MP जनजातीय संग्रहालय में गोण्ड चित्रकार ‘शलाका’ प्रदर्शनी शुरू, जंगल-पहाड़ों की जीवन्त अभिव्यक्ति से रूबरू हो रहे दर्शक

कुम्हार सिंह धुर्वे प्रयागराज और दिल्ली सहित अन्य शहरों में आयोजित कुछ एकल चित्रकला प्रदर्शनियों में भी भाग ले चुके हैं।
MP जनजातीय संग्रहालय में गोण्ड चित्रकार ‘शलाका’ प्रदर्शनी शुरू, जंगल-पहाड़ों की जीवन्त अभिव्यक्ति से रूबरू हो रहे दर्शक
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भोपाल। प्रदेश के जनजातीय कलाकारों को सशक्त मंच उपलब्ध कराने की दिशा में मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय द्वारा किया जा रहा मासिक प्रयास ‘शलाका’ एक बार फिर अपनी विशिष्ट पहचान के साथ सामने आया है। इसी कड़ी में 03 फरवरी, 2026 से संग्रहालय की ‘लिखन्दरा प्रदर्शनी दीर्घा’ में गोण्ड जनजातीय चित्रकार कुम्हार सिंह धुर्वे की चित्र प्रदर्शनी सह-विक्रय का आयोजन प्रारंभ किया गया है। यह 70वीं ‘शलाका’ प्रदर्शनी 28 फरवरी तक नियमित रूप से दर्शकों के लिए खुली रहेगी। इस प्रदर्शनी का उद्देश्य न केवल जनजातीय कला को दृश्यता देना है, बल्कि कलाकारों को उनकी रचनाओं के माध्यम से आत्मनिर्भरता की ओर भी बढ़ाना है।

कुम्हार सिंह धुर्वे का जन्म डिण्डोरी जिले के पाटनगढ़ क्षेत्र में हुआ, जहाँ जंगल-पहाड़ों के बीच उनका बचपन बीता। प्रकृति के सान्निध्य में पले-बढ़े धुर्वे आज भी उसी परिवेश में निवास करते हैं, जो उनकी चित्रकला की आत्मा में स्पष्ट झलकता है। लगभग 50 वर्षीय धुर्वे मूलतः खेती-किसानी से जुड़े रहे हैं, परंतु जीवन की कठिन परिस्थितियों और पारिवारिक संघर्षों के बीच उनकी कला ने एक अलग पहचान बनाई।

उनके पिता स्वर्गीय प्रहलाद सिंह धुर्वे और माता स्वर्गीय बेयन बाई ने पारंपरिक जीवन-मूल्यों के साथ उन्हें संस्कारित किया। पत्नी के देहावसान के बाद परिवार की जिम्मेदारियों के बीच भी उन्होंने अपने बच्चों के भविष्य और कला-यात्रा को प्राथमिकता दी।

धुर्वे की चित्रकला यात्रा परंपरागत अर्थों में विशिष्ट है। स्वयं औपचारिक शिक्षा से वंचित रहने के बावजूद उन्होंने अपनी तीनों संतानों दो पुत्र और एक पुत्री को न केवल शिक्षा दिलाई, बल्कि उनके कला-कर्म को भी प्रोत्साहित किया।

धुर्वे ने गोण्ड चित्रकला अपने ही बच्चों के सान्निध्य में सीखी। आरंभ में वे बच्चों के चित्रकर्म में सहयोगी के रूप में जुड़े, रंग भरने और आकृतियाँ गढ़ने में हाथ बंटाया, और धीरे-धीरे स्वतंत्र रूप से चित्र बनाने लगे। यही सहयात्रा आगे चलकर उनकी पहचान बनी, जिसमें पारिवारिक सहभागिता और सामूहिक सृजन की भावना प्रमुख है।

उनके चित्रों में गोण्ड परंपरा की विशिष्ट रेखाएं, बारीक बिंदु-आकृतियाँ और जीवंत रंग संयोजन देखने को मिलते हैं। पशु-पक्षी, जंगल, पहाड़, वृक्ष और प्राकृतिक लय उनके कैनवास पर जीवन्त होकर उभरते हैं। ये चित्र केवल दृश्य सौंदर्य नहीं रचते, बल्कि जंगल के साथ जनजातीय समुदाय के सहअस्तित्व, संघर्ष और सामंजस्य की कथा भी कहते हैं। धुर्वे के अनुसार, प्रकृति उनके लिए विषय नहीं, बल्कि जीवन का विस्तार है।

कुम्हार सिंह धुर्वे प्रयागराज और दिल्ली सहित अन्य शहरों में आयोजित कुछ एकल चित्रकला प्रदर्शनियों में भी भाग ले चुके हैं। इन मंचों ने उन्हें व्यापक दर्शक-समूह से जोड़ा और गोण्ड कला के प्रति रुचि को और मजबूत किया। अपनी उपलब्धियों का श्रेय वे विनम्रता से अपनी संतानों को देते हैं, जिनके साथ सीखते-सिखाते हुए उनकी कला परिपक्व हुई।

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