नई दिल्ली। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) एक्ट और सरकार द्वारा बनाए गए इसके नए नियमों की संवैधानिक वैधता को अब कानूनी चुनौती मिलने वाली है। भारत के 21 प्रमुख मीडिया संस्थानों का प्रतिनिधित्व करने वाली 'डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन' (DNPA) इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती है। एसोसिएशन का स्पष्ट आरोप है कि यह कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन करता है और पूरे पत्रकारिता जगत के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है।
एसोसिएशन की ओर से तैयार की गई याचिका में अदालत से डीपीडीपी एक्ट की कई धाराओं को रद्द करने की गुहार लगाई गई है। इनमें धारा 7, 17(2), 18, 19, 27, 29, 36, 37 और 44(3) के साथ-साथ धारा 40 के तहत बनाए गए डीपीडीपी नियम 16, 17 और 23 शामिल हैं। याचिका में मांग की गई है कि इन सभी प्रावधानों को उस सीमा तक शून्य घोषित किया जाए, जहां तक ये संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के खिलाफ जाते हैं।
याचिका में इस बात पर गहरी चिंता जताई गई है कि इन धाराओं में 'पत्रकारिता गतिविधियों' को प्रोसेसिंग के एक अलग वर्ग के रूप में कोई छूट नहीं दी गई है। यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(a) के तहत मिलने वाले संरक्षण के सीधे विपरीत है। डिजिटल न्यूज बॉडी के मुताबिक, यह कानून जमीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों, आम नागरिकों, विसलब्लोअर्स, आरटीआई कार्यकर्ताओं और अन्य हितधारकों के कामकाज को बुरी तरह प्रभावित करता है।
इस नए कानून के लागू होने से प्रकाशकों, संपादकों और संवाददाताओं को हर खबर के लिए पूर्व सहमति लेने और नोटिस देने जैसी जटिल प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। उनसे प्रकाशित जानकारी को जबरन मिटाने (कम्पेलड इरेजर) और सत्यापन योग्य सहमति की मांग की जाएगी। एसोसिएशन का मानना है कि इस तरह की सख्त बाध्यताओं के साथ स्वतंत्र प्रेस का दैनिक और सामान्य कामकाज किसी भी सूरत में संभव नहीं रह जाएगा।
विशेष रूप से डीपीडीपी एक्ट की धारा 44(3) की वैधता पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। यह धारा हर तरह की "व्यक्तिगत जानकारी" को सार्वजनिक प्रकटीकरण (डिस्क्लोजर) की पहुंच से पूरी तरह बाहर कर देती है, चाहे उस जानकारी का सीधा संबंध किसी सार्वजनिक गतिविधि से ही क्यों न हो। याचिका के अनुसार, इस प्रावधान ने निजता के अधिकार और सूचना के अधिकार (आरटीआई) के बीच पिछले दो दशकों से चले आ रहे बेहतरीन संतुलन को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है।
मीडिया संगठनों का तर्क है कि ये सभी प्रावधान संयुक्त रूप से अभिव्यक्ति की आजादी के मौलिक अधिकार को गैर-आनुपातिक और अत्यधिक रूप से कम करते हैं। यह कानून अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मान्यता प्राप्त सूचना जानने और उस तक पहुंच बनाने के निहित अधिकार को भी कमजोर करता है। याचिका में साफ तौर पर कहा गया है कि डीपीडीपी एक्ट समाचारों के स्वतंत्र प्रसार के मामले में प्रेस की कार्यप्रणाली पर अनुचित और अलोकतांत्रिक प्रतिबंध लगाता है।
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