संयुक्त राष्ट्र समिति ने भारत में दलितों और आदिवासियों के अधिकारों पर जताई गंभीर चिंता, पुलिसिया ज्यादती व हेट क्राइम पर कही ये बात..

संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार समिति ने भारत में दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ कथित हिंसा पर चिंता जताते हुए सरकार से तत्काल और निष्पक्ष जांच की मांग की है।
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संयुक्त राष्ट्र (UN) ने भारत में दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ कथित हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघन पर चिंता जताई है।
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नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति (CERD) ने भारत में दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ कथित गैर-न्यायिक हत्याओं, प्रताड़ना और पुलिसिया दुर्व्यवहार की घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की है। वैश्विक निकाय ने भारत सरकार से इन मामलों की गहन जांच कराने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने की अपील की है। इसके साथ ही नफरती अपराधों, नस्लीय प्रोफाइलिंग और जबरन निर्वासन के मामलों पर भी तत्काल कदम उठाने का आह्वान किया गया है।

समिति द्वारा जारी निष्कर्षों के अनुसार, कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा हाशिए पर मौजूद जातीय और नस्लीय समूहों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, दलितों और गैर-नागरिकों के अधिकारों के बड़े पैमाने पर उल्लंघन की रिपोर्टें सामने आई हैं। इन उल्लंघनों में नस्लीय हिंसा, बल का अत्यधिक प्रयोग, मनमानी व लंबी हिरासत, प्रताड़ना और यौन हिंसा जैसी गंभीर घटनाएं शामिल हैं।

18 स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों वाली यह समिति 182 सदस्य देशों में नस्लीय भेदभाव उन्मूलन से संबंधित अंतरराष्ट्रीय समझौते (कन्वेंशन) के पालन की निगरानी करती है। यह कन्वेंशन वर्ष 1969 में लागू हुआ था, जिसके तहत सदस्य देशों को नस्लीय भेदभाव खत्म करने, अलगाववादी प्रथाओं को समाप्त करने और कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता निभानी होती है।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2007 के बाद भारत पहली बार इस समिति के समक्ष समीक्षा प्रक्रिया में शामिल हुआ। इस समीक्षा बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने किया।

वैश्विक समिति ने रोहिंग्या, बंगाली भाषी मुस्लिम, प्रवासियों और शरणार्थियों को निशाना बनाकर चलाए जाने वाले अभियानों पर भी चिंता जताई है। रिपोर्ट के अनुसार, पहचान जांच और नस्लीय प्रोफाइलिंग के चलते बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के मनमानी गिरफ्तारियां और दुर्व्यवहार के मामले बढ़े हैं। समिति ने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा की आवश्यकता वाले व्यक्तियों के जबरन निर्वासन पर रोक लगाने और सामूहिक निष्कासन से बचने का आग्रह किया है।

यद्यपि इस संयुक्त राष्ट्र समिति की सिफारिशें कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इनका कूटनीतिक और नैतिक महत्व काफी अधिक माना जाता है।

दूसरी ओर, भारत के स्थायी मिशन ने स्पष्ट किया कि समीक्षा के दौरान भारतीय दल ने देश की समृद्ध विविधता, बहुलवाद, संवैधानिक सुरक्षा तंत्र और कानूनी ढांचे को पूरी मजबूती से प्रस्तुत किया। भारतीय पक्ष ने रेखांकित किया कि देश अपने सभी नागरिकों के लिए समानता, सम्मान और अवसर सुनिश्चित करने के पथ पर पूरी प्रतिबद्धता से आगे बढ़ रहा है।

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