
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक बेहद अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी आश्रित विवाहित बेटी को 'परिवार' की परिभाषा से बेदखल नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च अदालत ने साफ कहा है कि यदि नौकरी के दौरान किसी कर्मचारी का निधन हो जाता है, तो उसकी विवाहित बेटी भी अनुकंपा के आधार पर रोजगार या राशन की दुकान के आवंटन की पूरी हकदार होगी।
जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार के उस प्रावधान को पूरी तरह से गलत ठहराया, जिसमें आश्रित कोटे के तहत पीडीएस (PDS) दुकान के आवंटन में विवाहित बेटियों को परिवार का हिस्सा मानने से इनकार कर दिया गया था। अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि यह नियम संविधान में निहित समानता के अधिकार का सीधा उल्लंघन करता है।
इस महत्वपूर्ण फैसले को लिखते हुए जस्टिस अराधे ने कहा कि किसी महिला की वैवाहिक स्थिति का उसके आश्रित होने या न होने से कोई तार्किक संबंध नहीं है। अनुकंपा के आधार पर नौकरी या राशन की दुकान देने का मुख्य उद्देश्य ही उस परिवार को अचानक आए आर्थिक संकट से उबारना होता है, जिसने अपना एकमात्र कमाने वाला सदस्य खो दिया हो।
पीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि विवाह होने से एक बेटी और उसके माता-पिता के बीच का स्वाभाविक रिश्ता कभी खत्म नहीं होता। इसके अलावा, केवल शादी हो जाने के आधार पर यह मान लेना बिल्कुल गलत है कि बेटी अब अपने मायके पर आश्रित नहीं है। यूपी सरकार के नियम में अविवाहित, कानूनी रूप से अलग हो चुकीं और विधवा बेटियों को तो आश्रित की श्रेणी में रखा गया था, जिसे अब अदालत ने विवाहित बेटियों तक बढ़ा दिया है।
अदालत ने आज के समाज की जमीनी सच्चाई का जिक्र करते हुए कहा कि वर्तमान में भी कई विवाहित बेटियां अपने माता-पिता के साथ रहती हैं, उनकी देखभाल करती हैं या वित्तीय रूप से उन पर निर्भर रहती हैं। जजों ने व्यवस्था पर तीखा सवाल उठाया कि जब विवाहित बेटों को परिवार की परिभाषा से बाहर नहीं किया जाता, तो फिर विवाहित बेटियों के साथ ऐसा भेदभाव क्यों किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने समाज में मौजूद इस लैंगिक रूढ़िवादी सोच पर भी कड़ी चोट की कि शादी के बाद बेटी किसी दूसरे परिवार का हिस्सा बन जाती है और मायके से उसके सारे रिश्ते टूट जाते हैं।
अदालत ने कहा कि यह पुरानी धारणा उस लैंगिक असमानता को बढ़ावा देती है, जिसे हमारा संविधान जड़ से खत्म करना चाहता है। एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) रुक्मिणी बोबडे की दलीलों को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने साफ किया कि शादी के बाद बेटी को मायके से अलग मान लेना संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य है।
जजों ने इस बात पर जोर दिया कि कोई व्यक्ति अपने परिवार पर आश्रित है या नहीं, यह पूरी तरह से एक तथ्यात्मक स्थिति है। इसे केवल वैवाहिक स्थिति के चश्मे से तय नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा भी हो सकता है कि 'परिवार' की परिभाषा में शामिल होने के बावजूद कोई बेटा असल में आश्रित न हो। इसलिए महज़ काल्पनिक मान्यताओं के आधार पर सभी विवाहित बेटियों को उनके अधिकारों से वंचित करना किसी भी रूप में न्यायसंगत नहीं है।
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