
उदयपुर- जंगल को बचाने के नाम पर सरकार की नजर जंगल में बसे आदिवासियों पर है जबकि आदिवासी से ही जंगल है! ऐसे में आदिवासियों को अपने जीवन, अपने सम्मान और अपने संस्कृति को बचाने के लिए "करो या मरो" के जज्बे के साथ मजबूत आंदोलन खड़ा करना होगा।
यह विचार पूर्व सांसद और आदिवासी राष्ट्रीय अधिकार मंच की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वृंदा करात ने उदयपुर- डूंगरपुर जिले में वनाधिकार के पट्टे लेने की मांग को लेकर माछला मंगरा स्थित शिराली भवन में युवाओं के आयोजित प्रशिक्षण शिविर में व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि केंद्र में भाजपा के सरकार में आने के बाद राजस्थान में एक भी व्यक्ति को वन अधिकार का पट्टे नहीं मिला है, इससे सरकार का आदिवासियों के प्रति चरित्र स्पष्ट होता है। उन्होंने कहा कि भाजपा आदिवासियों की दुश्मन नंबर एक पार्टी है जो आदिवासियों के जीवन को बर्बाद करने पर तुली हुई है।
उन्होंने कहा कि राज्य मे वनाधिकार के पट्टे के लिए किए 1,18,675 आवेदनों में से केवल 51,775 आवेदन ही स्वीकृत कर 66,213 आवेदन अस्वीकृत कर दिए गए। उन्होंने कहा कि उदयपुर जिले में 22,533 आवेदनों में से 12,758 आवेदन स्वीकृत कर 9775 आवेदन अस्वीकृत कर दिए गए।
वृंदा करात ने कहा कि वन अधिकार कानून में आदिवासियों को 25 बीघा जंगल की जमीन तक का पट्टे देने का अधिकार है लेकिन उन्हे मात्र दो से चार बीघा तक की जमीन का ही पट्टे दिया गया है। उन्होंने कहा कि कानून में जिला स्तरीय समिति को वन अधिकार के पट्टे देने में अंतिम अधिकार दिया गया है लेकिन सरकारों ने उसे पंगु बना दिया।
उन्होंने कहा कि जंगल की भूमि पर सड़क नहीं, लाइट नहीं, पानी नहीं, स्कूल नहीं जबकि कानून मे कोई रोक नहीं है। उन्होंने कहा कि "यह कैसा देश बन रहा है"। करात ने कहा कि "आदिवासी जितनी जमीन पर हल जोतता है वह उतनी जमीन का मालिक है, सरकार, पूंजीपति और प्रशासन उसके जज्बात से न खेले।" उन्होंने बताया कि आने वाले वक्त में उदयपुर जिले में वन अधिकार के पट्टे को लेकर बड़ा आंदोलन किया जाएगा।
इस अवसर पर आदिवासी जनाधिकार एका मंच के राज्य अध्यक्ष दुलीचंद मीणा ने कहा कि अधिकारियों ने आदिवासियों को वन भूमि के पट्टे नहीं देने के लिए अपने कार्यालय में बैठ एक लाइन "मौके पर उसका कब्जा नहीं पाया गया" लिख आदिवासियों के जीवन को अंधेरे में धकेल दिया। उन्होंने कहा कि भाजपा और कांग्रेस पार्टी ने आदिवासियों के साथ हमेशा धोखा किया और जाति के नाम पर बना राजनीतिक दल भी आदिवासियों की भावनाओं के साथ खेल रहा है और आदिवासियों के जीवन से जुड़े मुद्दे पर कोई काम नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि आदिवासी वनवासी नहीं होकर , जंगल का मूल निवासी है! उन्होंने कहा कि आदिवासी को किसी धर्म से जोड़ना भी उसके साथ अन्याय होगा! उन्होंने जनगणना में आदिवासियों के अलग कालम होने की भी मांग की।
इस अवसर पर माकपा जिला सचिव राजेश सिंघवी,आदिवासी जन अधिकार एका मंच के जिला अध्यक्ष हाकरचंद खराड़ी, जिला सचिव प्रेम पारगी, देवारम, प्रभुलाल भगोरा, श्रवण, नौजवान सभा के रमेश,डूंगरपुर के बाबूलाल, फाल्गुन बरांडा आदि मौजूद थे।
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