
नई दिल्ली: 'वोट चोरी' के विरोध और महिला सुरक्षा मार्च से लेकर 'चिता आंदोलन' तक, देश की सड़कों पर एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। लेकिन विरोध की इस पुरानी राजनीति ने अब एक नया रूप ले लिया है। युवा आवाजें, सोशल मीडिया की ताकत, वायरल नारे और किसी खास मुद्दे पर आधारित लामबंदी ने यह पूरी तरह बदल दिया है कि प्रदर्शन कैसे शुरू होते हैं, कैसे फैलते हैं और लोगों का ध्यान कैसे खींचते हैं।
राजधानी नई दिल्ली में नारों की गूंज और भीड़ का जुटना बता रहा है कि सड़कें फिर से प्रदर्शनों का केंद्र बन गई हैं। मंगलवार को 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के सांसदों ने मतदाता सूचियों के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं के खिलाफ राष्ट्रीय राजधानी में मोर्चा खोला। इन नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। यह मार्च तब एक अप्रत्याशित मोड़ ले लिया जब राहुल गांधी ने आखिरी समय में रास्ता बदलकर पुलिस को चौंका दिया और इसे एक धरने में तब्दील कर दिया।
इसके अगले ही दिन, विपक्षी सांसदों ने जनपथ की सड़कों पर एक और नाटकीय फ्लैश प्रदर्शन किया। प्रियंका गांधी वाड्रा सड़क पर लेट गईं और तब तक उठने से इनकार कर दिया जब तक कि मुख्य चुनाव आयुक्त विपक्षी नेताओं से मिलने के लिए सहमत नहीं हो गए।
आने वाले दिनों में यह सिलसिला और तेज हो सकता है। जुलाई में नीट (NEET) पेपर लीक विरोधी आंदोलन के दौरान युवा प्रदर्शनकारियों को एकजुट करने वाले कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के अभिजीत डिपके ने चेतावनी दी है। उनका कहना है कि अगर सीईसी ने इस्तीफा नहीं दिया, तो 10 अक्टूबर को "जंतर मंतर 2.0" देखने को मिलेगा।
हालांकि, यह सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है और न ही केवल राजनेता अपनी शिकायतें लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। देश भर में, अलग-अलग मुद्दों पर आम लोग अपनी आवाज सुनाने के लिए सड़कों का रुख कर रहे हैं। इन प्रदर्शनों का पैमाना, मुद्दे और नेतृत्व अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन ये सभी एक जानी-पहचानी चीज की वापसी का संकेत देते हैं, और वह है सड़क की राजनीति।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन हमेशा से हमारे लोकतंत्र का एक अभिन्न अंग रहे हैं। भारत की राजनीति शायद ही कभी संसद, पार्टी कार्यालयों या चुनावी रैलियों तक सीमित रही हो। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी ने मार्च, बहिष्कार और सत्याग्रह को जन राजनीति का हथियार बनाया था। दशकों बाद, जयप्रकाश नारायण के आंदोलन ने इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ छात्रों और नागरिकों को सड़कों पर ला खड़ा किया था।
साल 2011 में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने जंतर-मंतर और रामलीला मैदान को खचाखच भर दिया था। इसके बाद सीएए (CAA) विरोधी प्रदर्शनों में लंबे समय तक धरने चले। वहीं, तीन कृषि कानूनों के रद्द होने से पहले किसानों ने एक साल से अधिक समय तक दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाले रखा था।
सड़क की राजनीति कोई नई बात नहीं है, लेकिन भीड़ जुटाने और उसे बनाए रखने के तरीके बदल रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक उदय चंद्रा का मानना है कि सोशल मीडिया प्रदर्शनों को अधिक दृश्यमान बना रहा है। यह इस बात को भी बदल रहा है कि आंदोलन कौन शुरू कर सकता है और उसे कैसे आगे बढ़ा सकता है।
चंद्रा के अनुसार, सोशल मीडिया निश्चित रूप से विरोध प्रदर्शनों को लाखों लोगों तक पहुंचाता है, जिससे वे तेजी से या वायरल तरीके से फैलते हैं। लेकिन यह इससे भी महत्वपूर्ण काम करता है। यह लोगों को जुटाने के लिए राजनीतिक दलों, यूनियनों और स्थापित संगठनों पर निर्भरता को कम करता है। अब कोई भी शिकायत पारंपरिक राजनीतिक नेताओं के प्रतिक्रिया देने से पहले ही एक आंदोलन में बदल सकती है।
चंद्रा का यह भी मानना है कि मौजूदा प्रदर्शन केवल सोशल मीडिया के प्रभाव से कहीं आगे की बात हैं। भारत की राजनीति में सड़क पर विरोध कभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ था। लेकिन पिछले एक दशक के दौरान अत्यधिक केंद्रीकृत पार्टी मशीनरी के तहत चुनावी राजनीति ने इसे धुंधला कर दिया था। अब जो हम देख रहे हैं, वह एक स्वतंत्र राजनीतिक क्षेत्र के रूप में सड़क का फिर से उभरना है।
प्रदर्शनों के इस दौर में जो बात सबसे अलग है, वह केवल उठाए जा रहे मुद्दे नहीं हैं, बल्कि यह है कि इन्हें सबसे पहले कौन उठा रहा है। परीक्षाओं से लेकर मतदाता सूची तक के सवालों पर युवाओं ने सामान्य पार्टी मशीनरी के बाहर दबाव बनाने में कामयाबी हासिल की है। राजनीतिक दल अब तेजी से उन मुद्दों पर आक्रामक प्रतिक्रिया दे रहे हैं, जिनकी शुरुआत उन्होंने खुद नहीं की थी।
क्या युवाओं और छात्रों ने राजनीतिक दलों को सड़क पर लामबंद होने का रास्ता दिखाया है? इस साल जुलाई में नीट (NEET) प्रदर्शनों से जुड़ी घटनाएं इसका एक सटीक उदाहरण हैं। जब छात्रों ने पेपर लीक को लेकर विरोध किया, तो जंतर-मंतर हफ्तों तक चलने वाले आंदोलन का केंद्र बन गया। CJP इस आंदोलन का नेतृत्व करने वाले एक दबाव समूह के रूप में उभरी और अंततः केंद्रीय शिक्षा मंत्री के रूप में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सुनिश्चित किया।
शुरुआत में किनारे खड़े कई राजनीतिक दलों ने भी इस आंदोलन में शामिल होने के लिए होड़ लगा दी। 21 जुलाई को राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य विपक्षी नेताओं ने नीट पेपर लीक का विरोध कर रहे छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के बाहर धरना दिया।
लेकिन विश्लेषक चंद्रा का तर्क है कि CJP एक आंदोलन के रूप में राजनीतिक दलों और अन्ना हजारे आंदोलन या किसान प्रदर्शनों जैसे पहले के बड़े आंदोलनों से काफी अलग है। अन्ना आंदोलन के पास पहचाने जाने वाले नेता और एक राष्ट्रीय एजेंडा था। इसी तरह, किसान प्रदर्शन मजबूत यूनियनों, स्थानीय संगठन और महीनों तक आंदोलन को बनाए रखने की आर्थिक क्षमता पर टिके थे। इसके विपरीत, अब जो उभर रहा है वह एक नेटवर्क आधारित, अपेक्षाकृत कम नेतृत्व वाला और अक्सर विशिष्ट मुद्दों पर केंद्रित आंदोलन है।
चंद्रा को लगता है कि CJP का संगठनात्मक फायदा भी है। इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, यूट्यूब और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पहले से असंबद्ध समूहों को तेजी से जोड़ सकते हैं। इसलिए, भीड़ जुटाना न केवल तेज है बल्कि अधिक सुचारू भी है। आपको आंदोलन शुरू करने से पहले किसी संगठन को बनाने और पंजीकृत करने की आवश्यकता नहीं है। अक्सर अब आंदोलन पहले शुरू होता है और संगठन बाद में बनता है।
शायद इसी एहसास ने राजनीतिक दलों को अपनी लामबंदी की रणनीतियों में सुधार करने के लिए मजबूर किया है। CJP के नेतृत्व वाले एंटी-नीट विरोध प्रदर्शनों का समर्थन करने के बजाय अपने 'छात्रों की गूंज' अभियान को प्राथमिकता देने के लिए आलोचना झेलने वाले राहुल गांधी ने अब एक नया प्रयास किया है। 4 अक्टूबर को उन्होंने 'सत्याग्रह' पोर्टल लॉन्च किया, जिसका उद्देश्य देश भर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों को मैप करना और विभिन्न मुद्दों पर आंदोलन कर रहे लोगों को जोड़ना है।
चंद्रा के लिए, यह कदम दिखाता है कि कांग्रेस (INC) ने उन विरोध प्रदर्शनों को नजरअंदाज करने के जोखिम को पहचान लिया है जो ऑनलाइन शुरू होते हैं और फिर सड़कों पर फैल जाते हैं। उनका मानना है कि सत्याग्रह मंच कांग्रेस को भाजपा विरोधी (anti-BJP) प्रदर्शनों के उभरते तंत्र में स्थापित करने का एक प्रयास है। यह राजनीतिक संगठन में एक दिलचस्प बदलाव है जो पार्टी को एक पारंपरिक 'टॉप-हैवी' हाई कमान संरचना से हटाकर विभिन्न संघर्षों को जोड़ने वाले एक केंद्र में बदल देता है।
ज्ञानेश कुमार या नीट के खिलाफ शोर-शराबे वाले विरोध प्रदर्शन केवल एक हिस्सा हैं, जो शायद अधिक दिखाई देते हैं। राष्ट्रीय सुर्खियों से दूर, पूरे देश में कई मुद्दों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन हो रहे हैं। ये महिला सुरक्षा, भूमि, विस्थापन, पानी, स्कूलों में सुविधाओं और स्थानीय शासन से जुड़े छोटे और स्थानीय प्रदर्शन हो सकते हैं। लेकिन एक साथ मिलकर वे दिखाते हैं कि आम लोगों के लिए अपनी बात सुनाने के वास्ते सड़क आज भी एक महत्वपूर्ण स्थान है।
यौन हिंसा के मामलों के बाद दिल्ली में युवतियों ने महिला सुरक्षा के लिए मार्च किया है। मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, अहमदाबाद, पटना और देहरादून सहित कई शहरों में भी प्रदर्शन फैले हैं। प्रदर्शनकारी महिलाओं के लिए सुरक्षित सार्वजनिक स्थान और सरकारों व पुलिस से अधिक जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।
मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना से प्रभावित परिवारों ने अपने 'चिता आंदोलन' को पुनर्जीवित कर दिया है। मुआवजे और पुनर्वास को लेकर प्रदर्शनकारी चिताओं पर सोए, पानी में खड़े रहे और भूख हड़ताल पर गए। उधर महाराष्ट्र के मावल में पवना क्लोज्ड पाइपलाइन परियोजना का विरोध कर रहे किसानों ने 'जल समाधि' आंदोलन की घोषणा की। वे उन परिवारों के पुनर्वास की भी मांग कर रहे हैं जिन्होंने दशकों पहले पवना बांध के लिए अपनी जमीन दी थी।
पानी के मुद्दे ने कर्नाटक में भी किसानों को सड़कों पर ला दिया है। कृष्णा बेसिन जिलों के संगठनों ने तेलंगाना को जलाशय का पानी छोड़ने का विरोध करते हुए तर्क दिया है कि कर्नाटक के सूखा प्रभावित क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वहीं आईआईटी (IIT) बॉम्बे में भी छात्रों ने छात्र साहिल वाकोडे की आत्महत्या के बाद अपने विरोध को भूख हड़ताल में बदल दिया है। जेएनयू (JNU) छात्र संघ भी प्रदर्शनकारियों की मांगों पर कार्रवाई के आह्वान में शामिल हो गया है।
इन प्रदर्शनों का पैमाना और मांगें काफी अलग हैं। कुछ विरोध प्रदर्शनों में हजारों लोग शामिल होते हैं, तो कुछ एक विश्वविद्यालय परिसर, कुछ गांवों या यहां तक कि मुट्ठी भर सड़कों तक सीमित रहते हैं। वे केंद्र, राज्य सरकारों, स्थानीय प्रशासन या संस्थानों को निशाना बना सकते हैं, लेकिन भावना एक ही रहती है: अपनी शिकायत को सड़क पर ले जाना।
विरोध की यह राजनीति पुरानी है, लेकिन भीड़ जुटाने की तकनीकें बदल गई हैं। पहले के आंदोलन मुख्य रूप से छात्र संगठनों, यूनियनों, सार्वजनिक बैठकों और बाद में टेलीविजन कवरेज पर निर्भर थे। आज जंतर-मंतर तक पहुंचने से पहले एक विरोध इंस्टाग्राम या एक्स (X) पर शुरू हो सकता है।
सोशल मीडिया ने विरोध की भाषा को भी बदल दिया है। सड़क पर लगाया गया नारा कुछ ही घंटों में एक मीम बन सकता है, जबकि पोस्टर, वन-लाइनर्स और गीत विरोध स्थल से बहुत दूर तक फैल जाते हैं। हाल के प्रदर्शनों ने इसके कई उदाहरण दिए हैं। दिल्ली में महिलाओं के विरोध प्रदर्शन में, 'एक कचौरी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा' जैसे नारे बहुत जल्दी सड़क से इंस्टाग्राम रील्स तक पहुंच गए। यह महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर बात कहने के लिए हास्य का उपयोग था।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मुंबई के विरोध प्रदर्शन में तख्तियों पर 'ग्यानू मस्ट गो' (Gyanu must go) और बॉलीवुड से प्रेरित 'वोट चुराया मेरा, किसने ओ सनम? ग्यानू ने' जैसी पंक्तियां लिखी हुई थीं। कुछ दिनों बाद, चुनाव आयोग तक 'इंडिया' गठबंधन के मार्च के दौरान राहुल गांधी ने जेन जी (Gen Z) शैली का संदेश "ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो!" (Gyanesh, it's done bro!) लिया हुआ था। यह प्रभावी होगा या नहीं, लेकिन इसने निश्चित रूप से लोगों को रुकने और ध्यान देने पर मजबूर किया।
और जेन जी (Gen Z) शायद विरोध करना सीखने वाली सबसे युवा पीढ़ी नहीं है। लखनऊ में शिक्षकों की कमी और स्कूल की ओर जाने वाली सड़क के क्षतिग्रस्त होने पर लगभग 200 स्कूली छात्राओं ने बारिश में सड़क जाम कर दी। फतेहपुर में, लगभग 1,000 छात्रों ने पीने के पानी और कक्षाओं की मरम्मत की मांग को लेकर चार घंटे तक विरोध प्रदर्शन किया। कई मामलों में, अधिकारियों ने इन विरोध प्रदर्शनों के बाद कार्रवाई भी की है।
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