TM Special: रोजगार की तलाश से शुरू हुआ सफर, अब प्रदर्शनी तक पहुँची कला: भीली चित्रकार ललिता ताहेड़ की कहानी

भोपाल में 70वीं शलाका चित्र प्रदर्शनी, भील संस्कृति और प्रकृति की झलक दिखाते हैं कलाकार के चित्र
TM Special: रोजगार की तलाश से शुरू हुआ सफर, अब प्रदर्शनी तक पहुँची कला: भीली चित्रकार ललिता ताहेड़ की कहानी
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भोपाल। भोपाल के जनजातीय संग्रहालय में आयोजित 70वीं ‘शलाका’ चित्र प्रदर्शनी में भीली जनजातीय चित्रकार ललिता ताहेड़ की कलाकृतियां दर्शकों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं। झाबुआ जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर राजधानी तक पहुंची ललिता ने बिना औपचारिक शिक्षा के अपनी मेहनत और परिवार के सहयोग से पारंपरिक भीली चित्रकला में पहचान बनाई है। उनकी चित्रकला में भील समुदाय की परंपराएं, जंगल और प्रकृति का जीवंत चित्रण दिखाई देता है।

मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय लंबे समय से प्रदेश की समृद्ध जनजातीय कला और संस्कृति को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न गतिविधियाँ आयोजित करता रहा है। ‘शलाका’ प्रदर्शनी इसी पहल का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें हर माह किसी एक जनजातीय कलाकार को केंद्र में रखकर उसकी कला को प्रदर्शित किया जाता है। इससे न केवल कलाकारों को पहचान मिलती है बल्कि आम दर्शकों को भी जनजातीय कला की विविधता और उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने का अवसर मिलता है।

प्राकृतिक परिवेश में बीता बचपन, शिक्षा से रहीं वंचित

भील जनजातीय चित्रकार ललिता ताहेड़ का जन्म झाबुआ जिले के गुजरात सीमा से लगे अंतरवेलिया गाँव में हुआ। जंगलों और पहाड़ियों से घिरे इस प्राकृतिक परिवेश में उनका बचपन बीता। ग्रामीण क्षेत्र में स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव होने के कारण वे औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकीं। साधारण कृषक परिवार में जन्मी ललिता अपने माता-पिता की नौ संतानों में से एक हैं। बचपन से ही उन्हें घर की दीवारों पर रंगों से सजावट करने और चित्र बनाने का शौक था, जो आगे चलकर उनकी पहचान बन गया।

परिवार से मिली प्रेरणा, सास से सीखी भीली चित्रकला

विवाह के बाद ललिता ताहेड़ अपने पति विनोद ताहेड़ के साथ रोजगार की तलाश में कुछ वर्ष पहले भोपाल आ गईं। यहाँ उन्हें अपनी बड़ी सास और सुप्रसिद्ध भीली चित्रकार लाडोबाई का मार्गदर्शन मिला। लाडोबाई के सहयोग और प्रेरणा से उन्होंने पारंपरिक भीली चित्रकला की बारीकियों को समझा और अभ्यास के साथ अपनी कला को निखारा। धीरे-धीरे उन्होंने स्वतंत्र रूप से चित्रकारी करना शुरू किया और आज वे अपनी विशिष्ट शैली के लिए जानी जाती हैं। ललिता अपनी कला की सफलता का पूरा श्रेय अपनी बड़ी सास लाडोबाई को देती हैं, जिनकी प्रेरणा और मार्गदर्शन ने उनकी प्रतिभा को दिशा दी।

चित्र उकेरती ललिता ताहेड
चित्र उकेरती ललिता ताहेडफ़ोटो- जनजातीय संग्रहालय

देश-विदेश तक पहुंचीं कलाकृतियाँ

ललिता ताहेड़ की कला अब केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रही है। उन्होंने हैदराबाद, नई दिल्ली, कच्छ (गुजरात) और भोपाल सहित कई स्थानों पर आयोजित एकल और संयुक्त चित्रकला प्रदर्शनियों में भाग लिया है। उनकी प्रतिभा को कई संस्थाओं ने सम्मानित भी किया है। दिल्ली की मणिकर्णिका कलावीथिका द्वारा आयोजित कला प्रतियोगिता में उन्होंने स्वर्ण पदक भी प्राप्त किया है।

ललिता द्वारा बनाई गई पेंटिंग
ललिता द्वारा बनाई गई पेंटिंग

उनकी कई कलाकृतियाँ भारत के विभिन्न कला संग्रहालयों में संरक्षित हैं। इसके अलावा फ्रांस, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी उनके चित्र संग्रहित किए जा चुके हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि भीली चित्रकला की पारंपरिक शैली को उन्होंने वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

द मूकनायक से बातचीत में भीली चित्रकार ललिता ताहेड़ ने बताया कि विवाह के बाद वे अपने पति विनोद ताहेड़ के साथ रोजगार की तलाश में भोपाल आ गई थीं। भोपाल आने के बाद उन्हें अपनी बड़ी सास और प्रसिद्ध भीली चित्रकार लाडोबाई का मार्गदर्शन मिला। लाडोबाई से उन्होंने पारंपरिक भीली चित्रकला की बारीकियां सीखीं और लगातार अभ्यास करते हुए धीरे-धीरे स्वतंत्र रूप से चित्र बनाना शुरू किया।

ललिता ताहेड़ ने बताया कि आज उन्हें जो पहचान मिल रही है, उसमें उनकी बड़ी सास के मार्गदर्शन के साथ-साथ उनके पति का भी बड़ा सहयोग रहा है। उनका कहना है कि परिवार के समर्थन और अपने परिश्रम के कारण आज उनकी कला को पहचान मिलने लगी है और उनके चित्रों को लोग पसंद भी कर रहे हैं।

चित्रों में झलकती है भील संस्कृति और प्रकृति

ललिता ताहेड़ के चित्रों की खासियत यह है कि उनमें भील समाज की पारंपरिक जीवन शैली, प्रकृति और संस्कृति का जीवंत चित्रण दिखाई देता है। उनके चित्रों में जंगली पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, जंगल और पहाड़ों के दृश्य प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं। साथ ही भील समुदाय की परंपराएँ, लोक जीवन और सांस्कृतिक गतिविधियाँ भी उनके चित्रों में स्पष्ट रूप से झलकती हैं।

उनकी चित्रकला में पारंपरिक भीली शैली के विशिष्ट रंग और बिंदु-आकृतियों का प्रयोग देखने को मिलता है, जो इसे अन्य शैलियों से अलग बनाता है। यही विशेषता दर्शकों को उनकी कला की ओर आकर्षित करती है।

जनजातीय कलाकारों को मिल रहा मंच

जनजातीय संग्रहालय द्वारा आयोजित ‘शलाका’ प्रदर्शनी श्रृंखला का उद्देश्य प्रदेश के जनजातीय कलाकारों को पहचान दिलाना और उनकी कला को बाजार से जोड़ना है। इससे कलाकारों को आर्थिक सहयोग मिलने के साथ-साथ उनकी पारंपरिक कला का संरक्षण भी होता है। इस तरह की प्रदर्शनियाँ जनजातीय कला को नई पीढ़ी और शहरी समाज तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

भोपाल में आयोजित यह प्रदर्शनी कला प्रेमियों के लिए भील चित्रकला की समृद्ध परंपरा को करीब से देखने और समझने का एक विशेष अवसर प्रदान कर रही है। संग्रहालय प्रशासन के अनुसार, दर्शक प्रदर्शनी में प्रदर्शित चित्रों को देखने के साथ-साथ उन्हें खरीद भी सकते हैं।

क्या है? ‘शलाका’

मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय द्वारा जनजातीय कलाकारों को प्रोत्साहित करने और उनकी कला को व्यापक मंच देने के उद्देश्य से प्रतिमाह ‘शलाका’ चित्र प्रदर्शनी श्रृंखला का आयोजन किया जाता है। इस पहल के तहत संग्रहालय की ‘लिखन्दरा प्रदर्शनी दीर्घा’ में हर महीने किसी एक जनजातीय कलाकार की चित्र प्रदर्शनी सह-विक्रय लगाई जाती है, जहां दर्शक कलाकार की कलाकृतियों को करीब से देख सकते हैं और इच्छानुसार उन्हें खरीद भी सकते हैं। इस श्रृंखला का उद्देश्य जनजातीय कलाकारों की पारंपरिक कला को बढ़ावा देना, उन्हें आर्थिक अवसर उपलब्ध कराना और समाज को जनजातीय संस्कृति से परिचित कराना है।

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