TM Exclusive: मध्य प्रदेश में आदिवासियों की बेदखली! वन अधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन क्यों जरूरी?

कोसमी से खिवनी अभयारण्य तक बेदखली और विस्थापन के आरोप; एक्टिविस्ट सुनील आदिवासी बोले- भाजपा आदिवासियों को सिर्फ वोट समझती है, नीरज बारिवा ने कहा- आज भी जल, जंगल और जमीन के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे आदिवासी
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भोपाल। मध्य प्रदेश में आदिवासियों के वन अधिकार, जमीन पर कब्जे, बेदखली और विस्थापन का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। सीहोर जिले की बुधनी तहसील के कोसमी गांव में आदिवासी परिवारों को उजाड़े जाने का मामला सामने आने के बाद वन अधिकार कानून, 2006 के क्रियान्वयन और सरकार की आदिवासी हितैषी नीतियों पर सवाल उठ रहे हैं। आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का आरोप है कि प्रदेश में आदिवासियों को उनके पारंपरिक निवास और जमीन से बेदखल करने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, जबकि वन अधिकार कानून के तहत उनके दावों और अधिकारों का प्रभावी तरीके से निपटारा नहीं हो रहा है।

एक्टिविस्ट एवं अधिवक्ता सुनील आदिवासी ने भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि आदिवासियों के अधिकारों से ज्यादा राजनीतिक दलों की दिलचस्पी उनके वोटों में है। वहीं, आदिवासी विकास परिषद के छात्र प्रभाग के प्रदेश अध्यक्ष नीरज बारिवा ने कहा कि सरकारें दावे तो करती हैं, लेकिन आदिवासी समुदाय आज भी जल, जंगल, जमीन और अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है।

कोसमी गांव की घटना से फिर उठे वन अधिकार कानून पर सवाल!

सीहोर जिले की बुधनी तहसील के कोसमी गांव में आदिवासी परिवारों को उजाड़े जाने का मामला प्रदेश में आदिवासियों के भूमि अधिकारों से जुड़े विवादों को सामने लाता है। इस घटना को लेकर आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि किसी गांव या कुछ परिवारों को राहत देने की घोषणा से समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। इसके लिए पूरे प्रदेश में वन अधिकार कानून का प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी है।

जागृत आदिवासी दलित संगठन के हरसिंग जमरे और नासरी बाई निंगवाल के मुताबिक, आदिवासी समुदाय की समस्या केवल घरों से बेदखली तक सीमित नहीं है। कई स्थानों पर खेती की जमीन छिनने, फसलों को नुकसान पहुंचने, मकानों को तोड़े जाने और विरोध करने पर मारपीट या मुकदमों के जरिए परेशान किए जाने के आरोप भी सामने आते रहे हैं।

उनका सवाल है कि यदि किसी परिवार का वन भूमि पर दावा कानून के तहत विचाराधीन है या उसके अधिकारों का निर्धारण नहीं हुआ है, तो उसकी स्थिति की विधिसम्मत जांच किए बिना बेदखली की कार्रवाई कैसे की जा सकती है?

वन अधिकार कानून का उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के ऐतिहासिक अन्याय को दूर करना तथा पात्र लोगों के व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देना है। ऐसे में कानून के प्रावधानों और बेदखली की कार्रवाई के बीच तालमेल सुनिश्चित करना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है।

आदिवासियों को सिर्फ वोट समझती है भाजपा

एक्टिविस्ट एवं अधिवक्ता सुनील आदिवासी ने द मूकनायक से बातचीत में भाजपा की आदिवासी राजनीति पर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि भाजपा आदिवासियों को मुख्य रूप से वोट बैंक के रूप में देखती है और उनके वास्तविक अधिकारों के समाधान के बजाय उनके मुद्दों पर राजनीतिक प्रदर्शन करती है।

सुनील आदिवासी के मुताबिक, आदिवासी समाज के अधिकारों की बात केवल चुनाव, राजनीतिक कार्यक्रमों या किसी घटना के बाद राहत देने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आदिवासियों को उनकी जमीन, जंगल और आजीविका से मनमाने तरीके से वंचित न किया जाए।

उन्होंने वन अधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि आदिवासियों की समस्याओं का समाधान घोषणाओं से नहीं, बल्कि जमीन पर अधिकारों की मान्यता, दावों के निष्पक्ष निपटारे और बेदखली से सुरक्षा के जरिए होगा।

आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के साथ-साथ विपक्षी दलों को भी इस मुद्दे पर अपनी जवाबदेही तय करनी चाहिए। किसी घटना के बाद पीड़ित परिवारों के पक्ष में बयान देना पर्याप्त नहीं है।

बैगा आदिवासियों की मौत से लेकर घर उजाड़ने तक के मामले

आदिवासी विकास परिषद के छात्र प्रभाग के प्रदेश अध्यक्ष नीरज बारिवा ने द मूकनायक से बातचीत में प्रदेश सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि भाजपा लंबे समय से मध्य प्रदेश की सत्ता में है, इसके बावजूद आदिवासी समुदाय की बुनियादी समस्याएं बनी हुई हैं।

नीरज बारिवा ने कहा, "भाजपा की लंबे समय से सरकार है। बालाघाट में बैगा आदिवासियों की मौत, कभी-कभी पीट-पीटकर मार डालना और आज घर उजाड़ देना, जमीन से बेदखल कर देना, यही प्रदेश में चल रहा है। सरकार सिर्फ दावे करती है, लेकिन आदिवासी आज भी जल, जंगल, जमीन और अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है।"

उनका कहना है कि आदिवासी समुदाय को शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, रोजगार और जमीन की सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ उसके कानूनी अधिकारों की रक्षा भी जरूरी है। यदि आदिवासी परिवार अपनी जमीन और घर को बचाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं, तो यह सरकार की नीतियों और उनके क्रियान्वयन की समीक्षा का विषय है।

बारिवा के मुताबिक, आदिवासियों की समस्याओं को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय व्यापक सामाजिक और प्रशासनिक संदर्भ में समझने की जरूरत है। बालाघाट में बैगा समुदाय के बच्चों की मौतों से जुड़े मामलों की निष्पक्ष जांच, आदिवासी परिवारों की सुरक्षा और जमीन से बेदखली के मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है।

शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल से लेकर वर्तमान तक उठते रहे सवाल

मध्य प्रदेश में आदिवासियों के वन अधिकार और विस्थापन का सवाल पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लंबे कार्यकाल के दौरान भी उठता रहा। आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि उस दौरान भी वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन में गंभीर कमियां बनी रहीं और कई क्षेत्रों में आदिवासी परिवारों को जमीन तथा जंगल से जुड़े अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ा।

अब प्रदेश में आदिवासी हितों की रक्षा के दावों के बीच कोसमी गांव की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि सरकार की घोषणाओं का लाभ प्रभावित परिवारों तक किस हद तक पहुंच रहा है।

कार्यकर्ताओं का कहना है कि किसी एक गांव में राहत देने या कुछ परिवारों के पुनर्वास की घोषणा करने से उन सभी आदिवासी परिवारों की समस्याएं हल नहीं हो सकतीं, जिनके वन अधिकार दावे लंबित हैं या जिन्हें बेदखली का सामना करने की आशंका है।

आदिवासी संगठनों ने प्रदेश में वन अधिकार दावों की स्थिति सार्वजनिक करने, खारिज किए गए दावों की समीक्षा करने और पात्र परिवारों को कानून के अनुसार अधिकार देने की मांग उठाई है।

केन-बेतवा परियोजना और खनन से विस्थापन की चिंता

मध्य प्रदेश में आदिवासी अधिकारों से जुड़ी बहस केवल वन भूमि से बेदखली तक सीमित नहीं है। विकास परियोजनाओं, खनन और जंगलों के उपयोग को लेकर भी आदिवासी समुदायों तथा पर्यावरण कार्यकर्ताओं की चिंताएं सामने आती रही हैं।

केन-बेतवा लिंक परियोजना के कारण पन्ना क्षेत्र के जंगलों और जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर लंबे समय से सवाल उठाए जाते रहे हैं। परियोजना से जुड़े डूब क्षेत्र, वन भूमि के उपयोग और प्रभावित समुदायों के पुनर्वास को लेकर पारदर्शिता तथा पर्यावरणीय प्रभावों की समीक्षा महत्वपूर्ण है।

इसी तरह सिंगरौली के धिरौली क्षेत्र में कोयला खनन परियोजना को लेकर भूमि अधिग्रहण, जंगलों और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा होती रही है। आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि विकास परियोजनाओं में प्रभावित समुदायों के कानूनी अधिकारों, पुनर्वास और आजीविका की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

बुरहानपुर और खंडवा क्षेत्रों में जंगलों की कटाई तथा लकड़ी की कथित तस्करी को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जंगलों के संरक्षण में विफलता का बोझ अक्सर स्थानीय आदिवासी समुदायों पर डाल दिया जाता है, जबकि बड़े स्तर पर वन संसाधनों के दोहन और कथित अवैध गतिविधियों के लिए जवाबदेही तय करना भी जरूरी है।

खिवनी अभयारण्य से मंडला-डिंडोरी तक बेदखली की शिकायतें

आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं ने देवास जिले के खिवनी अभयारण्य क्षेत्र में पिछले वर्ष बारिश के दौरान प्रभावित हुए आदिवासी परिवारों का भी उल्लेख किया है। उनका कहना है कि प्रभावित परिवार अब तक आश्वासनों के अनुरूप कार्रवाई की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

इसके अलावा बुरहानपुर की बलड़ी पंचायत, खंडवा के भिलाईखेड़ा तथा दमोह, मंडला और डिंडोरी सहित कई क्षेत्रों से आदिवासी परिवारों की जमीन, निवास और वन अधिकारों से जुड़े विवाद सामने आने की बात कही जा रही है।

कार्यकर्ताओं के अनुसार, इन मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई की पारदर्शिता, प्रभावित परिवारों की सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया का पालन बेहद जरूरी है। यदि किसी परिवार के अधिकारों पर विवाद है, तो उसका समाधान संबंधित कानून और निर्धारित प्रक्रिया के तहत किया जाना चाहिए।

प्रदेश में बेदखली के खतरे का सामना कर रहे आदिवासी परिवारों की वास्तविक संख्या और उनके दावों की मौजूदा स्थिति जानने के लिए जिलेवार सरकारी आंकड़ों की जरूरत है। केवल राजनीतिक बयानों के आधार पर समस्या का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता।

छह लाख दावों और खारिज आवेदनों का मुद्दा

वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन को लेकर मध्य प्रदेश में दावों के निपटारे की प्रक्रिया लंबे समय से चर्चा में रही है। आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं ने दावा किया है कि प्रदेश में लगभग छह लाख वन अधिकार दावों में से करीब 3.6 लाख दावे खारिज किए जा चुके हैं।

यह आंकड़ा वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन में मौजूद चुनौतियों की ओर ध्यान खींचता है। हालांकि, दावों की कुल संख्या, व्यक्तिगत और सामुदायिक दावों का वर्गीकरण, खारिज आवेदनों की स्थिति तथा पुनर्विचार के बाद हुए निपटारे की पुष्टि के लिए नवीनतम आधिकारिक आंकड़ों की जरूरत है।

साल 2019 में वन अधिकार दावों और उनकी प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुए घटनाक्रम के बाद दावों की समीक्षा का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहा। इस पृष्ठभूमि में सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जिन दावों को खारिज किया गया, उनमें पात्र आवेदकों को अपनी आपत्ति रखने और आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने का पर्याप्त अवसर मिला या नहीं।

वन अधिकार कानून के तहत दावों की प्रक्रिया में ग्राम सभा की महत्वपूर्ण भूमिका है। दावों का परीक्षण निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होना चाहिए और खारिज किए गए दावों के कारणों की जानकारी संबंधित आवेदकों को दी जानी चाहिए। पात्र परिवारों को कानून के तहत उपलब्ध पुनर्विचार और अपील की प्रक्रियाओं तक पहुंच सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

बिरसा मुंडा और टंट्या मामा के नाम पर कार्यक्रम, लेकिन अधिकारों पर सवाल

मध्य प्रदेश में आदिवासी नायकों बिरसा मुंडा, टंट्या मामा और भीमा नायक की स्मृति में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। राजनीतिक दल इन क्रांतिकारियों के संघर्ष और योगदान को आदिवासी समाज से जुड़ने के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

लेकिन आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन नायकों के नाम पर कार्यक्रम आयोजित करने के साथ उनके संघर्ष के मूल प्रश्नों जल, जंगल, जमीन, सम्मान और आत्मनिर्णय को भी नीतियों में जगह मिलनी चाहिए।

उनका सवाल है कि यदि आदिवासी समाज को सम्मान देने की बात की जाती है, तो उसके घरों, खेतों, जंगलों और आजीविका की सुरक्षा को भी समान प्राथमिकता क्यों नहीं दी जाती? आदिवासी समुदाय के लिए वास्तविक सम्मान तभी सुनिश्चित हो सकता है, जब उसके कानूनी अधिकारों की रक्षा हो और प्रशासनिक कार्रवाई में उसकी आवाज सुनी जाए।

सरकार से क्या हैं प्रमुख मांगें?

  • आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं और संगठनों की मांग है कि मध्य प्रदेश सरकार वन अधिकार कानून, 2006 के क्रियान्वयन की व्यापक समीक्षा कराए। इसके तहत निम्नलिखित कदम महत्वपूर्ण हैं:

  • प्रदेश में लंबित, स्वीकृत और खारिज वन अधिकार दावों के जिलेवार आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं।

  • खारिज दावों की समीक्षा कर पात्र आवेदकों को कानून के अनुसार न्याय दिलाया जाए।

  • बेदखली की कार्रवाई में कानून और निर्धारित प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित किया जाए।

  • कोसमी और अन्य प्रभावित क्षेत्रों में परिवारों की स्थिति की निष्पक्ष जांच कर उनके अधिकारों के अनुरूप कार्रवाई की जाए।

  • विकास परियोजनाओं और खनन से प्रभावित आदिवासी परिवारों के पुनर्वास, आजीविका और कानूनी अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

  • आदिवासियों के खिलाफ हिंसा, कथित अवैध बेदखली और प्रशासनिक दुर्व्यवहार की शिकायतों की निष्पक्ष जांच कर जवाबदेही तय की जाए।

कांग्रेस ने भी उठाया सवाल!

मध्य प्रदेश कांग्रेस अनुसूचित जनजाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष रामू टेकाम ने भी द मूकनायक से बातचीत में आदिवासियों की बेदखली और वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन को लेकर सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आदिवासी हितों की रक्षा के दावे तभी सार्थक होंगे, जब जमीन पर उनके अधिकार सुरक्षित हों और उन्हें अपने घर, खेत तथा जंगल से बेदखल होने की स्थिति का सामना न करना पड़े।

रामू टेकाम ने आदिवासी समुदाय से जुड़े मुद्दों पर सरकार की जवाबदेही तय करने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आदिवासियों की समस्याओं का समाधान केवल आश्वासनों और घोषणाओं से नहीं हो सकता, बल्कि वन अधिकार कानून का प्रभावी क्रियान्वयन, लंबित दावों का निष्पक्ष निपटारा और प्रभावित परिवारों को न्याय दिलाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।

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