
कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षण बढ़ाने वाले कानून को रद्द किए जाने के बाद राज्य की राजनीति गरमा गई है। पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने सोमवार को अदालत के इस कदम को हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए एक बहुत बड़ा और 'गंभीर झटका' करार दिया है।
इस रद्द किए गए कानून के तहत राज्य में एससी वर्ग का आरक्षण 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और एसटी वर्ग का कोटा 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया गया था। इन नए बदलावों के लागू होने से राज्य का कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की तय सीमा को पार कर गया था।
न्यायपालिका के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करते हुए सिद्धारमैया ने भारतीय जनता पार्टी की मंशा पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि यह फैसला सामाजिक न्याय को लेकर बीजेपी की कार्यशैली पर कई बुनियादी सवाल खड़े करता है। पूर्व सीएम ने आरोप लगाया कि पिछली भाजपा सरकार ने 2023 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले यह कदम उठाया था, जबकि उन्हें अच्छी तरह पता था कि कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा को पार कर जाएगा।
उन्होंने सवाल उठाया कि बीजेपी ने इसकी संवैधानिक स्थिरता सुनिश्चित किए बिना ही बढ़े हुए आरक्षण की घोषणा क्यों की। सिद्धारमैया ने पूछा कि क्या स्थायी सामाजिक न्याय की तुलना में चुनावी फायदे को अधिक प्राथमिकता दी गई थी।
दशकों के संघर्ष का हवाला देते हुए उन्होंने केंद्र सरकार को भी आड़े हाथों लिया, क्योंकि केंद्र ने इस बढ़े हुए कोटे को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने के कर्नाटक के अनुरोध को टाल दिया था। सिद्धारमैया ने साफ शब्दों में कहा कि आरक्षण कोई खैरात नहीं है। उन्होंने 50 प्रतिशत की सीमा पर पुनर्विचार करने की मांग करते हुए राज्य सरकार से कानूनी उपाय आगे बढ़ाने का आग्रह किया।
इस संवेदनशील मुद्दे पर राज्य के उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने भी गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने अदालत के इस फैसले को एक गंभीर घटनाक्रम बताते हुए कहा कि इसका शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार के क्षेत्र में व्यापक और दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।
परमेश्वर ने अक्टूबर 2022 में इस कानून को लागू करने के तत्कालीन भाजपा सरकार के फैसले पर सवाल उठाया। इसके साथ ही उन्होंने नौवीं अनुसूची के प्रस्ताव पर फैसला लटकाए रखने के लिए केंद्र सरकार की भी कड़ी आलोचना की।
उपमुख्यमंत्री ने आगे की रणनीति स्पष्ट करते हुए कहा कि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपील करने सहित सभी उपलब्ध कानूनी विकल्पों का बारीकी से परीक्षण करेगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि दलित और आदिवासी बच्चों के भविष्य को लंबी कानूनी अनिश्चितता में नहीं धकेला जा सकता, बल्कि उन्हें आगे बढ़ने के व्यापक अवसर मिलने चाहिए।
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