
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कस्टोडियल डेथ के एक मामले में दिए गए फैसले के पालन न होने पर अवमानना याचिका पर सख्त रुख अपनाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग के प्रमुख सचिव संजय प्रसाद को 31 जुलाई को कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया है। जस्टिस सौरभ लवानिया की एकल पीठ ने कहा कि डिवीजन बेंच के फैसले का पालन नहीं किया गया है और अधिकारी धारा 12 के तहत दंड के पात्र हैं।
यह अवमानना याचिका (सिविल) संख्या 2110 ऑफ 2026 प्रीमा देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य मामले में 20 फरवरी 2026 को डिवीजन बेंच द्वारा पारित फैसले के कथित उल्लंघन के खिलाफ दायर की गई है। उस फैसले में अदालत ने पाया था कि मृतक की मौत राज्य अधिकारियों की हिरासत और नियंत्रण में हुई तथा रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन साबित होता है।
डिवीजन बेंच के फैसले के महत्वपूर्ण अंशों को कोर्ट ने दोहराया। अदालत ने कहा था, “कस्टोडियल टॉर्चर मानवीय गरिमा का नग्न उल्लंघन है और यह पीड़ित के आत्मसम्मान तथा अस्तित्व को जड़ से नष्ट कर देता है। कस्टोडियल टॉर्चर मानवीय गरिमा पर सुनियोजित हमला है और जब भी मानवीय गरिमा घायल होती है, सभ्यता एक कदम पीछे हट जाती है।”
अदालत ने आगे कहा था, “राज्य अपने कब्जे में रहने वाले व्यक्तियों के जीवन और स्वतंत्रता का संरक्षक होने के नाते उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का सख्त और अहस्तांतरणीय कर्तव्य वहन करता है। इस दायित्व को पूरा करने में विफलता सार्वजनिक कानून के तहत दायित्व को आकर्षित करती है।”
डिवीजन बेंच ने यह भी स्पष्ट किया था कि राज्य द्वारा दी गई व्याख्याएं न तो ठोस हैं और न ही पर्याप्त, जिससे यह अनुमान खारिज हो सके कि याचिकाकर्ता के बेटे की मौत जेल में हुई। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा था कि आत्महत्या भी एक आंतरिक जानबूझकर की गई चोट मानी जाएगी और यह अप्राकृतिक मौत होगी, जिसकी जिम्मेदारी राज्य पर होगी।
मुआवजे के संबंध में डिवीजन बेंच ने निर्देश दिया था कि मृतक के कानूनी उत्तराधिकारियों को तीन सप्ताह के अंदर 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। साथ ही राज्य सरकार को निर्देश दिया गया था कि वह मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत उपलब्ध मल्टीप्लायर पद्धति की तरह उम्र, आय और आश्रितों पर आधारित प्रासंगिक मापदंड अपनाते हुए कस्टोडियल डेथ मामलों में मुआवजा तय करने के लिए दिशानिर्देश बनाए।
न्यायमूर्ति लवानिया ने कहा कि डिवीजन बेंच के फैसले का पालन राज्य द्वारा नहीं किया गया है। कारण यह है कि राज्य ने मृतक के कानूनी उत्तराधिकारियों को कुल 10 लाख रुपये का भुगतान नहीं किया है और फैसले के पैराग्राफ 23 में निर्देशित दिशानिर्देश अभी तक नहीं बनाए गए हैं।
इस स्थिति को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि संबंधित अधिकारी 1971 के अवमानना अधिनियम की धारा 12 के तहत दंड के पात्र हैं। इसलिए गृह विभाग के प्रमुख सचिव संजय प्रसाद की अगली तारीख पर कोर्ट में उपस्थिति आवश्यक है, जिसमें आरोप तय करने की कार्यवाही भी शामिल है। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि उपरोक्त अधिकारी 31 जुलाई को इस कोर्ट के समक्ष उपस्थित हों। मामला उसी दिन सूचीबद्ध किया गया है।
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