2027 Census में DNT समुदायों की अलग गणना की मांग: करोड़ों लोग क्यों अदृश्य? सुप्रीम कोर्ट में PIL

अलग गणना से डीएनटी समुदायों की वास्तविक आबादी और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति का सटीक आकलन संभव होगा, जिससे लक्षित कल्याणकारी नीतियां बनाई जा सकेंगी।
डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियां वे समुदाय हैं जिन्हें ब्रिटिश काल के 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तहत 'वंशानुगत अपराधी' घोषित कर दिया गया था। हालांकि यह कानून 1952 में समाप्त हो गया, लेकिन इन समुदायों पर लगा कलंक और संरचनात्मक भेदभाव आज भी कायम है।
डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियां वे समुदाय हैं जिन्हें ब्रिटिश काल के 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तहत 'वंशानुगत अपराधी' घोषित कर दिया गया था। हालांकि यह कानून 1952 में समाप्त हो गया, लेकिन इन समुदायों पर लगा कलंक और संरचनात्मक भेदभाव आज भी कायम है।
Published on

उदयपुर- आगामी 2026-27 की जनगणना में डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों (डीएनटी) को अलग से गिनने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई है कि जनगणना के प्रश्नावली में डीएनटी समुदायों के लिए अलग कॉलम या श्रेणी शामिल की जाए। यह मांग उन करोड़ों लोगों की पहचान और अधिकारों से जुड़ी है जो दशकों से सरकारी आंकड़ों में अदृश्य बने हुए हैं।

ओलखाण ट्रस्ट के निदेशक एवं डीएनटी राइट्स एक्शन ग्रुप से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता पारस बंजारा ने द मूकनायक को बताया कि डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियां वे समुदाय हैं जिन्हें ब्रिटिश काल के 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तहत 'वंशानुगत अपराधी' घोषित कर दिया गया था। हालांकि यह कानून 1952 में समाप्त हो गया, लेकिन इन समुदायों पर लगा कलंक और संरचनात्मक भेदभाव आज भी कायम है। अनुमान के अनुसार भारत में 10 से 12 करोड़ लोग इन समुदायों से संबंधित हैं, फिर भी स्वतंत्रता के बाद किसी भी जनगणना में इनकी अलग से गणना नहीं हुई। आखिरी बार ऐसी गणना 1931 में हुई थी।

डीएनटी समुदायों की अलग गणना न होने से कई गंभीर समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इनकी आबादी का विश्वसनीय डेटा उपलब्ध नहीं होने से सरकारी योजनाएं और नीतियां इन तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पातीं। कई डीएनटी समुदाय अलग-अलग राज्यों में अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) या किसी भी श्रेणी के बिना असंगत रूप से वर्गीकृत हैं। इससे एसईईडी योजना जैसी कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में पहचान और प्रमाणन की कमी के कारण बड़ी बाधाएं आती हैं।

अलग गणना से सरकार को कई लाभ होंगे। इससे डीएनटी समुदायों की वास्तविक आबादी और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति का सटीक आकलन संभव होगा, जिससे लक्षित कल्याणकारी नीतियां बनाई जा सकेंगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और आजीविका जैसी योजनाओं तक इनकी न्यायसंगत पहुंच सुनिश्चित होगी। साथ ही, संवैधानिक अधिकारों जैसे समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय को मजबूती मिलेगी।

विभिन्न सरकारी समितियों और आयोगों ने भी बार-बार डीएनटी की अलग गणना की सिफारिश की है। इनमें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (2000), डीएनटी पर तकनीकी सलाहकार समूह (2006), रेणके आयोग (2008) और इदाते आयोग (2017) शामिल हैं। इन सिफारिशों के बावजूद अब तक जनगणना में डीएनटी के लिए अलग श्रेणी शामिल नहीं की गई है।

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि वह केंद्र सरकार को निर्देश दे कि जनगणना फॉर्म में डीएनटी के लिए अलग श्रेणी या कॉलम जोड़ा जाए, 2026-27 की जनगणना में इन समुदायों की सही गिनती सुनिश्चित की जाए और एकत्रित डेटा का उपयोग नीति निर्माण तथा लक्षित कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए किया जाए।

इस पीआईएल को दक्षिणकुमार बजरंगी (फिल्म निर्माता, रंगकर्मी और डीएनटी अधिकार कार्यकर्ता), रोहिणी छारी (बेडिया समुदाय के साथ काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता) और परश राम गरासिया (डीएनटी समुदायों के साथ जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता) ने दायर किया है।

यह मुद्दा केवल सांख्यिकीय नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे करोड़ों नागरिकों की पहचान, गरिमा और न्याय का सवाल है। पारस बंजारा ने कहा, “यदि आगामी जनगणना में डीएनटी समुदायों की अलग गणना नहीं हुई, तो ये लोग आगे भी अदृश्य और न्याय से वंचित रहेंगे। जनगणना के जरिए सही पहचान मिलना भारत के करोड़ों डीएनटी लोगों के लिए गरिमा, अधिकार और समान विकास की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम होगा।” यह याचिका सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा प्रयास मानी जा रही है।

डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियां वे समुदाय हैं जिन्हें ब्रिटिश काल के 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तहत 'वंशानुगत अपराधी' घोषित कर दिया गया था। हालांकि यह कानून 1952 में समाप्त हो गया, लेकिन इन समुदायों पर लगा कलंक और संरचनात्मक भेदभाव आज भी कायम है।
Transgender Persons Amendment Bill, 2026 से क्यों नाराज़ है ट्रांस-क्वियर कम्युनिटी?
डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियां वे समुदाय हैं जिन्हें ब्रिटिश काल के 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तहत 'वंशानुगत अपराधी' घोषित कर दिया गया था। हालांकि यह कानून 1952 में समाप्त हो गया, लेकिन इन समुदायों पर लगा कलंक और संरचनात्मक भेदभाव आज भी कायम है।
तेलंगाना के आदिलाबाद में 10 गांवों के आदिवासियों ने पेश की मिसाल, दहेज प्रथा और खर्चीली शादियों पर लगाई पूर्ण रोक
डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियां वे समुदाय हैं जिन्हें ब्रिटिश काल के 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तहत 'वंशानुगत अपराधी' घोषित कर दिया गया था। हालांकि यह कानून 1952 में समाप्त हो गया, लेकिन इन समुदायों पर लगा कलंक और संरचनात्मक भेदभाव आज भी कायम है।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट: आदिवासी हिंदू रीति से विवाह करें तो हिंदू मैरिज एक्ट होगा लागू, आपसी सहमति से तलाक का अधिकार

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

The Mooknayak - आवाज़ आपकी
www.themooknayak.com