
महाराष्ट्र: गड़चिरोली के गोंडवाना विश्वविद्यालय में एक खूंखार पूर्व माओवादी नेता भूपति को समन्वयक (को-ऑर्डिनेटर) बनाए जाने पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। स्थानीय आदिवासी समूहों ने इस फैसले का कड़ा विरोध करते हुए इसे उनके अधिकारों का हनन बताया है। यह नियुक्ति पेसा (PESA) कानून और वन अधिकार अधिनियम के बारे में आदिवासियों के बीच जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से की गई है।
महाग्रामसभा के नेता बाजीराव उसेंडी ने इस कदम पर तीखे सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा कि जो स्थानीय आदिवासी सालों से पेसा के लिए जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं, उन्हें दरकिनार कर महाराष्ट्र के बाहर के एक सवर्ण व्यक्ति को यह जिम्मेदारी क्यों दी गई। उसेंडी का आरोप है कि इसी व्यक्ति ने अपने नक्सल जीवन के दौरान आदिवासियों का शोषण किया और उन्हें मौत के मुंह में धकेला। ऐसे में उस पर आदिवासी सशक्तिकरण और पेसा की जानकारी देने का भरोसा कैसे किया जा सकता है।
स्थानीय लोगों की मांग है कि सरकार तुरंत इस नियुक्ति को रद्द करे और योग्य तथा सच्चे आदिवासी युवाओं को यह मौका दे। उसेंडी ने उस दर्द को भी बयां किया जहां नक्सली डर के साए में जबरन खाना मांगते थे और आज भी कई बेकसूर आदिवासी इसी मजबूरी के कारण जेलों में बंद हैं। उन्होंने प्रशासन से सवाल किया कि उन निर्दोष आदिवासियों के पुनर्वास के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाया गया।
महाग्रामसभा गड़चिरोली में स्थानीय ग्राम सभाओं को सलाह देने वाला एक बेहद महत्वपूर्ण निकाय है। इसमें एटापल्ली, कुरखेड़ा और कुर्की जैसे घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के ग्राम सभा सदस्य शामिल हैं। इस संस्था ने चार पन्नों का एक कड़ा पत्र जारी कर विश्वविद्यालय के फैसले पर कड़ी आपत्ति दर्ज की है। साथ ही, गोंडवाना विश्वविद्यालय, जिलाधिकारी और गड़चिरोली के पुलिस अधीक्षक को एक ज्ञापन सौंपकर इस नियुक्ति को तत्काल रद्द करने की मांग की गई है।
पेसा (पंचायत अनुसूचित क्षेत्र विस्तार अधिनियम, 1996) केंद्र सरकार द्वारा लागू एक ऐतिहासिक कानून है, जो पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों को स्वशासन का अधिकार सुनिश्चित करता है। वहीं, भूपति एक खूंखार पूर्व नक्सली है जिसके पिछले साल आत्मसमर्पण करने से महाराष्ट्र में माओवाद की कमर टूट गई थी। वह फिलहाल गड़चिरोली में पुलिस की कड़ी निगरानी में है।
विवाद बढ़ता देख विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपनी सफाई पेश की है। गोंडवाना विश्वविद्यालय के कुलपति प्रशांत बोकारे ने बताया कि यह केवल तीन महीने की अस्थायी नियुक्ति है। उन्होंने दावा किया कि वेणुगोपाल (भूपति) को सिर्फ क्लर्क का काम सौंपा गया है और वह ग्रामसभा का मार्गदर्शन या किसी तरह का प्रशिक्षण नहीं देंगे।
हालांकि, 29 अगस्त को विश्वविद्यालय द्वारा जारी की गई नियुक्ति अधिसूचना कुछ और ही कहानी बयां करती है। इस अधिसूचना में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि प्रोजेक्ट समन्वयक की यह नियुक्ति 'एकीकृत ग्राम सभा प्रशिक्षण कार्यक्रम' के लिए की गई है।
आदिवासी नेताओं का स्पष्ट कहना है कि यह फैसला पूरी तरह से उनके हितों के खिलाफ है। उनका कहना है कि अतीत में इन्हीं नक्सलियों ने जंगलों में छिपकर स्थानीय आदिवासियों को धमकाया और उनकी युवतियों का अपहरण किया। जिन आदिवासी सरपंचों या स्थानीय कार्यकर्ताओं ने नक्सलियों के विचारों से असहमति जताई, उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई। आदिवासियों ने नक्सली हमलों में अपनों को खोया है और बंदूकों के खौफ से पनाह देने वाले आम ग्रामीण आज भी सलाखों के पीछे अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहे हैं।
इस पूरे मामले पर कई बड़े अधिकारियों की चुप्पी भी सवाल खड़े कर रही है। गड़चिरोली के पुलिस अधीक्षक एम. रमेश ने कई बार संपर्क करने के बावजूद फोन नहीं उठाया। वहीं, गड़चिरोली के जिलाधिकारी अविष्यंत पांडा ने पुष्टि की है कि महाग्रामसभा के एक प्रतिनिधिमंडल ने उनसे मुलाकात कर अपना ज्ञापन सौंपा है।
दूसरी ओर, गोंडवाना विश्वविद्यालय के कुलपति प्रशांत बोकारे परिवार में हुए एक निधन के कारण छुट्टी पर हैं, जिसके चलते उन्होंने मीडिया से इस विषय पर अधिक बात करने में असमर्थता जताई है।
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