
भोपाल। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल की एक और नियुक्ति का मामला मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर खंडपीठ पहुंच गया है। डिवीजन बेंच ने रिट अपील क्रमांक 1269/2026 स्वीकार करते हुए विश्वविद्यालय की वर्तमान रजिस्ट्रार एवं प्रोफेसर डॉ. पी. शशिकला समेत सात प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है। मामले में डॉ. शशिकला की वर्ष 2014 में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर हुई नियुक्ति को क्वो वारंटो रिट के जरिए चुनौती दी गई है।
याचिका डॉ. आशुतोष मिश्रा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता केसी घिडियाल और अधिवक्ता संपत कुमार कुशवाहा के माध्यम से दायर की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत के समक्ष मुख्य रूप से यह तर्क रखा गया है कि डॉ. शशिकला उस पद के लिए जारी विज्ञापन में निर्धारित शैक्षणिक योग्यता और अनुभव की शर्तों को पूरा नहीं करती थीं।
2012 के विज्ञापन में निर्धारित थीं ये योग्यताएं
मामले में अदालत के समक्ष दी गई दलीलों के अनुसार, विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर के पद के लिए मार्च 2012 में विज्ञापन जारी किया गया था। इसमें पीएचडी, आठ वर्ष का शिक्षण अनुभव और न्यूनतम एपीआई स्कोर के अलावा कंप्यूटर एप्लीकेशन अथवा मास कम्युनिकेशन में मास्टर डिग्री जैसी योग्यता निर्धारित किए जाने की बात कही गई है।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया है कि इस पद के लिए इंटरव्यू सितंबर 2013 में हुआ और जुलाई 2014 में नियुक्ति दी गई। दावा है कि नियुक्ति के समय डॉ. शशिकला निर्धारित पात्रता पूरी नहीं करती थीं।
एमएससी कंप्यूटर साइंस और पीएचडी का हवाला
अदालत के समक्ष रखी गई दलीलों में कहा गया है कि डॉ. शशिकला के पास वर्ष 1996 की कंप्यूटर साइंस में एमएससी की डिग्री है। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2010 में बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, भोपाल से इसी विषय में डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त की।
हालांकि याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया है कि विज्ञापन में कंप्यूटर एप्लीकेशन की मास्टर डिग्री की आवश्यकता थी और डॉ. शशिकला के पास मास्टर ऑफ कंप्यूटर एप्लीकेशन (MCA) की डिग्री नहीं थी। याचिका में एमएससी कंप्यूटर साइंस और विज्ञापन में मांगी गई प्रोफेशनल डिग्री के बीच अंतर को नियुक्ति की पात्रता से जोड़कर चुनौती दी गई है।
पीएचडी के दौरान अवकाश का मुद्दा भी उठाया
मामले में डॉ. शशिकला की पीएचडी से संबंधित एक अन्य मुद्दा भी अदालत के समक्ष रखा गया है। दलील में कहा गया है कि उन्होंने वर्ष 2005 से 2010 के बीच विश्वविद्यालय में नियमित कर्मचारी रहते हुए पीएचडी की। याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया है कि रिसर्च डिग्री हासिल करने के लिए निर्धारित नियमों के अनुसार अवकाश लिया जाना आवश्यक था और इस संबंध में भी सवाल उठाए गए हैं। इन बिंदुओं पर अंतिम निर्णय अभी अदालत द्वारा नहीं दिया गया है।
ढाई साल से कम अनुभव में प्रोफेसर पद पर पदोन्नति का दावा
मामले में केवल वर्ष 2014 की नियुक्ति ही नहीं, बल्कि डॉ. शशिकला की बाद की पदोन्नति को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया है कि डॉ. शशिकला को जुलाई 2014 में एसोसिएट प्रोफेसर नियुक्त किया गया था और नवंबर 2016 में उन्हें प्रोफेसर के पद पर पदोन्नत कर दिया गया। दलील के मुताबिक, करियर एडवांसमेंट स्कीम (CAS) के तहत प्रोफेसर पद पर पदोन्नति के लिए एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कम से कम तीन वर्ष का अनुभव आवश्यक था।
याचिकाकर्ता का दावा है कि जुलाई 2014 से नवंबर 2016 तक की अवधि तीन वर्ष से कम थी। इसी आधार पर पदोन्नति की प्रक्रिया को भी चुनौती दी गई है।
पूर्व कुलपति समेत सात प्रतिवादी
इस मामले में मध्यप्रदेश सरकार के साथ उच्च शिक्षा विभाग और जनसंपर्क विभाग को भी प्रतिवादी बनाया गया है। विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति बीके कुठियाला भी प्रतिवादियों में शामिल हैं। याचिका में कहा गया है कि डॉ. शशिकला की एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति और बाद में प्रोफेसर पद पर पदोन्नति उनके कार्यकाल के दौरान हुई थी।
इसके अलावा डॉ. सीपी अग्रवाल को भी मामले में पक्षकार बनाया गया है। बताया गया है कि डॉ. अग्रवाल डॉ. शशिकला की नियुक्ति के समय विश्वविद्यालय के कंप्यूटर विभाग के अध्यक्ष थे।
विश्वविद्यालय की अन्य नियुक्तियां भी अदालत में चुनौती के दायरे में
याचिका में विश्वविद्यालय की अन्य नियुक्तियों का भी उल्लेख किया गया है, जिन्हें अलग-अलग मामलों में हाई कोर्ट में चुनौती दिए जाने की बात कही गई है। इनमें वर्तमान कुलपति विजय मनोहर तिवारी, पूर्व कुलपति संजय द्विवेदी, पूर्व रजिस्ट्रार अविनाश बाजपेयी, प्रोफेसर पवित्र श्रीवास्तव और वर्तमान रजिस्ट्रार एवं प्रोफेसर पी. शशिकला का नाम शामिल है।
इसके अलावा अरुण भगत की एसोसिएट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति को भी मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर खंडपीठ में चुनौती दिए जाने का उल्लेख किया गया है। बाद में उनके पद से इस्तीफा देने की बात भी सामने रखी गई है।
कोर्ट के नोटिस के बाद अब आगे क्या?
रिट अपील स्वीकार किए जाने और प्रतिवादियों को नोटिस जारी होने के बाद अब संबंधित पक्षों को अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखना होगा। नियुक्ति की वैधता, विज्ञापन में निर्धारित पात्रता, अनुभव, पीएचडी से जुड़े नियम और पदोन्नति की पात्रता जैसे मुद्दों पर आगे सुनवाई होगी।
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