नई दिल्ली: संसद और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों के रोटेशन (चक्रानुक्रम) को अनिवार्य बनाने की मांग वाली एक याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (4 नवंबर 2026) को खारिज कर दिया है। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे फैसले लेना विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है और न्यायालय इस संबंध में कोई आदेश पारित नहीं कर सकता।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) को सही ठहराया गया था। यह धारा उन क्षेत्रों में आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान करने का प्रावधान करती है, जहां SC/ST आबादी का अनुपात तुलनात्मक रूप से अधिक है।
यह याचिका उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की 191-कादीपुर विधानसभा सीट के मतदाता जगदीश सिंह ने दायर की थी। उन्होंने अपनी सीट के लगातार आरक्षित रहने को चुनौती देते हुए कहा था कि यह निर्वाचन क्षेत्र बनने के बाद से करीब सात दशकों से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित चला आ रहा है।
याचिकाकर्ता की दलील थी कि रोटेशन व्यवस्था का न होना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19 का सीधा उल्लंघन है। उनका कहना था कि इससे मतदाताओं के चुनावी विकल्प सीमित हो जाते हैं, क्योंकि वे केवल SC समुदाय के उम्मीदवारों को ही अपना प्रतिनिधि चुन सकते हैं। इसके साथ ही, उन्होंने यह भी दावा किया कि मौजूदा व्यवस्था से व्यापक समुदाय के बजाय केवल कुछ गिने-चुने राजनीतिक परिवारों को ही फायदा हो रहा है।
सिंह ने अपनी याचिका में मांग की थी कि संविधान के अनुच्छेद 243D और 243T के तहत पंचायतों और नगर पालिकाओं में जिस तरह से रोटेशनल रिजर्वेशन (चक्रानुक्रम आरक्षण) की व्यवस्था है, वैसा ही तंत्र यहां भी लागू किया जाए। उन्होंने पीठ से SC/ST आरक्षित सीटों को समय-समय पर रोटेट करने का निर्देश देने का आग्रह किया था।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने एक बेहद अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि बहुदलीय लोकतंत्र में मतदाताओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे जाति या धर्म के बजाय राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर अपना वोट दें।
जस्टिस बागची ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि एक राजनीतिक लोकतंत्र में अलग-अलग विचारधाराओं वाली कई पार्टियां होती हैं। आप किसी विचारधारा को पसंद या नापसंद कर सकते हैं, लेकिन उस विचारधारा का प्रतिनिधित्व कौन कर रहा है, यह अप्रासंगिक हो जाता है। आप विचारधारा को वोट देते हैं, इसलिए आपका यह तर्क अपने आप खारिज हो जाता है।
पीठ ने वोट देने के अधिकार और किसी विशेष सीट से चुनाव लड़ने के अधिकार के बीच भी स्पष्ट अंतर बताया। अदालत ने कहा कि सामान्य वर्ग के उम्मीदवार उन निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने के लिए पूरी तरह से योग्य हैं जो आरक्षित श्रेणी में नहीं आते हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने इस नीतिगत बदलाव की मांग के लिए गलत मंच का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने सुझाव दिया कि रोटेशन की इस मांग को सीधे संसद के समक्ष उठाया जाना चाहिए। हल्के-फुल्के अंदाज में सीजेआई ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता इस मुद्दे को जन-विरोध और प्रदर्शनों के माध्यम से भी उठा सकते हैं।
अपने अंतिम आदेश में पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने यह मानते हुए मामले को खारिज कर दिया था कि आदर्श रूप से रोटेशन का पालन होना चाहिए, लेकिन अदालत ऐसा निर्देश नहीं दे सकती क्योंकि यह पूरी तरह से संसद के दायरे में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उन्हें हाईकोर्ट के इस विचार से अलग राय रखने का कोई आधार नहीं दिखता।
हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को इस बात की पूरी छूट दी है कि वे अपनी मांग को लेकर जनप्रतिनिधियों से संपर्क कर सकते हैं और उन्हें रोटेशन के सिद्धांत को अपनाने के लिए राजी कर सकते हैं।
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