
भोपाल। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर रविवार को मध्यप्रदेश भर में आदिवासी समाज ने अपनी संस्कृति, परंपरा, पहचान और अधिकारों के सम्मान का संदेश देते हुए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए। राजधानी भोपाल से लेकर इंदौर सहित प्रदेश के कई जिलों में रैली, सम्मेलन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और पारंपरिक आयोजनों में बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग शामिल हुए। ढोल-मांदल की थाप, पारंपरिक वेशभूषा और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के बीच आदिवासी समाज की एकजुटता देखने को मिली।
भोपाल में दशहरा मैदान बना आदिवासी एकजुटता का केंद्र
भोपाल में मध्यप्रदेश आदिवासी विकास परिषद के तत्वावधान में दशहरा मैदान में विशाल आदिवासी सम्मेलन आयोजित किया गया। कार्यक्रम में 22 से अधिक आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ हजारों की संख्या में समाज के लोग शामिल हुए। सम्मेलन से पहले माता मंदिर चौराहे से विशाल रैली निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में लोग पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए। ढोल-मांदल की थाप और पारंपरिक नृत्य के साथ रैली दसहरा मैदान पहुंची।
सम्मेलन स्थल पर आदिवासी संस्कृति और परंपरा की झलक देखने को मिली। युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक बड़ी संख्या में लोगों ने पारंपरिक परिधान पहनकर कार्यक्रम में हिस्सा लिया। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और पारंपरिक नृत्यों के जरिए समाज ने अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पहचान का प्रदर्शन किया।
‘आदिवासी भीख नहीं, अपना अधिकार मांगता है’
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मध्यप्रदेश आदिवासी विकास परिषद के अध्यक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि वे कार्यक्रम में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर नहीं, बल्कि समाज का हिस्सा होने के नाते शामिल हुए हैं।
उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश में आदिवासी समाज की आबादी 22 प्रतिशत से अधिक है, लेकिन इसके बावजूद समाज के लोगों को आज भी उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। उन्होंने आदिवासी समाज की पहचान, संस्कृति और अस्तित्व की रक्षा के लिए एकजुट होने का आह्वान किया।
सिंघार ने कहा, “आदिवासी भीख नहीं मांगता, वह अपना अधिकार मांगता है।” उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज स्वाभिमानी समाज है और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना जानता है।
‘आदिवासी कोड की लड़ाई एक बार नहीं, 100 बार लड़ेंगे’
सम्मेलन में आदिवासी कोड की मांग भी प्रमुखता से उठाई गई। उमंग सिंघार ने कहा कि आदिवासी समाज की अपनी अलग पहचान, संस्कृति और परंपराएं हैं। ऐसे में समाज लंबे समय से अलग आदिवासी कोड की मांग कर रहा है।
उन्होंने कहा कि आदिवासी कोड की लड़ाई सिर्फ एक बार नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर 100 बार लड़ी जाएगी। उनका कहना था कि आने वाली पीढ़ी को उसकी पहचान और अधिकारों के साथ आगे बढ़ाने के लिए इस मांग को मजबूती से उठाना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि प्रदेश का आदिवासी युवा अब अपने अधिकारों और भविष्य को लेकर जागरूक हो चुका है। समाज को अपनी संस्कृति, पहचान और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होकर आगे आना होगा।
इंदौर में भी हजारों युवाओं ने निकाली विशाल रैली
विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर इंदौर में भी आदिवासी समाज की ओर से विशाल रैली निकाली गई। सुबह करीब 6 बजे लालबाग परिसर से शुरू हुई रैली में हजारों की संख्या में युवा शामिल हुए। पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे युवाओं ने हाथों में झंडे और पारंपरिक वाद्ययंत्र लेकर अपनी संस्कृति और एकता का संदेश दिया।
रैली लालबाग से शुरू होकर कलेक्टोरेट चौराहा, पलसीकर चौराहा, सोनकर धर्मशाला चौराहा, सिंधी कॉलोनी चौराहा और टावर चौराहा होते हुए भंवरकुआं चौराहे पहुंची। इसके बाद रैली राजीव गांधी चौराहे पहुंची, जहां इसका समापन हुआ।
रैली के दौरान आदिवासी समाज के युवाओं में खासा उत्साह देखने को मिला। पारंपरिक वेशभूषा, ढोल और अन्य वाद्ययंत्रों के साथ युवाओं ने अपनी सांस्कृतिक पहचान का प्रदर्शन किया।
प्रदेशभर में दिखी संस्कृति और एकजुटता की तस्वीर
विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर मध्यप्रदेश के अलग-अलग जिलों में भी कार्यक्रम आयोजित किए गए। कई स्थानों पर रैलियां निकाली गईं तो कहीं सम्मेलन और सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। आदिवासी समाज के लोगों ने पारंपरिक नृत्य, संगीत और वेशभूषा के जरिए अपनी सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित किया।
पूरे प्रदेश में आयोजित कार्यक्रमों में पहचान, संस्कृति, संवैधानिक अधिकार, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सम्मान जैसे मुद्दे भी चर्चा के केंद्र में रहे। खासकर युवाओं की बड़ी भागीदारी ने यह संकेत दिया कि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों और अधिकारों को लेकर लगातार सजग हो रही है।
आदिवासी दिवस पर अधिकारों और पहचान की आवाज
भोपाल के दसहरा मैदान से लेकर इंदौर की सड़कों तक रविवार को आदिवासी समाज की एकजुटता दिखाई दी। पारंपरिक उत्सव के साथ-साथ आयोजनों में अधिकारों और पहचान के सवाल भी प्रमुखता से उठे। आदिवासी दिवस के आयोजनों ने यह संदेश दिया कि समाज अपनी संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित रखते हुए शिक्षा, रोजगार और संवैधानिक अधिकारों के लिए भी अपनी आवाज मजबूती से उठाना चाहता है।
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