एमपी के बालाघाट में 22 बैगा बच्चों की मौत: स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल, कैंडल मार्च निकालकर जताया विरोध

स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे से लेकर जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई और पीड़ित परिवारों को 20-20 लाख रुपए मुआवजे की मांग
एमपी के बालाघाट में 22 बैगा बच्चों की मौत: स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल, कैंडल मार्च निकालकर जताया विरोध
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भोपाल। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के बैगा अंचल में 22 बच्चों की मौत ने स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शुरुआत में इन मौतों के पीछे कुपोषण को प्रमुख वजह माना गया था, लेकिन आईसीएमआर और अन्य प्रमुख स्वास्थ्य संस्थानों की जांच रिपोर्ट में बच्चों की मौत के पीछे मलेरिया और मीजल्स यानी खसरा संक्रमण को प्रमुख कारण बताया गया है। हालांकि, जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद भी मामला केवल बीमारी की पहचान तक सीमित नहीं रह गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर दूरदराज के बैगा गांवों में संक्रमण समय रहते क्यों नहीं पकड़ा गया, बच्चों तक टीकाकरण और इलाज की पहुंच क्यों नहीं बन सकी और स्वास्थ्य तंत्र की निगरानी में ऐसी कौन सी चूक हुई, जिसने इतने मासूम बच्चों की जान ले ली।

बड़ी संख्या में समाज के लोगों ने नगर में कैंडल मार्च निकालकर मृत बच्चों को श्रद्धांजलि दी और स्वास्थ्य सेवाओं में कथित लापरवाही के खिलाफ विरोध दर्ज कराया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह केवल बीमारी से हुई मौतों का मामला नहीं है, बल्कि दूरदराज के आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं, पोषण, टीकाकरण और प्रशासनिक निगरानी की विफलताओं से जुड़ा गंभीर सवाल है। आदिवासी संगठनों ने स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे, जिम्मेदार अधिकारियों के निलंबन और मृत बच्चों के परिवारों को 20-20 लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने की मांग की है।

जयस्तंभ चौक से आंबेडकर चौक तक निकाला गया कैंडल मार्च

बैगा बच्चों की मौत के विरोध में आयोजित कैंडल मार्च नगर के जयस्तंभ चौक से शुरू हुआ। इसके बाद प्रदर्शनकारी मोमबत्तियां हाथों में लेकर काली पुतली चौक से होते हुए आंबेडकर चौक पहुंचे। इस दौरान आदिवासी समाज के लोगों ने बच्चों की मौत पर दुख और आक्रोश व्यक्त किया। आंबेडकर चौक पर पहुंचकर लोगों ने मोमबत्तियां जलाईं और मृत बैगा बच्चों को श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रदर्शन के दौरान लोगों ने सरकार और प्रशासन से मामले की जवाबदेही तय करने तथा प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल स्वास्थ्य सुविधाएं मजबूत करने की मांग उठाई।

प्रदर्शनकारियों का कहना था कि विशेष रूप से संरक्षित बैगा जनजाति के बच्चों की इतनी बड़ी संख्या में मौत को सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका आरोप है कि लंबे समय से क्षेत्र में स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति कमजोर रही है, लेकिन समय रहते गंभीरता से हस्तक्षेप नहीं किया गया। समाज के लोगों ने सवाल उठाया कि जिन गांवों में पहले से बच्चों के बीमार होने और त्वचा संबंधी लक्षण सामने आने की जानकारी थी, वहां लगातार निगरानी और स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था क्यों नहीं की गई।

प्रशासन 8 मौतें मान रहा, आदिवासी समाज ने 22 बच्चों की मौत का दावा किया

आदिवासी विकास परिषद के जिलाध्यक्ष दिनेश धुर्वे ने आरोप लगाया कि प्रशासन बच्चों की मौत के पूरे आंकड़े को स्वीकार नहीं कर रहा है। उनका कहना है कि आदिवासी समाज की जानकारी के अनुसार पिछले करीब ढाई महीने में 22 बैगा बच्चों की मौत हुई है, जबकि प्रशासन की ओर से केवल 8 मौतों को स्वीकार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि प्रभावित क्षेत्रों में कुपोषण और बीमारी की समस्या लंबे समय से मौजूद है और इसके बावजूद जमीनी स्तर पर पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं कराई गईं।

दिनेश धुर्वे ने मामले में स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग की। साथ ही उन्होंने कहा कि जिन अधिकारियों की जिम्मेदारी क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं, टीकाकरण और बच्चों की निगरानी की थी, उनकी भूमिका की जांच कर कार्रवाई की जानी चाहिए। परिषद ने मृत बच्चों के परिवारों को 20-20 लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने की भी मांग की है। उनका कहना है कि केवल जांच के आदेश या स्वास्थ्य शिविर आयोजित कर देने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि यह तय करना होगा कि बीमारी की जानकारी समय रहते प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग तक क्यों नहीं पहुंची और बच्चों को उपचार मिलने में देरी क्यों हुई।

ठोस कदम नहीं उठाए तो उग्र आंदोलन की चेतावनी

आदिवासी विकास परिषद के अध्यक्ष शुभम उईके ने सरकार पर बैगा समुदाय की समस्याओं की अनदेखी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि प्रभावित गांवों में केवल अस्थायी कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। सरकार को बैगा समुदाय के स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षित इलाज और बच्चों के टीकाकरण के लिए स्थायी व्यवस्था करनी होगी। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द ठोस कदम नहीं उठाए तो आदिवासी समाज आने वाले दिनों में उग्र आंदोलन करने के लिए मजबूर होगा।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि बैगा समुदाय मध्य प्रदेश की विशेष रूप से कमजोर जनजातियों में शामिल है और इनके निवास क्षेत्र अक्सर भौगोलिक रूप से दूरदराज और सुविधाओं से वंचित हैं। ऐसे में सामान्य ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में यहां स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और निगरानी की अधिक मजबूत व्यवस्था की जरूरत है। समाज के लोगों का आरोप है कि प्रशासनिक स्तर पर योजनाएं तो मौजूद हैं, लेकिन प्रभावित गांवों तक उनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं पहुंच पा रहा है।

अस्पताल दूर, इसलिए झोलाछाप डॉक्टरों और पारंपरिक इलाज पर निर्भर रहे परिवार

बीमारी से सबसे अधिक प्रभावित अडोरी, मछुरदा और लालपुर ग्राम पंचायतों की भौगोलिक स्थिति स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच पर गंभीर सवाल खड़े करती है। इन गांवों से प्राथमिक उप स्वास्थ्य केंद्र की दूरी करीब 15 से 20 किलोमीटर बताई जा रही है, जबकि कम्युनिटी अस्पताल लगभग 35 से 40 किलोमीटर दूर है। दूरदराज के आदिवासी इलाकों में परिवहन की सीमित सुविधाओं और आर्थिक परिस्थितियों के कारण बीमार बच्चों को समय पर अस्पताल पहुंचाना कई परिवारों के लिए मुश्किल साबित हुआ।

इसी कारण कई परिवार स्थानीय झोलाछाप डॉक्टरों या पारंपरिक उपचार पद्धतियों पर निर्भर रहे। जब सरकारी स्वास्थ्य टीमें गांवों में पहुंचीं, तब भी कुछ परिवार तुरंत अस्पताल में इलाज कराने के लिए तैयार नहीं हुए। स्वास्थ्य कर्मियों को उन्हें समझाने में समय लगा। इस प्रक्रिया में गंभीर रूप से बीमार बच्चों के अस्पताल पहुंचने में देरी हुई। सवाल यह है कि यदि प्रभावित गांवों में पहले से ही स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच कमजोर थी, तो वहां बीमारी की आशंका सामने आने के बाद विशेष एंबुलेंस, मोबाइल मेडिकल यूनिट और लगातार निगरानी की व्यवस्था क्यों नहीं की गई।

मिजल्स-रूबेला की जानकारी समय पर क्यों नहीं मिली?

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद यानी आईसीएमआर की रिपोर्ट के अनुसार बच्चों की मौत का संबंध मिजल्स-रूबेला, यानी खसरा, से बताया गया है। बच्चों के शरीर और त्वचा पर बीमारी से जुड़े लक्षण भी सामने आने की बात कही गई है। इसके बावजूद यह सवाल गंभीर है कि गांवों में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और आशा कार्यकर्ताओं का नेटवर्क होने के बाद भी बीमारी के संभावित प्रकोप की जानकारी स्वास्थ्य विभाग को समय पर क्यों नहीं मिल सकी।

ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बच्चों में बुखार, दाने, कमजोरी या किसी बीमारी के असामान्य लक्षणों की जानकारी प्राथमिक स्तर पर इन्हीं के माध्यम से स्वास्थ्य विभाग तक पहुंच सकती है। यदि बड़ी संख्या में बच्चों में एक जैसे लक्षण दिखाई दे रहे थे, तो निगरानी तंत्र के स्तर पर अलर्ट क्यों नहीं बना, यह जांच का विषय है। समय पर बीमारी की पहचान हो जाती तो स्वास्थ्य विभाग प्रभावित गांवों में पहले ही विशेष टीमें भेज सकता था और गंभीर बच्चों को अस्पताल पहुंचाकर उपचार की व्यवस्था की जा सकती थी।

जनवरी में जानकारी मिलने के बाद भी लगातार निगरानी क्यों नहीं हुई?

जनवरी 2026 में मीडिया के माध्यम से तत्कालीन कलेक्टर मृणाल मीणा को प्रभावित क्षेत्र में बच्चों के बीच त्वचा संबंधी बीमारी फैलने की जानकारी मिली थी। इसके बाद जनवरी और फरवरी के दौरान स्वास्थ्य शिविर लगाए गए। लेकिन फरवरी के बाद इन शिविरों का क्रम बंद हो गया। अब बच्चों की मौत के मामले सामने आने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि शुरुआती सूचना के बाद बीमारी की निगरानी लगातार क्यों नहीं की गई।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों और प्रशासनिक व्यवस्था के लिहाज से किसी दूरदराज क्षेत्र में बच्चों के बीच असामान्य बीमारी के लक्षण सामने आने पर केवल कुछ दिनों के स्वास्थ्य शिविर पर्याप्त नहीं होते। बीमारी की स्थिति, बच्चों की स्वास्थ्य जांच और संदिग्ध मामलों की लगातार निगरानी जरूरी होती है। प्रदर्शनकारियों और आदिवासी संगठनों का सवाल है कि यदि जनवरी और फरवरी में मिले संकेतों को गंभीरता से लेकर लगातार सर्विलांस किया जाता, तो संभव है कि बीमारी के प्रकोप की पहचान पहले हो जाती और बच्चों को समय रहते उपचार तथा आवश्यक चिकित्सकीय सहायता मिल पाती।

वैक्सीनेशन के दावों और जमीनी स्थिति में अंतर का आरोप

मामले में जिला स्वास्थ्य विभाग और टीकाकरण व्यवस्था पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। सीएमएचओ परेश उपलव के अनुसार क्षेत्र में लगभग 80 प्रतिशत टीकाकरण हुआ है। हालांकि, जमीनी पड़ताल के दौरान दर्जनों ऐसे परिवार मिलने की बात सामने आई है, जिनके बच्चों को एक भी टीका नहीं लगाया गया था। ऐसे में सरकारी आंकड़ों और जमीनी स्थिति के बीच अंतर की जांच जरूरी हो जाती है।

विशेष रूप से संरक्षित जनजातीय क्षेत्रों में टीकाकरण की चुनौती सामान्य क्षेत्रों से अलग होती है। यहां गांवों की दूरी, परिवहन, स्वास्थ्य केंद्रों की कमी और सामाजिक जागरूकता जैसे कारक टीकाकरण अभियान को प्रभावित करते हैं। ऐसे में केवल प्रतिशत के आधार पर अभियान की सफलता तय करने के बजाय यह देखना जरूरी है कि कौन से गांव और परिवार टीकाकरण से छूट गए। यदि कई बच्चों को मिजल्स-रूबेला का टीका नहीं लगा था, तो सवाल उठता है कि स्वास्थ्य विभाग की माइक्रो-प्लानिंग और फील्ड मॉनिटरिंग में कमी कहां रही।

विशेष संरक्षित बैगा क्षेत्र में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर बड़ा सवाल

बालाघाट के बिरसा विकासखंड में हुई बच्चों की मौतों ने एक बार फिर विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को सामने ला दिया है। बैगा समुदाय के गांवों में अस्पतालों की दूरी, परिवहन की समस्या, कुपोषण, टीकाकरण में छूटे बच्चे और बीमारी की समय पर पहचान न होना जैसे मुद्दे आपस में जुड़े हुए दिखाई देते हैं। ऐसे में केवल किसी एक अधिकारी या विभाग की जिम्मेदारी तय करने से पहले पूरी व्यवस्था की समीक्षा जरूरी है।

आदिवासी समाज की मांग है कि प्रभावित गांवों में लंबे समय तक विशेष स्वास्थ्य शिविर चलाए जाएं, प्रत्येक बच्चे की स्वास्थ्य जांच हो, टीकाकरण से छूटे बच्चों की पहचान कर तत्काल टीका लगाया जाए और गंभीर बीमार बच्चों को अस्पताल पहुंचाने के लिए परिवहन की स्थायी व्यवस्था की जाए। साथ ही कुपोषण की स्थिति की भी अलग से जांच की जाए, ताकि बीमारी और कमजोर पोषण की संयुक्त चुनौती से बच्चों को बचाया जा सके।

फिलहाल, 22 बैगा बच्चों की मौत के दावे और प्रशासन द्वारा स्वीकार किए गए आंकड़ों के बीच अंतर भी जांच का महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है। कैंडल मार्च के जरिए आदिवासी समाज ने साफ संकेत दिया है कि वह इस मामले को केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रखना चाहता। अब उनकी मांग है कि मौतों की पूरी और निष्पक्ष जांच हो, जिम्मेदारी तय की जाए और दूरदराज के बैगा गांवों में ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था बनाई जाए, जिससे भविष्य में किसी बीमारी के फैलने पर बच्चों की जान तक स्थिति न पहुंचे।

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