'मुर्दों को कब्र से निकालना क्रूरता...' छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाईयों के शवों की खुदाई के मामले पर SC का कड़ा एक्शन, जानिए पूरा मामला

शीर्ष अदालत ने कहा- शवों को कब्र से निकालना क्रूर और अमानवीय; राज्य सरकार को नोटिस जारी कर 4 हफ्ते में मांगा जवाब, जबरन खुदाई पर लगाई तत्काल रोक
Supreme Court
सुप्रीम कोर्टफोटो साभार- IANS
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के गांवों में आदिवासी ईसाइयों के शवों को कब्र से जबरन बाहर निकालने और उन्हें दूसरी जगह दफनाने के गंभीर आरोपों पर कड़ा रुख अपनाया है। बुधवार को शीर्ष अदालत ने इस मामले में छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। साथ ही, अदालत ने शवों को कब्र से निकालने (exhumation) की किसी भी तरह की आगे की कार्रवाई पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: अब और शव नहीं निकाले जाएंगे

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की तीन सदस्यीय पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट आदेश दिया। पीठ ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करने के बाद कहा, "इस बीच, यह सुनिश्चित किया जाए कि दफनाए गए शवों को बाहर निकालने की किसी भी और कार्रवाई की अनुमति नहीं दी जाएगी।" मामले की अगली सुनवाई अब चार सप्ताह बाद निर्धारित की गई है।

यह आदेश उस याचिका पर आया है जिसमें दावा किया गया था कि छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाइयों को उनके अपने ही गांवों में, जहां उनके पूर्वज रहते आए हैं, अपने deceased (मृत) परिजनों को दफनाने से रोका जा रहा है।

क्या है पूरा मामला?

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस ने अदालत के सामने कुछ बेहद विचलित करने वाली घटनाओं का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि एक याचिकाकर्ता की मां के शव को उनकी जानकारी के बिना ही कब्र से खोदकर निकाल लिया गया और कहीं और दफना दिया गया।

यही नहीं, एक अन्य मामले में एक याचिकाकर्ता के पति के शव को बहुसंख्यक समुदाय के ग्रामीणों द्वारा जबरदस्ती बाहर निकाला गया और उसे दूर किसी स्थान पर दोबारा दफन कर दिया गया। गोंसाल्वेस ने कोर्ट से अपील की कि कब्रों से शवों को जबरन हटाने की इस अमानवीय प्रक्रिया पर तुरंत रोक लगाई जानी चाहिए।

संविधान के अनुच्छेदों का उल्लंघन

यह याचिका 'छत्तीसगढ़ एसोसिएशन फॉर जस्टिस एंड इक्वलिटी' और अन्य द्वारा अधिवक्ता सत्य मित्रा के माध्यम से दायर की गई है। याचिका में इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों का हनन बताया गया है।

संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस याचिका में कहा गया है कि आदिवासी ईसाइयों को उनके गांवों की सीमा के भीतर अपने मृतकों को दफनाने से रोका जा रहा है, जबकि अन्य समुदायों के लिए ऐसी कोई रोक नहीं है। याचिका में दलील दी गई है कि शवों को खोदकर निकालना और उन्हें 50 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर ले जाकर दोबारा दफनाना क्रूर और अपमानजनक व्यवहार है। यह अनुच्छेद 14 और 21 के तहत पूरी तरह से अस्वीकार्य है।

याचिकाकर्ताओं की प्रमुख मांगें

याचिका में मांग की गई है कि राज्य सरकार और किसी भी निजी व्यक्ति को अंतिम संस्कार में बाधा डालने से रोका जाए। साथ ही, यह घोषणा करने की मांग की गई है कि जाति, धर्म या एससी/एसटी/ओबीसी स्थिति की परवाह किए बिना सभी व्यक्तियों को उस गांव में अपने मृतकों को दफनाने की अनुमति हो, जहां वे रहते हैं।

इसके अलावा, शीर्ष अदालत से अनुरोध किया गया है कि वह राज्य की सभी ग्राम पंचायतों को निर्देश दे कि वे प्रत्येक गांव के भीतर सभी समुदायों के लिए दफनाने हेतु विशिष्ट क्षेत्र निर्धारित करें। याचिका में धर्मनिरपेक्षता और भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए एक ही गांव के भीतर सभी समुदायों के लिए 'कॉमन ग्रेवयार्ड' (साझा कब्रिस्तान) बनाने की वकालत भी की गई है। इसमें कहा गया है कि आम गांव के कब्रिस्तान में जगह न देना संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।

पुलिस और प्रशासन पर गंभीर आरोप

याचिका में आरोप लगाया गया है कि राज्य तंत्र मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के बजाय उन सांप्रदायिक तत्वों के गैरकानूनी कृत्यों को बढ़ावा दे रहा है जो शवों को खोदते हैं और शोक संतप्त परिवारों को डराते हैं।

याचिका में जनवरी 2025 के एक फैसले का भी हवाला दिया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ में एक पादरी के शव को लेकर खंडित फैसला सुनाया था और अंतिम संस्कार पड़ोसी गांव में करने का निर्देश दिया था। आरोप है कि छत्तीसगढ़ पुलिस अब इस फैसले का इस्तेमाल एक 'मिसाल' के तौर पर कर रही है ताकि आदिवासी ईसाइयों को उनके अपने गांवों में दफनाने से रोका जा सके, भले ही वहां कोई स्थानीय विवाद न हो।

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