
भोपाल। मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में केन-बेतवा, मझगाय, रूँझ और ललितपुर-सिंगरौली रेलमार्ग परियोजनाओं से प्रभावित किसानों, आदिवासियों और विस्थापित परिवारों का चिता आंदोलन रविवार को 51वें दिन भी जारी है। जय किसान संगठन के बैनर तले सामाजिक कार्यकर्ता एवं संगठन के नेता अमित भटनागर के नेतृत्व में चल रहा यह आंदोलन अब सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आंदोलन स्थल से सामने आ रही तस्वीरें विचलित करने वाली हैं। जिंदा आदिवासी महिलाएं चिता पर लेटकर विरोध जता रही हैं, किसान फांसी के फंदे पर चढ़कर अपना दर्द बयां कर रहे हैं और युवा सूली पर लटककर विस्थापन के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। सांकेतिक चिताओं के बीच रमिया बाई आदिवासी की वास्तविक चिता भी जल चुकी है। इसके बावजूद प्रभावित परिवारों का आरोप है कि इतने बड़े संघर्ष और मानवीय त्रासदी के बाद भी सरकार उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए गंभीर दिखाई नहीं दे रही है।
द मूकनायक से बातचीत में आंदोलन में शामिल 50 वर्षीय रंभा बाई ने बताया कि उन्हें उनकी जमीन और घर से बेदखल कर दिया गया है, लेकिन अब तक उन्हें उचित मुआवजा भी नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि उनके परिवार में 2 बेटे उनकी पत्नी और उनके बच्चे हैं। कभी उनका एक भरा-पूरा परिवार अपने घर में रहता था, लेकिन अब घर छिन जाने के बाद पूरा परिवार खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर परिवार के छोटे बच्चों के साथ वे कहां जाएं और किसके सहारे अपना जीवन गुजारें?
रंभा बाई ने कहा कि जब तक सरकार उन्हें उचित मुआवजा देने और सम्मानजनक विस्थापन की व्यवस्था नहीं करती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने कहा, "चाहे इस संघर्ष में शरीर से प्राण ही क्यों न निकल जाएं, लेकिन अब यह आंदोलन रुकने वाला नहीं है। हमने अपना घर और जमीन खोई है, अब अपने अधिकारों की लड़ाई से पीछे नहीं हटेंगे।" उनका कहना है कि सरकार को प्रभावित परिवारों की पीड़ा समझनी चाहिए और उन्हें केवल आश्वासन देने के बजाय रहने और जीवनयापन की उचित व्यवस्था करनी चाहिए।
आंदोलन में शामिल 35 वर्षीय महिला रामपत ने द मूकनायक से बातचीत में बताया कि उन्हें आंदोलन करते हुए 50 दिन से अधिक हो चुके हैं, लेकिन अब तक उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि उनका मकान छीन लिया गया है, इसके बावजूद उन्हें अब तक उचित मुआवजा नहीं मिला है। घर उजड़ने के बाद परिवार के सामने रहने और भविष्य की चिंता खड़ी हो गई है। रामपत का कहना है कि वे पिछले 50 दिनों से न्याय की मांग को लेकर आंदोलन में शामिल हैं और जब तक सरकार उनकी मांगों को पूरा नहीं करती तथा उचित मुआवजे की व्यवस्था नहीं करती, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि न्याय मिलने तक वे आंदोलन से पीछे नहीं हटेंगी।
51 दिनों से जारी यह आंदोलन अब केवल मुआवजे और विस्थापन का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि प्रभावित परिवारों के अधिकारों, प्रशासनिक जवाबदेही और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करने के अधिकार का सवाल बन गया है।
आंदोलनकारियों का कहना है कि जिन लोगों ने अपनी जमीन, घर, गांव और आजीविका खोने का दर्द झेला है, उन्हें अब तक न्याय नहीं मिला है। लगातार विरोध और प्रशासन से बातचीत के बावजूद उनकी प्रमुख मांगें अधूरी हैं।
मुआवजे और पुनर्वास से पहले उजाड़े गए घर!
आंदोलनकारियों का आरोप है कि विकास परियोजनाओं के नाम पर लोगों के घर, गांव, जल, जंगल और जमीन को डुबोया जा रहा है, लेकिन पुनर्वास और उचित मुआवजे की कानूनी प्रक्रिया पूरी किए बिना ही विस्थापन की कार्रवाई शुरू कर दी गई। उनका कहना है कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन एवं पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के प्रावधानों की अनदेखी की गई है।
अधिनियम की धारा 38 के अनुसार, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन की निर्धारित प्रक्रिया पूरी किए बिना प्रभावित परिवारों को विस्थापित करने और उनकी भूमि पर कब्जा लेने की कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। सिंचाई परियोजनाओं के मामलों में पुनर्वास की प्रक्रिया डूब क्षेत्र में आने से कम से कम छह महीने पहले पूरी करने का प्रावधान भी है।
प्रभावितों का कहना है कि इसके बावजूद मुआवजे और पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही 10 मई से मकानों को तोड़ने और गांव खाली कराने की कार्रवाई शुरू कर दी गई थी। शुरुआत में प्रभावित परिवारों को पांच लाख रुपये का पैकेज दिया जा रहा था, जिसे आंदोलन के बाद बढ़ाकर 12.50 लाख रुपये किया गया। हालांकि, इसकी भुगतान प्रक्रिया अभी भी जारी है और प्रशासन की ओर से प्रभावित परिवारों का दोबारा सर्वे कराने की बात कही जा रही है।
ऐसे में प्रभावित परिवार सवाल उठा रहे हैं कि जब मुआवजे का निर्धारण, संपत्तियों का मूल्यांकन और पुनर्वास की प्रक्रिया ही पूरी नहीं हुई थी, तो आखिर घरों को तोड़ने और लोगों को विस्थापित करने की कार्रवाई किस आधार पर शुरू की गई? आंदोलनकारियों की मांग है कि प्रत्येक प्रभावित परिवार की जमीन, मकान, पेड़, कुएं और अन्य परिसंपत्तियों का उचित मूल्यांकन किया जाए। साथ ही उन्हें कानून के अनुसार मुआवजा और पुनर्वास दिया जाए। परियोजनाओं में कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जांच की मांग भी लगातार उठाई जा रही है।
दिव्या अहिरवार 34 दिनों से जेल में
चिता आंदोलन का एक चिंताजनक पहलू आंदोलनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई और उनके खिलाफ दर्ज किए गए गंभीर आपराधिक मामलों का है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि 27, 28 और 29 सितंबर को पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट की, महिलाओं पर लाठीचार्ज किया और आंदोलन समाप्त करने के लिए दबाव बनाया। पन्ना के अलावा दूसरे जिलों से भी पुलिस बल आंदोलन स्थल पर पहुंचा था। आंदोलनकारियों ने बिजली काटने और पानी की आपूर्ति बाधित करने जैसी कार्रवाइयों के आरोप भी लगाए हैं।
जय किसान संगठन की युवा आंदोलनकारी दिव्या अहिरवार पिछले 34 दिनों से पन्ना जिला जेल में बंद हैं। उन पर हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोपों में मामला दर्ज किया गया है। आंदोलनकारियों का कहना है कि शांतिपूर्ण तरीके से अपने अधिकारों की मांग कर रहे लोगों के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई लोकतांत्रिक विरोध की आवाज को दबाने की कोशिश है।
इसी तरह मझगाय बांध परियोजना से प्रभावित अजयगढ़ तहसील क्षेत्र के इंद्रपाल आदिवासी और कमलेश प्रजापति को भी छतरपुर जिले में दर्ज पुराने मामलों में आरोपी बनाया गया है। उन पर हत्या के प्रयास और दंगा फैलाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। दोनों का दावा है कि संबंधित घटना से उनका कोई लेना-देना नहीं था।
उनका कहना है कि 28 सितंबर को वे महिलाओं पर हुई पुलिस कार्रवाई का वीडियो बना रहे थे। इसी दौरान पुलिस द्वारा उनका मोबाइल छीनने की कोशिश का विरोध करने पर उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें चोटें आईं। इसके बाद दोनों को गिरफ्तार कर छतरपुर जिले की बिजावर जेल भेज दिया गया। उनका आरोप है कि गिरफ्तारी के दौरान उन्हें यह तक स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई कि किन मामलों में आरोपी बनाया जा रहा है। परिजनों को सूचना देने, चोटों का मेडिकल परीक्षण कराने और उचित उपचार उपलब्ध कराने को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
आंदोलनकारियों की मांग है कि इन सभी मामलों की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि किसी व्यक्ति को गलत तरीके से फंसाया गया है तो उसे न्याय मिले।
पुराने कलेक्टर और एसपी के तबादले के बाद नए प्रशासन से जगी उम्मीद
चिता आंदोलन के दौरान पुराने कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक की कार्यशैली को लेकर लगातार सवाल उठते रहे। आंदोलनकारियों ने प्रशासन पर उनकी समस्याओं की अनदेखी करने और आंदोलन को दबाने का आरोप लगाया था। इसी बीच आंदोलन के दौरान दोनों अधिकारियों का स्थानांतरण हो गया। नए कलेक्टर हर्ष सिंह और नए पुलिस अधीक्षक के आने के बाद प्रभावित परिवारों को प्रशासन से समाधान की उम्मीद दिखाई देने लगी है।
आंदोलन के नेतृत्वकर्ता अमित भटनागर की नए कलेक्टर हर्ष सिंह से दो बार चर्चा हो चुकी है। इन चर्चाओं में प्रभावित परिवारों के सर्वे, मुआवजे और अन्य समस्याओं के निराकरण को लेकर बातचीत हुई है। प्रशासन की ओर से समस्याओं को समझने और समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के संकेत मिलने के बाद आंदोलनकारियों में उम्मीद जरूर बनी है, लेकिन अभी तक उनकी प्रमुख मांगों पर ठोस निर्णय का इंतजार है।
छतरपुर जिले की सामाजिक कार्यकर्ता राजलक्ष्मी कुशवाहा भी आंदोलन स्थल पर पहुंचकर प्रभावित परिवारों को अपना समर्थन दे चुकी हैं। वह लगातार आंदोलनकारियों का मनोबल बढ़ा रही हैं। आंदोलन को विभिन्न सामाजिक संगठनों और जनपक्षीय कार्यकर्ताओं का भी समर्थन मिल रहा है।
विकास के विरोध में नहीं, अधिकारों और संविधान की रक्षा के लिए संघर्ष: अमित भटनागर
आंदोलन के नेतृत्वकर्ता अमित भटनागरवेद मूकनायक से कहा कि चिता आंदोलन किसी विकास परियोजना के विरोध में नहीं है, बल्कि विकास के नाम पर कानून की अनदेखी कर लोगों को उजाड़ने, उचित मुआवजा और पुनर्वास दिए बिना विस्थापित करने तथा अपने अधिकारों की आवाज उठाने वालों को डराने की प्रवृत्ति के खिलाफ है।
उनका कहना है कि 51 दिनों से जारी यह संघर्ष बता रहा है कि प्रभावित परिवार अब केवल आश्वासन सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। महिलाओं का चिताओं पर लेटना, किसानों का फांसी के फंदे पर चढ़ना और एक वास्तविक चिता का जलना सरकार और प्रशासन के लिए गंभीर चेतावनी है। इन तस्वीरों को केवल विरोध प्रदर्शन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उन परिवारों की पीड़ा के रूप में समझना चाहिए, जिन्होंने विकास परियोजनाओं के कारण अपने घर, गांव, जमीन और आजीविका खोने का खतरा झेला है।
अमित भटनागर का कहना है कि यह लड़ाई उचित मुआवजे, पुनर्वास और पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ देश के संविधान और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की भी लड़ाई है। नए कलेक्टर के साथ हुई चर्चाओं से समाधान की उम्मीद जरूर बनी है, लेकिन जब तक प्रभावित परिवारों को न्याय नहीं मिलता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
51 दिन बाद भी सरकार के सामने वही सवाल
चिता आंदोलन के 51 दिन पूरे होने के बाद भी प्रभावित परिवारों के सामने कई बुनियादी सवाल खड़े हैं। क्या मुआवजे और पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी किए बिना लोगों को उनके घरों से बेदखल किया जा सकता है? क्या अपनी जमीन, जंगल, घर और आजीविका बचाने के लिए आवाज उठाना अपराध है?
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