
भोपाल। “मैं भील जनजातीय चित्रकला से जुड़ी हूं और बचपन से ही चित्र बनाती आ रही हूं। यह कला मैंने अपने पिता और दादी से सीखी है। मेरे चित्रों में जंगल, पशु-पक्षी और हमारा जनजातीय जीवन दिखाई देता है। ‘शलाका’ प्रदर्शनी के जरिए मुझे अपनी कला लोगों तक पहुंचाने का मौका मिल रहा है।” द मूकनायक से बातचीत में भील जनजातीय चित्रकार मनीषा बारिया ने यह कहा
राजधानी भोपाल में स्थित मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय द्वारा प्रदेश के जनजातीय कलाकारों को पहचान, सम्मान और बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में लगातार सार्थक पहल की जा रही है। इसी कड़ी में संग्रहालय की लिखन्दरा प्रदर्शनी दीर्घा में प्रतिमाह आयोजित होने वाली ‘शलाका’ श्रृंखला के अंतर्गत 69वीं शलाका चित्र प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है। इस बार यह मंच भील जनजातीय चित्रकार मनीषा बारिया को समर्पित है। मनीषा बारिया के चित्रों की यह प्रदर्शनी सह-विक्रय 03 जनवरी 2026 से प्रारंभ होकर 30 जनवरी 2026 तक (मंगलवार से रविवार) निरंतर चलेगी।
‘शलाका’ श्रृंखला का उद्देश्य केवल प्रदर्शनी तक सीमित नहीं है, बल्कि जनजातीय चित्रकारों को उनकी कला के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाना भी है। प्रदर्शनी के दौरान दर्शक न केवल चित्रों को नजदीक से देख सकेंगे, बल्कि उन्हें सीधे कलाकार से खरीद भी सकेंगे। इससे कलाकार और कला-प्रेमियों के बीच सीधा संवाद स्थापित होता है और पारंपरिक जनजातीय कलाएं नए दर्शक वर्ग तक पहुंचती हैं।
युवा भीली चित्रकार मनीषा बारिया का जन्म भोपाल में हुआ, हालांकि उनका पारिवारिक संबंध जनजातीय बहुल झाबुआ जिले के ग्राम पिटोल से है। कला उनके लिए कोई नई राह नहीं, बल्कि विरासत है। उनके पिता रमेश बारिया और माँ कस्सु बारिया स्वयं भीली चित्रकार हैं। इसके अलावा प्रख्यात भीली चित्रकार और पद्मश्री सम्मानित भूरीबाई रिश्ते में उनकी दादी लगती हैं। भीली चित्रकला के क्षेत्र में भूरीबाई की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान मनीषा के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रही है।
चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी मनीषा का झुकाव बचपन से ही चित्रकला की ओर रहा। घर का माहौल, पिता और दादी का सान्निध्य तथा सतत मार्गदर्शन उनके लिए कला की पहली पाठशाला रहा। उन्होंने स्नातक स्तर पर ललित कला की औपचारिक शिक्षा प्राप्त की और परंपरागत भीली चित्रकला को अकादमिक समझ के साथ आगे बढ़ाया। अपने प्रारंभिक दिनों में मनीषा ने पिता और दादी के चित्रकर्म में सहयोग करते हुए रंगों, रेखाओं और विषय-वस्तु की बारीकियों को गहराई से सीखा।
द मूकनायक से बातचीत में भील जनजातीय चित्रकार मनीषा बारिया ने बताया कि वह बचपन से ही चित्रकला से जुड़ी हुई हैं और यह कला उन्हें अपने परिवार से विरासत में मिली है। उनके पिता रमेश बारिया और दादी भूरीबाई से उन्हें लगातार सीखने और आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली। उन्होंने कहा कि घर का माहौल ही उनकी पहली पाठशाला रहा, जहां रंग, रेखा और आकृतियों के जरिए उन्होंने अपनी भावनाओं को व्यक्त करना सीखा।
मनीषा ने आगे कहा कि उनके चित्रों में जंगल, पशु-पक्षी और जनजातीय जीवन की रोज़मर्रा की झलक देखने को मिलती है। वह मानती हैं कि प्रकृति से उनका गहरा रिश्ता ही उनकी कला की पहचान है। ‘शलाका’ प्रदर्शनी को लेकर उन्होंने कहा कि यह मंच जनजातीय कलाकारों के लिए बहुत अहम है, क्योंकि इससे उनकी कला सीधे लोगों तक पहुंचती है और उन्हें आगे काम करने का हौसला मिलता है।
मनीषा बारिया अब व्यावसायिक रूप से चित्रकर्म में संलग्न हैं। उन्होंने नई दिल्ली, बेंगलुरु, खजुराहो जैसे शहरों में आयोजित संयुक्त चित्रकला प्रदर्शनियों में भाग लेकर अपनी कला को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाया है। उनके चित्रों में भील जनजाति की जीवनशैली, जंगल, पशु-पक्षी और प्रकृति के साथ मानव के सह-अस्तित्व की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। पारंपरिक भीली शैली में बने उनके चित्रों में रंगों की जीवंतता और कथात्मकता दर्शकों को आकर्षित करती है।
प्रदर्शनी में प्रदर्शित चित्रों में जंगली पशु-पक्षी, वन्य जीवन, पेड़-पौधे और प्राकृतिक परिवेश विशेष रूप से दृष्टव्य हैं। ये चित्र न केवल सौंदर्य का अनुभव कराते हैं, बल्कि जनजातीय समाज के प्रकृति-केन्द्रित जीवन दर्शन को भी सामने रखते हैं। मनीषा की कला में परंपरा और आधुनिक दृष्टि का संतुलन दिखाई देता है, जो उन्हें समकालीन जनजातीय कलाकारों में अलग पहचान देता है।
मनीषा बारिया अपनी सफलता का संपूर्ण श्रेय अपने पिता रमेश बारिया को देती हैं। उनका कहना है कि पिता की निरंतर प्रेरणा, मार्गदर्शन और विश्वास ने ही उनकी कला को सशक्त बनाया। ‘शलाका’ प्रदर्शनी को लेकर मनीषा को उम्मीद है कि यह मंच न केवल उनकी कला को नए दर्शक देगा, बल्कि जनजातीय चित्रकला के प्रति लोगों की समझ और सम्मान को भी बढ़ाएगा।
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