लखनऊ: छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) कानपुर के शिक्षक-शिक्षा विभाग में अध्ययनरत एम.एड. (सत्र 2024–26) की दलित छात्रा प्रेमा देवी को न्याय दिलाने के लिए भीम आर्मी स्टूडेंट्स फेडरेशन (BASF) के नेतृत्व में छात्र संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है, जिसमें आइसा (AISA) छात्र संगठन ने भी सहयोग किया है। जैसे ही छात्र संगठन आंदोलन के लिए आगे आए, पुलिस प्रशासन ने पूरे परिसर को छावनी में तब्दील कर दिया, लेकिन भीम आर्मी स्टूडेंट्स फेडरेशन अपनी मांग पर अड़ा रहा और जोरदार आंदोलन किया।
भीम आर्मी स्टूडेंट्स फेडरेशन (BASF) ने विश्वविद्यालय के कुलपति को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपकर आरोपी शिक्षकों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग उठाई है। इस दौरान छात्र नेताओं ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर परिसर में लगातार हो रहे जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव के मामलों को दबाने का गंभीर आरोप लगाया है।
ज्ञापन सौंपने के दौरान भीम आर्मी स्टूडेंट्स फेडरेशन के जिला संयोजक हेमंत विद्यार्थी ने कहा कि विश्वविद्यालय में यह कोई पहला मामला नहीं है और इससे पूर्व भी कई शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के साथ जातिगत भेदभाव व प्रशासनिक उपेक्षा की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि जब भी कोई छात्र अपने अधिकारों की आवाज उठाता है, तो प्रशासन संवेदनशीलता दिखाने के बजाय मामलों को रफा-दफा करने का प्रयास करता है।
आंदोलन के दौरान छात्र नेता सचिन चंद्रा ने कहा कि प्रेमा देवी को न्याय दिलाने में कुलपति महोदय द्वारा कोई तत्परता नहीं दिखाई जा रही है। वहीं अभिषेक कामरेड ने अपने संबोधन में कहा कि विश्वविद्यालय में जातिवाद पूरी तरह व्याप्त है और यदि पीड़िता को न्याय नहीं मिला, तो इस स्थान को जंतर मंतर बना दिया जाएगा।
संगठन की ओर से कड़ी चेतावनी दी गई है कि यदि पीड़ित छात्रा प्रेमा देवी को अविलंब न्याय नहीं मिला, तो इस लड़ाई को विश्वविद्यालय परिसर से लेकर पूरे प्रदेश स्तर तक एक बड़े जन-आंदोलन का रूप दिया जाएगा।
पीड़िता द्वारा सौंपे गए शिकायती पत्र के मुताबिक, वे प्रवेश परीक्षा में अपने वर्ग में चौथे स्थान पर चयनित हुई थीं, फिर भी विभागाध्यक्ष डॉ. तनुजा भट्ट द्वारा सार्वजनिक रूप से यह कहकर दुष्प्रचार किया गया कि छात्रा ने विनती कर कृपा स्वरूप प्रवेश पाया है। छात्रा का यह भी आरोप है कि शिक्षक डॉ. विमल सिंह द्वारा कक्षा में अपमानजनक भाषा का प्रयोग कर उन्हें लक्षित किया गया।
शिकायत में आगे बताया गया कि फेयरवेल कार्यक्रम के दौरान सार्वजनिक रूप से अपमानित करने, कक्षा में गरिमा को ठेस पहुँचाने वाली जातिगत टिप्पणियां करने तथा भविष्य बर्बाद करने की धमकियां दी गईं। छात्रा का कहना है कि जब उन्होंने इसका विरोध दर्ज कराया, तो उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में पक्षपात किया गया और मिड-टर्म परीक्षाओं में नियमों के विपरीत नाम लिखवाने का अनुचित दबाव बनाया गया। पूर्व में तत्कालीन विभागाध्यक्ष डॉ. रश्मि गोरे एवं आंतरिक समिति को शिकायत देने के बावजूद मामले की निष्पक्ष जांच कराने के स्थान पर उसे दबाने की कोशिश की गई थी।
सौंपे गए ज्ञापन के माध्यम से कुलपति महोदय के समक्ष प्रमुख मांगें रखी गई हैं। पहली मांग यह है कि प्रकरण की संवेदनशीलता को देखते हुए विभागाध्यक्ष डॉ. तनुजा भट्ट के विरुद्ध तत्काल प्रशासनिक जांच बैठाई जाए और आरोप सिद्ध होने पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अंतर्गत विधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
दूसरी मांग में कहा गया है कि निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच के लिए आरोपित शिक्षकों को वर्तमान पद से हटाकर एक स्वतंत्र जांच समिति गठित की जाए, जिसका मामले से कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हित न जुड़ा हो। तीसरी मांग के तहत छात्रा की संबंधित उत्तर पुस्तिकाओं, आंतरिक अंकों एवं मूल्यांकन अभिलेखों की निष्पक्ष विशेषज्ञों द्वारा स्वतंत्र समीक्षा कराने की बात कही गई है।
चौथी और अंतिम मांग में यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि जांच प्रक्रिया के दौरान छात्रा के प्रति किसी भी प्रकार की प्रतिशोधात्मक कार्रवाई अथवा मानसिक दबाव को पूरी तरह रोका जाए और उनके वैध शैक्षणिक अधिकारों की मुकम्मल सुरक्षा की जाए।
इस प्रदर्शन और ज्ञापन कार्यक्रम के दौरान सचिन चंद्रा, अभिषेक, कार्तिक, स्वर्णकांत, राजेश, अमरकांत, रिया, नीलम, आशा, सविता और गोविंद समेत कई अन्य छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।
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