सिर्फ नागरिकता देना काफी नहीं, छत भी जरूरी: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में पाक विस्थापित दलित हिंदुओं की बेदखली पर लगाई रोक

नागरिकता के साथ गरिमा भी जरूरी: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से 4 हफ्तों में मांगा जवाब, मजनू का टीला में 250 परिवारों को मिली बड़ी राहत
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली के मजनू का टीला इलाके में रहने वाले पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने प्रशासन द्वारा चलाए जाने वाले बेदखली अभियान (Eviction Drive) पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।

सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि इन विस्थापित परिवारों को केवल भारतीय नागरिकता दे देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने के लिए 'सिर पर छत' मुहैया कराना भी सरकार की जिम्मेदारी है।

4 हफ्तों तक नहीं उजड़ेंगे आशियाने

जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सरकार को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस मसले पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है।

अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि जब तक सरकार का जवाब नहीं आ जाता और मामले की अगली सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक इन परिवारों के खिलाफ किसी भी तरह की तोड़फोड़ या विस्थापन की कार्रवाई नहीं की जाएगी। कोर्ट के इस आदेश से वहां चल रहे विकास कार्यों या अतिक्रमण हटाने की मुहिम के चलते बेघर होने के डर का सामना कर रहे लोगों को फौरी सुरक्षा मिल गई है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला दिल्ली में सिग्नेचर ब्रिज के पास, मजनू का टीला इलाके में बरसों से रह रहे हिंदू शरणार्थियों से जुड़ा है। ये सभी अनुसूचित जाति (Dalit Hindu) से ताल्लुक रखते हैं और पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत आए थे।

अदालत ने चिंता जताते हुए कहा कि नागरिकता मिलने के बावजूद ये लोग बेघर होने के खतरे का सामना कर रहे हैं। पीठ ने जोर देकर कहा कि नागरिकता के साथ-साथ इन समुदायों के लिए उचित पुनर्वास और आवास की व्यवस्था होना बेहद जरूरी है, ताकि वे गरिमापूर्ण जीवन जी सकें।

1000 से ज्यादा लोगों को मिली राहत

सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश (Interim Protection) का सीधा फायदा करीब 250 परिवारों को मिलेगा। इन परिवारों में लगभग 1,000 से अधिक लोग शामिल हैं, जो पिछले कई वर्षों से इसी इलाके में रह रहे हैं। हाल के दिनों में इन पर अपने घरों को खोने का संकट मंडरा रहा था, जिससे इनके पुनर्वास और भविष्य को लेकर अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई थी। अब कोर्ट के दखल के बाद इन्हें एक उम्मीद की किरण दिखाई दी है।

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