
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (30 अप्रैल, 2026) को केंद्र सरकार को एक बेहद अहम निर्देश दिया है। अदालत ने कहा है कि नाबालिग दुष्कर्म पीड़िताओं के मामले में अनचाहे गर्भ को गिराने (अबॉर्शन) की कानूनी समय सीमा को खत्म करने के लिए कानून में संशोधन किया जाना चाहिए।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। दरअसल, हाल ही में शीर्ष अदालत ने 15 साल की एक रेप पीड़िता को 30 हफ्ते का गर्भ गिराने की अनुमति दी थी। सरकार ने इस फैसले के खिलाफ क्यूरेटिव पिटीशन दायर की थी, जिसे सुनने से इनकार करते हुए पीठ ने अपना कड़ा रुख स्पष्ट किया।
अदालत में केंद्र का पक्ष रखते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी और एम्स (AIIMS) के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने इस अबॉर्शन का विरोध किया था। उनका तर्क था कि यह फैसला किशोरी और 'अजन्मे बच्चे' दोनों के स्वास्थ्य व भलाई के दृष्टिकोण से ठीक नहीं है। एम्स के एक विशेषज्ञ डॉक्टर ने तो यहां तक कहा कि अदालत का इसे 'भ्रूण और बच्ची' का मुद्दा मानना गलत है, बल्कि यह वास्तव में 'बच्चे और बच्चे' (child-child) से जुड़ा संवेदनशील मसला है।
'पीड़िता के लिए फैसले लेने का अधिकार राज्य को नहीं'
इस दलील पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए अदालत ने साफ किया कि पीड़िता के लिए सबसे अच्छा क्या है, इसका फैसला राज्य या डॉक्टर बिल्कुल नहीं कर सकते। यह निर्णय पूरी तरह से पीड़िता और उसके माता-पिता के विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए।
जस्टिस बागची ने सख्त लहजे में कहा कि मेडिकल स्टाफ को आम लोगों की इच्छा का मालिक नहीं बनना चाहिए। जनता को खुद अपने फैसले तय करने का हक है। अदालत के अनुसार, सरकार और डॉक्टरों का दायरा सिर्फ मेडिकल प्रक्रिया को समझाना और काउंसलर के रूप में विशेषज्ञ मदद मुहैया कराने तक सीमित है।
उन्होंने केंद्र और एम्स के डॉक्टरों को स्पष्ट किया कि राज्य इस मामले में फैसले की समीक्षा (रिव्यू) की मांग नहीं कर सकता क्योंकि उसे इसका कोई कानूनी अधिकार (locus standi) हासिल नहीं है। यह एम्स को नहीं बल्कि नागरिकों को चुनना है कि उन्हें क्या करना है और एम्स का काम केवल उनके उस चुनाव को चिकित्सकीय रूप से लागू करना है।
'जिंदगी भर का स्थायी घाव नहीं दे सकते'
मामले की गंभीरता को समझते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि 15 साल की वह बच्ची पहले ही दुष्कर्म के भयानक सदमे से गुजर चुकी है। उसे किसी भी हाल में बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। उसके साथ हुए अन्याय को जीवन भर के लिए एक 'स्थायी घाव' बनाकर उसके साथ नहीं छोड़ा जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश ने डॉक्टरों और कानून अधिकारी को संबोधित करते हुए कहा कि कानून क्षणिक भावनाओं के आगे नहीं झुक सकता, उसे पीड़िता का पूरा भविष्य देखना होता है। अगर इसके लिए कानून को कठोर भी होना पड़े, तो उसे होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अदालत केवल उस बच्ची की रक्षा कर रही है जिसका चेहरा उनकी तरफ उम्मीद से देख रहा है।
'एक हफ्ते में पूरा हो ट्रायल'
सुनवाई के दौरान एएसजी भाटी ने अदालत को बताया कि 'मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी' (MTP) संशोधन अधिनियम 2021 के तहत रेप पीड़िताओं, नाबालिगों और दिव्यांग महिलाओं के लिए लीगल अबॉर्शन की सीमा को 20 हफ्ते से बढ़ाकर 24 हफ्ते कर दिया गया था।
इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार को नाबालिग रेप पीड़िता के मामले में इस समय सीमा को पूरी तरह हटाने के लिए एमटीपी एक्ट में बदलाव करना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने दांडिक कानूनों (पेनल लॉ) में भी ऐसा सख्त संशोधन लाने को कहा जिससे ऐसे मामलों का ट्रायल अनिवार्य रूप से एक हफ्ते के भीतर पूरा हो सके और आरोपी की सारी संपत्ति पीड़िता को सौंप दी जाए।
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