
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि अनुसूचित जनजाति (ST) का कोई सदस्य स्वेच्छा से हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करता है और हिंदू परंपराओं के अनुसार विवाह करता है, तो उसे हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने जोर देकर कहा कि ऐसे मामलों में संबंधित व्यक्ति को केवल उसकी जनजातीय पहचान के आधार पर इस कानून के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता।
न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने 3 फरवरी को दिए अपने फैसले में एक परिवार न्यायालय के उस पुराने आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक दंपत्ति की आपसी सहमति से तलाक की याचिका खारिज कर दी गई थी। परिवार न्यायालय ने इस आधार पर हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13बी के तहत आवेदन को नामंजूर किया था कि पति अनुसूचित जनजाति श्रेणी से संबंधित है। उच्च न्यायालय ने इस तर्क को पलटते हुए कहा कि चूंकि पति ने स्वेच्छा से हिंदू परंपराओं, संस्कारों और रीति-रिवाजों को अपनाया है, इसलिए उन पर 1955 के अधिनियम के प्रावधान लागू होंगे।
इस मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो इस दंपत्ति का विवाह साल 2009 में संपन्न हुआ था। दोनों पक्षों ने स्वीकार किया कि उनकी शादी पूरी तरह से हिंदू रीति-रिवाजों और सप्तपदी जैसी धार्मिक रस्मों के साथ पूरी हुई थी। विवाह के कुछ समय बाद वे अलग रहने लगे और बाद में उन्होंने आपसी सहमति से विवाह विच्छेद के लिए आवेदन किया। जब परिवार न्यायालय ने उनकी अर्जी खारिज कर दी, तब उन्होंने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। दंपत्ति के वकील ने दलील दी कि जब दोनों पक्ष पहले ही यह कह चुके हैं कि वे हिंदू परंपराओं का पालन करते हैं, तो परिवार न्यायालय को आवेदन तकनीकी आधार पर खारिज नहीं करना चाहिए था।
मामले की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने कई गहरी टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने कहा कि हिंदू कानून के तहत विवाह केवल एक नागरिक अनुबंध नहीं है, बल्कि यह पति और पत्नी के बीच एक पवित्र संस्कार और आध्यात्मिक व सामाजिक मिलन है। अदालत ने यह भी माना कि अनुसूचित जनजातियों के ढांचे के भीतर विवाह का अपना एक अलग सामाजिक-कानूनी स्थान है, जो हिंदू विवाह अधिनियम जैसे संहिताबद्ध कानूनों से भी पुराना है। जनजातीय समुदायों की अपनी प्रथागत विधियां और परंपराएं होती हैं, जिन्हें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13(3)(ए) और अनुच्छेद 342 के तहत संरक्षण प्राप्त है।
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2(2), जो कहती है कि यह अधिनियम अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर लागू नहीं होगा, की व्याख्या करते हुए उच्च न्यायालय ने इसे एक 'सुरक्षात्मक उपाय' बताया न कि 'बहिष्करण का जरिया'। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि अधिनियम को किसी अधिसूचित जनजाति के सदस्य पर जबरन लागू करने की कोशिश की जाती है, तो वह सदस्य धारा 2(2) का लाभ उठाकर आपत्ति जता सकता है। लेकिन, यदि वह सदस्य खुद को हिंदू बताते हुए और हिंदू प्रथाओं का पालन करते हुए स्वेच्छा से अदालत के अधिकार क्षेत्र में आता है, तो उसे इस कानून का लाभ लेने से शुरुआती स्तर पर ही नहीं रोका जा सकता।
पीठ ने अपने निर्णय में आगे कहा कि जब पति एक 'हिंदूकृत' आदिवासी है और पत्नी गैर-आदिवासी हिंदू है, और दोनों ने सप्तपदी सहित सभी हिंदू संस्कारों के साथ विवाह किया है, तो उन्हें पारंपरिक अदालतों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। धारा 2(2) का मुख्य उद्देश्य जनजातीय समुदायों की अपनी परंपराओं की रक्षा करना है, न कि उन पर पाबंदी लगाना। चूंकि इस मामले में दोनों पक्ष 1955 के अधिनियम की धारा 7 के अनुसार विवाह कर चुके हैं और हिंदू जीवनशैली अपना चुके हैं, इसलिए उनका आवेदन स्वीकार किया जाना अनिवार्य था।
अंततः, उच्च न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए परिवार न्यायालय के फैसले को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने अब इस मामले को वापस परिवार न्यायालय भेज दिया है और निर्देश दिया है कि आपसी सहमति से तलाक के इस आवेदन पर कानून के अनुसार और योग्यता के आधार पर शीघ्र निर्णय लिया जाए। इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि व्यक्तिगत धार्मिक आचरण और अपनाई गई परंपराएं कानूनी अधिकारों के निर्धारण में अहम भूमिका निभाती हैं।
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