सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: UGC के नए नियमों पर रोक, कोर्ट ने पूछा- क्या हम समाज को पीछे ले जा रहे हैं?

कोर्ट की सख्त टिप्पणी- 'भारत को अमेरिका जैसा नहीं बनने देंगे', 19 मार्च तक 2012 के पुराने नियम ही रहेंगे लागू
Supreme Court on UGC 2026.
UGC 2026 पर सुप्रीम कोर्ट का रोक (Ai Image)
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को एक अहम घटनाक्रम में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों पर रोक लगा दी है। शीर्ष अदालत का यह फैसला सरकार के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, जबकि उन प्रदर्शनकारियों के लिए यह बड़ी जीत है जो इन नए दिशा-निर्देशों का विरोध कर रहे थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले पर फिर से विचार करने की जरूरत है।

क्या भारत अमेरिका की तरह बंट रहा है? कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त लहजे में टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि वह उम्मीद करती है कि भारत में ऐसे "अलग-थलग स्कूल" (Segregated Schools) नहीं होंगे, जैसे कभी अमेरिका में हुआ करते थे। पीठ ने सवाल उठाया, "क्या भारत एक प्रतिगामी (Regressive) समाज बनता जा रहा है?"

अदालत ने जोर देकर कहा कि भारत की एकता उसके शैक्षणिक संस्थानों में झलकनी चाहिए। हमें परिसरों में ऐसा माहौल नहीं बनाना चाहिए जो छात्रों को बांट दे। चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने कहा, "आप स्कूल और कॉलेजों को अलग-थलग होकर चलाने की अनुमति नहीं दे सकते। अगर हम कैंपस के भीतर ही ऐसा माहौल बना देंगे, तो लोग बाहर की दुनिया में कैसे विकसित होंगे?"

पुराने नियम रहेंगे लागू, अगली सुनवाई मार्च में

चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमलया बागची की पीठ ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि जब तक अगला आदेश नहीं आता, तब तक 2012 के पुराने दिशा-निर्देश ही लागू रहेंगे। मामले की अगली सुनवाई अब 19 मार्च को होगी।

अदालत का कहना था कि अगर नए नियमों को इस स्तर पर लागू किया गया तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं और समाज में विभाजन का खतरा पैदा हो सकता है।

आखिर क्या था विवाद?

यह पूरा विवाद 13 जनवरी को अधिसूचित किए गए यूजीसी के "इक्विटी रेगुलेशन्स 2026" को लेकर है। इन नियमों के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में "इक्विटी कमेटियां" बनाने का प्रावधान था, जिनमें ओबीसी, एससी, एसटी, दिव्यांग और महिलाओं के प्रतिनिधियों को शामिल करना अनिवार्य किया गया था।

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि नए नियमों में "जाति-आधारित भेदभाव" की परिभाषा बहुत सीमित है। उनके मुताबिक, यह सुरक्षा केवल एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों तक सीमित कर दी गई है, जिससे सामान्य वर्ग (General Category) के छात्र संस्थागत सुरक्षा और शिकायत निवारण तंत्र से वंचित रह जाते हैं।

दलीलें और विरोध

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील विष्णु शंकर जैन ने तर्क दिया कि धारा 3(c) अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है क्योंकि यह सामान्य वर्ग को पूरी तरह से बाहर रखती है। उन्होंने कहा कि यह परिभाषा ही भेदभावपूर्ण है।

वहीं, वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने स्टे का विरोध करते हुए कहा कि केवल कानून-व्यवस्था बिगड़ने के डर से नियमों को चुनौती नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने दलील दी कि जाति या पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना हर व्यक्ति को भेदभाव के खिलाफ शिकायत करने का अधिकार होना चाहिए।

सांसदों और विधायकों ने भी उठाई थी आवाज

इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। सांसद हरनाथ सिंह यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुझाव दिया है कि झूठी शिकायतों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए और सामान्य वर्ग के छात्रों के खिलाफ होने वाले भेदभाव के लिए भी दंड का प्रावधान होना चाहिए। उन्होंने शिकायत समितियों में सभी वर्गों को शामिल करने की मांग की।

दूसरी ओर, भाजपा विधायक प्रताप सिंह सिंघवी ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर नियमों पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था, ताकि विश्वविद्यालयों में निष्पक्षता और विश्वास बना रहे।

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश ने नए नियमों के कार्यान्वयन को रोक दिया है, जिससे देश भर के परिसरों में चल रही उथल-पुथल को थमने की उम्मीद है।

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