशानियां झेलनी पड़ेंगी।
अतः माननीय से निवेदन है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर न सिर्फ मेरे पति के लिए बल्कि संपूर्ण बंदियों के लिए उनके बंदी अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए कोई उचित पहल ली जाए। जेल ट्रांसफर की यह दंडात्मक प्रकृति से मानवाधिकार की रक्षा सुनिश्चित की जाए। जेल ट्रांसफर की यह कारवाई महज जेल प्रशासन द्वारा बंदियों को उनके द्वारा उनके हक अधिकार की बात रखने के बदले दी जाने वाली सजा बनकर रह गई है, इसमें न तो कोई पारदर्शिता होती है न ही कभी भी बंदी के पक्ष को सुना जाता है और न ही हर बार माननीय न्यायालय से ही आदेश लिया या बताया जाता है।
मुझे विश्वास है कि माननीय द्वारा इस पर यथोचित कदम उठाया जाएगा। इसके लिए मैं माननीय की आजीवन आभारी रहूँगी।"
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