
लखनऊ। कभी दिहाड़ी मजदूरी करने वाली बनकटी गांव की वन देवी थारू आज एक सफल उद्यमी बन चुकी हैं। उन्होंने दुधवा आने वाले पर्यटकों के सामने अपने समुदाय के पारंपरिक हुनर को पेश करके कमाई के कई रास्ते खोल लिए हैं। आज वह एक होमस्टे, हैंडीक्राफ्ट आउटलेट और लोक कला प्रदर्शन समूह का सफलतापूर्वक संचालन कर रही हैं।
साल 2025 में 'ग्रामीण पर्यटन विकास परियोजना' से जुड़ने के बाद वन देवी ने अपने घर के एक हिस्से को 'सौम्या होमस्टे' में तब्दील कर दिया। शुरुआत में उनके पास मेहमानों के लिए केवल एक कमरा था, जिसे बढ़ाकर अब उन्होंने दो कर लिया है।
जूट, मूंज और बांस से बने उत्पाद बेचने वाले उनके हैंडीक्राफ्ट आउटलेट से हर महीने करीब 20,000 रुपये की कमाई होती है। इसके अलावा, उनके द्वारा बनाए गए एक सांस्कृतिक समूह ने लोक नृत्य और संगीत कार्यक्रमों के जरिए 50,000 रुपये की अतिरिक्त आमदनी भी की है।
वन देवी का यह सफर दुधवा के आस-पास के गांवों में आ रहे एक बड़े बदलाव का प्रतीक है। यहां की थारू महिलाएं अब अपने घरेलू हुनर, पारंपरिक खान-पान और सांस्कृतिक ज्ञान को आजीविका के मजबूत साधन में बदल रही हैं।
गुरुवार को मनाए गए अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस पर इन महिलाओं की सफलता की कहानियां एक बड़ा संदेश देती हैं। ये कहानियां बताती हैं कि कैसे पर्यटन का क्षेत्र खेती और मजदूरी से परे जाकर रोजगार के नए अवसर पैदा कर रहा है और महिलाओं के हुनर को एक बड़े बाजार तक पहुंचा रहा है।
उत्तर प्रदेश के पर्यटन, संस्कृति और धार्मिक मामलों के अपर मुख्य सचिव (एसीएस) अमृत अभिजात का कहना है कि यूपी के तराई बेल्ट में लगभग 25,000 थारू निवासी पर्यटन से जुड़ी आजीविका से जुड़े हुए हैं। वे प्रत्यक्ष रूप से या फिर होमस्टे, भोजन, हस्तशिल्प, गाइड सेवा, परिवहन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से कमाई कर रहे हैं।
इस पहल के तहत नौ ग्रामीण पर्यटन गांवों को विशेष पर्यटन स्थलों के रूप में विकसित किया जा रहा है। इनमें बनकटी, चंदन चौकी, गोबरोला, हिम्मत नगर, नझोटा, परसिया, पिपरौला, सिंघिया और पुरैना शामिल हैं। यहां आने वाले पर्यटक जंगल सफारी के साथ-साथ थारू समुदाय के आतिथ्य और ग्रामीण जीवन का सीधा अनुभव ले सकते हैं।
पुरैना गांव की माया चौधरी की कहानी भी बेहद प्रेरणादायक है। दो बच्चों की मां और पंचायत सहायक के रूप में कार्यरत माया पर्यटकों को पारंपरिक थारू व्यंजन परोसती हैं और उनके लिए लोक नृत्य पेश करती हैं। उन्होंने 10 अन्य महिलाओं को भी सांस्कृतिक कार्यक्रमों से जुड़ने के लिए प्रेरित किया है। इस पहल से जुड़ने के बाद से वह भोजन और प्रस्तुतियों के जरिए लगभग 1 लाख रुपये कमा चुकी हैं।
चंदन चौकी इलाके की मंतिया मूंज और जूट से बैग, चटाई और टोकरी जैसे उत्पाद बनाकर हर महीने 10,000 से 15,000 रुपये कमा रही हैं। उनके बनाए उत्पाद अब दिल्ली, आगरा, वाराणसी के बाजारों और कुंभ मेले की प्रदर्शनियों तक पहुंच चुके हैं। मंतिया अब अन्य महिलाओं को भी इस कला का प्रशिक्षण दे रही हैं।
दिहाड़ी मजदूरी छोड़कर 'शांति होमस्टे' की शुरुआत करने वाली निर्मला देवी थारू की सफलता भी एक बड़ी मिसाल है। कम उम्र में विधवा होने के बाद उन पर चार बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी आ गई थी। ऐसे में उन्होंने मेहमाननवाजी, पारंपरिक व्यंजनों, हस्तशिल्प और लोक कलाओं को मिलाकर अपनी कमाई के कई मजबूत जरिए तैयार कर लिए।
पर्यटन से जुड़ी इन गतिविधियों के जरिए निर्मला ने करीब 2 लाख रुपये की शानदार कमाई की है। इसके साथ ही उनके हस्तशिल्प आउटलेट से भी उन्हें हर महीने लगभग 15,000 रुपये की आमदनी हो रही है।
ये सभी उद्यम मिलकर एक ही पर्यटक से कई लोगों के लिए कमाई के अवसर पैदा करते हैं। जब कोई पर्यटक आता है, तो एक परिवार को उसके ठहरने का किराया मिलता है, दूसरे की भोजन से कमाई होती है, कारीगरों के उत्पाद बिकते हैं और स्थानीय सांस्कृतिक समूहों को अपनी कला प्रदर्शन के पैसे मिलते हैं।
एसीएस अमृत अभिजात ने बताया कि सरकार का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पर्यटकों द्वारा खर्च किया जाने वाला पैसा गांवों की अर्थव्यवस्था में ही रहे। इस योजना के तहत इन नौ गांवों के लगभग 100 निवासियों को गाइड का प्रशिक्षण दिया गया है। वहीं, करीब 200 महिलाओं ने शिल्प कला और 50 से अधिक महिलाओं ने पारंपरिक थारू व्यंजन बनाने की विशेष ट्रेनिंग हासिल की है।
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