उमर खालिद-शरजील इमाम को जमानत नहीं: SC फैसले पर वकील, CPI और एक्टिविस्ट्स का गुस्सा, क्या है पूरा मामला?

इस फैसले ने सोशल मीडिया पर तीखी बहस छेड़ दी, जहां एक ओर एक्टिविस्ट्स और पत्रकारों ने इसे 'न्यायिक अन्याय' और 'संस्थागत बदले की भावना' करार दिया, वहीं समर्थक पक्ष ने इसे 'राष्ट्रीय सुरक्षा की मजबूत जीत' बताया।
Umar Khalid and sharjeel imam
उमर खालिद और शरजील इमाम
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नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने आज दिल्ली दंगों के 'बड़े साजिश' मामले में पूर्व जेएनयू छात्र उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया, जबकि गुल्फिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को 12 शर्तों के साथ जमानत प्रदान की। अदालत ने यूएपीए के तहत उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया साक्ष्य का हवाला देते हुए कहा कि उनकी भूमिका 'योजना, जुटाव और रणनीतिक दिशा' में केंद्रीय थी, और वे एक वर्ष बाद या संरक्षित गवाहों की जांच के बाद नई याचिका दायर कर सकते हैं।

पांच वर्ष से अधिक की हिरासत के बावजूद, कोर्ट ने मुकदमे की देरी को जमानत का 'ट्रंप कार्ड' नहीं माना। अपैक्स कोर्ट ने कहा कि उसने सामूहिक दृष्टिकोण से परहेज करते हुए प्रत्येक आरोपी की भूमिका का स्वतंत्र रूप से विश्लेषण किया है। न्यायालय ने निचली अदालत को प्रक्रिया में तेजी लाने का निर्देश भी दिया। जिन अपीलकर्ताओं को जमानत दी गई है, उन पर बारह जमानत शर्तें लगाई गई हैं, जिनका उल्लंघन करने पर जमानत रद्द की जा सकती है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने फैसला सुनाया।

इस फैसले ने सोशल मीडिया पर तीखी बहस छेड़ दी, जहां एक ओर एक्टिविस्ट्स और पत्रकारों ने इसे 'न्यायिक अन्याय' और 'संस्थागत बदले की भावना' करार दिया, वहीं समर्थक पक्ष ने इसे 'राष्ट्रीय सुरक्षा की मजबूत जीत' बताया।

जस्टिस कुमार ने फैसला सुनाते हुए कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम के तहत अभियोगों में, मुकदमे की सुनवाई में देरी को "ट्रम्प कार्ड" के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है जो स्वतः ही वैधानिक सुरक्षा उपायों को निरस्त कर दे। साथ ही न्यायालय ने यह भी कहा कि यूएपीए की धारा 43डी(5) प्रथम दृष्टया मामले की पुष्टि के लिए न्यायिक जांच को पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं करती है। न्यायिक जांच "आरोपी-विशिष्ट" होती है। इसके अलावा, जमानत के चरण में बचाव पक्ष के तर्कों की जांच नहीं की जानी चाहिए।

लीगल बैकग्राउंड

यह स्पेशल लीव पिटीशन दिल्ली हाई कोर्ट के 2 सितंबर के फैसले के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं।

याचिकाकर्ता जो 2019-2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम विरोधी विरोध प्रदर्शनों को आयोजित करने में सबसे आगे थे, पर फरवरी 2020 के आखिरी हफ्ते में राष्ट्रीय राजधानी में हुए सांप्रदायिक दंगों के पीछे "बड़ी साजिश" रचने के आरोप में गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के तहत आरोप लगाए गए हैं।

इस मामले में आरोपी- ताहिर हुसैन, उमर खालिद, खालिद सैफी, इशरत जहां, मीरान हैदर, गुलफिशा फातिमा, शिफा-उर-रहमान, आसिफ इकबाल तन्हा , शादाब अहमद, तस्लीम अहमद, सलीम मलिक, मोहम्मद सलीम खान, अथर खान, सफूरा जरगर (गिरफ्तारी के समय गर्भवती होने के कारण मानवीय आधार पर जमानत मिली), शरजील इमाम, फैजान खान, देवंगाना कलिताऔर नताशा नरवाल हैं। (सफूरा जरगर, आसिफ इकबाल तन्हा, देवंगाना कलिता और नताशा नरवाल को जमानत मिल चुकी है)

2 सितंबर के फैसले में उमर खालिद, शरजील इमाम, अथर खान, खालिद सैफी, मोहम्मद सलीम खान, शिफा उर रहमान, मीरान हैदर, गुलफिशा फातिमा और शादाब अहमद को जमानत नहीं मिली।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व ट्विटर) पर तत्काल प्रतिक्रियाओं का सैलाब उमड़ा है। वकीलों, सक्रियताकर्ताओं और विपक्षी दलों ने फैसले को 'संस्थागत क्रूरता' और 'लोकतंत्र के लिए आपदा' करार दिया, जबकि समर्थक पक्ष ने इसे 'राष्ट्रीय सुरक्षा की जीत' बताया।

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) ने अपने हैंडल से किये पोस्ट में लिखा: "सुप्रीम कोर्ट द्वारा #उमरखालिद और #शरजीलइमाम को ज़मानत देने से इनकार करना, जो बिना किसी ट्रायल या सज़ा के, कठोर #UAPA कानून के तहत पाँच साल से ज़्यादा समय से जेल में हैं, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। लंबे समय तक बिना ट्रायल के जेल में रखना इस मौलिक सिद्धांत का उल्लंघन करता है कि ज़मानत नियम है, जेल नहीं, और स्वतंत्रता और जल्द सुनवाई के संवैधानिक अधिकार को कमज़ोर करता है। असहमति की आवाज़ों को निशाना बनाने के लिए UAPA का लगातार इस्तेमाल दमन और चुनिंदा न्याय के एक परेशान करने वाले पैटर्न को दिखाता है। हम सभी राजनीतिक कैदियों की रिहाई की अपनी मांग दोहराते हैं।"

लेखक-स्क्रीनराइटर दाराब फारूकी ने कहा, "हम हिंसा का जवाब हिंसा से नहीं देंगे, हम नफ़रत का जवाब नफ़रत से नहीं देंगे," हाँ, भारत को एकजुट करने वाले भाषण के लिए, संघी सुप्रीम कोर्ट और संघी भारत सरकार को उमर खालिद को जेल में रखना चाहिए।" पत्रकार कौशल राज ने लिखा, "गुल्फिशा फातिमा, शिफा उर रहमान आदि को पांच वर्ष बाद जमानत, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत खारिज। बिना मुकदमे जेल।"

एक अन्य यूजर ने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए लिखा, " जब दिल्ली में दंगे हुए, तब उमर खालिद शहर में थे ही नहीं। मिश्रा बंधुओं का रोल, जो बंदूकें लेकर "गोली मारो सालों को" चिल्लाते हुए आए थे, SC या पुलिस को पता नहीं है, इसलिए वे दिल्ली पर राज कर रहे हैं!आइए, मादुरो के अपहरण पर अमेरिका के खिलाफ आवाज़ उठाते रहें।"

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