MP: पन्ना में वन विभाग के खिलाफ आदिवासी किसानों का प्रदर्शन, पुरखों की जमीन से बेदखली का आरोप

बछौन गांव के ग्रामीण कलेक्ट्रेट पहुंचे, सलेहा वन परिक्षेत्र के अमले पर प्रताड़ना और जबरन पौधारोपण कराने का आरोप; राजस्व-वन विभाग की संयुक्त जांच की मांग
MP: पन्ना में वन विभाग के खिलाफ आदिवासी किसानों का प्रदर्शन, पुरखों की जमीन से बेदखली का आरोप
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भोपाल। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले की पवई विधानसभा क्षेत्र के ग्राम बछौन के ग्रामीण मंगलवार को कलेक्ट्रेट पहुंचे और वन विभाग के खिलाफ प्रदर्शन किया। ग्रामीणों ने कलेक्टर के नाम नायब तहसीलदार (बृजपुर) राजेश सोनी को ज्ञापन सौंपकर सलेहा वन परिक्षेत्र के अमले पर गंभीर आरोप लगाए। ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग के कर्मचारी उन्हें लंबे समय से परेशान कर रहे हैं और पीढ़ियों से जिस जमीन पर उनके परिवार खेती करते आ रहे हैं, वहां से उन्हें हटाने का प्रयास किया जा रहा है।

ग्रामीणों के मुताबिक, ग्राम बछौन की आराजी नंबर 48, जिसका क्षेत्रफल करीब 31.74 एकड़ है, सहित आसपास की जमीन पर कई पीढ़ियों से किसान खेती करते आ रहे हैं। इन जमीनों पर खेती करना ही कई परिवारों की आजीविका का मुख्य साधन है। ग्रामीणों का आरोप है कि अब वन विभाग इस जमीन को अपने अधिकार क्षेत्र का हिस्सा बताते हुए किसानों को खेती करने से रोक रहा है।

किसानों का आरोप- खेत में पहुंचते ही डराया-धमकाया जाता है

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि जब किसान अपनी जमीन पर जुताई और बोवनी के लिए पहुंचते हैं तो वन विभाग का अमला उन्हें डराता-धमकाता है। किसानों के मुताबिक, उनके खेती के उपकरणों के साथ भी छेड़छाड़ की गई।

ग्रामीणों का कहना है कि हल-बखर काट दिए जाते हैं और कृषि कार्य में इस्तेमाल होने वाले औजार छीन लिए जाते हैं। इससे किसान अपने खेतों की जुताई तक नहीं कर पा रहे हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि इस तरह की कार्रवाई पर तत्काल रोक लगाई जाए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए।

पट्टे होने के बावजूद वन विभाग जता रहा जमीन पर अधिकार

पीड़ित किसान महीपाल सिंह ने कहा कि किसानों के पास जमीन से जुड़े पट्टे और दस्तावेज मौजूद हैं। इसके बावजूद वन विभाग द्वारा अचानक इन जमीनों पर अपना अधिकार जताया जा रहा है।

महीपाल सिंह के अनुसार, वन विभाग की ओर से जमीन पर जबरन पौधारोपण भी कराया जा रहा है। किसानों का कहना है कि जिन खेतों में उनकी फसल खड़ी है, वहां इस तरह की गतिविधियों से फसल को नुकसान पहुंच रहा है।

ग्रामीणों ने कहा कि अधिकांश परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं और खेती पर ही निर्भर हैं। यदि उनकी फसल नष्ट होती है या उन्हें जमीन से हटा दिया जाता है तो परिवारों के सामने रोजगार और खाद्य सुरक्षा का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।

आदिवासी और पिछड़े वर्ग के किसानों ने जताई नाराजगी

प्रदर्शन में शामिल ग्रामीणों का कहना है कि वे लंबे समय से इन जमीनों पर खेती कर रहे हैं। उनका आरोप है कि वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्रवाई के कारण गांव में तनाव की स्थिति बन रही है।

ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की कि जमीन से संबंधित पुराने राजस्व रिकॉर्ड, पट्टे, कब्जे और वन विभाग के रिकॉर्ड की जांच की जाए। उनका कहना है कि दस्तावेजों के आधार पर यह स्पष्ट किया जाए कि संबंधित जमीन का वास्तविक राजस्व एवं वन रिकॉर्ड क्या है और वर्षों से खेती कर रहे किसानों के अधिकार क्या हैं।

किसानों के समर्थन में सपा

मामले में समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष जयराम यादव ने भी किसानों का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि बछौन के आदिवासी और पिछड़े वर्ग के किसान पीढ़ियों से इन जमीनों पर खेती करते आ रहे हैं।

जयराम यादव ने आरोप लगाया कि किसानों का कहना है कि उनके पास पट्टे होने के बावजूद सलेहा रेंज के अधिकारी उन्हें परेशान कर रहे हैं। उन्होंने प्रशासन से किसानों की शिकायत को गंभीरता से लेते हुए मामले की जांच कराने और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।

किसानों ने प्रशासन के सामने रखीं ये मांगें

सलेहा वन परिक्षेत्र के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा किसानों के साथ की जा रही कथित मनमानी और प्रताड़ना पर तत्काल रोक लगाई जाए।

राजस्व और वन विभाग की संयुक्त टीम गठित कर मौके पर स्थल निरीक्षण कराया जाए।

जमीन से संबंधित राजस्व रिकॉर्ड, वन रिकॉर्ड और किसानों के पट्टों की जांच की जाए।

वर्षों से जमीन पर काबिज पात्र किसानों को नियमानुसार कानूनी पट्टा आवंटित किया जाए।

किसानों के खेती के औजारों और फसलों को नुकसान पहुंचाने की शिकायतों की जांच कर उचित कार्रवाई की जाए।

जब तक जमीन के स्वामित्व और अधिकारों की स्थिति स्पष्ट न हो, तब तक किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करने की कार्रवाई नहीं की जाए।

जांच के बाद स्पष्ट होगी जमीन की वास्तविक स्थिति

ग्रामीणों की शिकायत अब प्रशासन के सामने पहुंच चुकी है। मामले में राजस्व और वन विभाग के रिकॉर्ड की जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि संबंधित जमीन का कानूनी दर्जा क्या है और किसानों के दावों की स्थिति क्या है।

फिलहाल ग्रामीणों ने प्रशासन से दस्तावेजों के आधार पर निष्पक्ष जांच और अपनी आजीविका बचाने की मांग की है। किसानों का कहना है कि वे किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहते, लेकिन पीढ़ियों से जिस जमीन पर खेती कर परिवार का भरण-पोषण करते आए हैं, उससे उन्हें बेदखल नहीं किया जाना चाहिए।

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