वोटर लिस्ट से नाम कटने की खौफनाक सजा: बंगाल के 4 मजदूर एक महीने से छत्तीसगढ़ के डिटेंशन सेंटर में कैद

वोटर लिस्ट से नाम कटने पर बंगाल के 4 मजदूर छत्तीसगढ़ के डिटेंशन सेंटर में कैद, कलकत्ता हाईकोर्ट ने सरकार के रवैये पर उठाए गंभीर सवाल।
Bengal migrant workers, Chhattisgarh detention centre
वोटर लिस्ट से नाम हटने पर बंगाल के 4 मजदूर एक महीने से छत्तीसगढ़ डिटेंशन सेंटर में कैद हैं। हाईकोर्ट ने इस मनमानी कार्रवाई पर प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई है।
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नई दिल्ली: द हिंदू की एक रिपोर्ट के आधार पर मिली जानकारी के अनुसार, पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के रहने वाले चार प्रवासी मजदूर इन दिनों एक बेहद खौफनाक और अनिश्चित हालात का सामना कर रहे हैं। हाल ही में हुए विशेष सघन संशोधन (SIR) अभियान के दौरान मतदाता सूची से उनके नाम हटा दिए गए थे। इसके बाद से उन पर बांग्लादेशी नागरिक होने का संदेह जताया गया और वे पिछले एक महीने से छत्तीसगढ़ पुलिस की हिरासत में रायपुर के एक डिटेंशन सेंटर में बंद हैं। इस घटना के खिलाफ अब उनके परिजनों ने कलकत्ता उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।

अगस्त के अंत में मुर्शिदाबाद के शमशेरगंज और शाहाबाद इलाकों से 23 प्रवासी मजदूर काम की तलाश में छत्तीसगढ़ गए थे। वहां वे बिलासपुर इलाके में घर-घर जाकर सामान बेचा करते थे। 4 सितंबर को सिरगिट्टी पुलिस स्टेशन के तहत आने वाले चुंचियापारा-गणेश नगर से पुलिस ने इन सभी 23 लोगों को संदिग्ध बांग्लादेशी मानकर इनके आवास से हिरासत में ले लिया। उन्हें पहले बिलासपुर पुलिस अधीक्षक कार्यालय ले जाया गया और बाद में रायपुर स्थित अवैध प्रवासियों के होल्डिंग सेंटर में भेज दिया गया।

स्थानीय सिविल कोर्ट के आदेश के बाद 18 सितंबर को इनमें से 19 मजदूरों को रिहा कर दिया गया। हालांकि, साबिर शेख (42), शफीकुल इस्लाम (39), नसीरुद्दीन शेख (35) और लालटू शेख (28) को डिटेंशन सेंटर में ही कैद रखा गया। अदालत में पुलिस ने दलील दी कि एसआईआर (SIR) प्रक्रिया के दौरान इन चारों के नाम वोटर लिस्ट से कट गए थे, इसलिए इनकी नागरिकता पर सवालिया निशान है।

दिलचस्प बात यह है कि रिहा हुए बाकी 19 लोगों के नाम अप्रैल में न्यायिक प्रक्रिया के बाद फिर से मतदाता सूची में जुड़ चुके हैं।

इस पूरी कार्रवाई से शफीकुल के 67 वर्षीय पिता रियाजुल शेख गहरे सदमे में हैं। उनका कहना है कि वे बचपन से शमशेरगंज में रह रहे हैं और उनके परदादा का बनाया हुआ पुश्तैनी घर मिट्टी के कटाव में बहने के बाद 1973 में उन्होंने नया घर बसाया था। उनके पास दोनों घरों के वैध दस्तावेज मौजूद हैं, फिर उनका बेटा बांग्लादेशी कैसे हो सकता है।

चुनाव आयोग ने एक 'तार्किक विसंगति' का हवाला देते हुए शफीकुल और उनके भाई आशिकुल का नाम काट दिया था, क्योंकि छह अन्य लोगों ने भी रियाजुल को अपना पिता बताया था। हालांकि, सूची में रियाजुल और उनके सबसे बड़े बेटे रफीकुल का नाम बरकरार है।

पीड़ित परिवारों ने अपने नाम फिर से जुड़वाने के लिए ट्रिब्यूनल में अपील की है, लेकिन ये अर्जियां अभी भी लंबित हैं। साबिर के बड़े भाई मुस्तकीम शेख, जिन्हें भी हिरासत में लिया गया था लेकिन बाद में रिहा कर दिया गया, सवाल उठाते हैं कि जब उनका मामला ट्रिब्यूनल के सामने विचाराधीन है, तो राज्य सरकार खुद से यह फैसला कैसे कर सकती है कि उनका भाई एक अवैध नागरिक है।

लालटू और नसीरुद्दीन के परिवारों की भी यही व्यथा है। उनका कहना है कि वे केवल काम के लिए छत्तीसगढ़ गए थे, लेकिन उनकी स्थायी जड़ें पश्चिम बंगाल में ही हैं और प्रशासन की यह कार्रवाई पूरी तरह से मनमानी और गैरकानूनी है।

कलकत्ता उच्च न्यायालय में दायर याचिका पर 5 सितंबर 2026 (सोमवार) को हुई पहली सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रशासन के इस दोहरे रवैये पर कड़ी फटकार लगाई। जस्टिस कृष्णा राव ने स्थिति को विरोधाभासी बताते हुए सवाल किया कि यदि अधिकारी कह रहे हैं कि कुछ लोग भारतीय नागरिक नहीं हैं, तो फिर अपीलीय प्राधिकरण (ट्रिब्यूनल) का क्या काम रह जाता है।

अदालत ने चुनाव आयोग से पूछा कि क्या वे आम जनता के साथ खेल रहे हैं। साथ ही यह भी सवाल उठाया कि जब ट्रिब्यूनल अपीलों पर विचार करने के लिए मौजूद है, तो एफआरआरओ (FRRO) नागरिकता पर फैसला कैसे ले सकता है।

इस कानूनी लड़ाई और सरकारी लापरवाही के बीच शमशेरगंज के धूसरीपारा में गंगा नदी के पास एक छोटे से ईंट के घर में लालटू की पत्नी सबेरा खातून अपने एक साल के बच्चे के साथ पति की राह देख रही हैं। पिछले दो महीनों से उन्होंने लालटू की आवाज तक नहीं सुनी है।

छत्तीसगढ़ में काम कर रहे एक पड़ोसी ने कुछ दिन पहले डिटेंशन सेंटर में उनसे मुलाकात की थी। उसने बताया कि वे चारों वहां सिर्फ रो रहे थे और अपने बच्चों के बारे में पूछ रहे थे। उन्हें वहां से न तो किसी से मिलने की इजाजत है और न ही अपने परिवार को फोन करने की सुविधा दी गई है।

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