असम: आरक्षित वन क्षेत्रों में बसे आदिवासी गांवों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, जमाबंदी सत्यापन पूरा होने तक बेदखली पर लगी रोक

जमाबंदी सत्यापन तक नहीं उजड़ेंगे घर: सुप्रीम कोर्ट ने वन विभाग और राजस्व अधिकारियों की संयुक्त समिति को सौंपी जांच, 70 साल से रह रहे परिवारों को मिली सुरक्षा।
Assam Forest Eviction, Tribal Rights.
असम के वन निवासियों के लिए SC का बड़ा आदेश! जमाबंदी सत्यापन तक बेदखली पर लगी रोक। जानिए कोर्ट ने अतिक्रमण हटाने के लिए क्या नई शर्तें तय की हैं।(Ai Image)
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नई दिल्ली/गुवाहाटी: असम के आरक्षित वन क्षेत्रों में बरसों से रह रहे आदिवासी परिवारों के लिए एक बड़ी खबर सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट ने इन इलाकों में चल रहे बेदखली अभियान (Eviction Drive) पर तत्काल प्रभाव से 'यथास्थिति' (Status quo) बनाए रखने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब तक 'जमाबंदी रजिस्टरों' का सत्यापन पूरा नहीं हो जाता और वैध निवासियों की पहचान सुनिश्चित नहीं कर ली जाती, तब तक किसी को भी वहां से हटाया नहीं जाएगा।

इस महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान असम सरकार ने शीर्ष अदालत को सूचित किया है कि निवासियों के दावों की गहन जांच के लिए राजस्व और वन अधिकारियों की एक संयुक्त समिति का गठन किया जाएगा।

वैध निवासियों के अधिकारों की सुरक्षा

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ तौर पर कहा कि वन क्षेत्र के भीतर किसी ग्राम पंचायत का कब्जा तब तक स्वीकार्य है, जब तक कि वन विभाग द्वारा बनाए गए जमाबंदी रजिस्टर में उसके पर्याप्त प्रमाण मौजूद हों। इसके अलावा, अदालत ने वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act) के प्रावधानों को भी रेखांकित किया।

कोर्ट ने निर्देश दिया है कि जो व्यक्ति 'अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006' के तहत मान्यता प्राप्त हैं, वे वन भूमि पर रहने के लिए कानूनी रूप से अधिकृत हैं और उन्हें वहां से बेदखल नहीं किया जा सकता।

क्या है पूरा मामला और किसकी बेंच ने की सुनवाई?

यह निर्देश जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने जारी किया। पीठ उन जनहित याचिकाओं (PILs) के एक समूह पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें असम के विभिन्न जिलों में बड़े पैमाने पर चलाए जा रहे बेदखली अभियानों को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि प्रशासन की ये कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन करती है और इससे लंबे समय से वहां बसे परिवारों के विस्थापित होने का खतरा पैदा हो गया है।

पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने का आश्वासन

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि राज्य सरकार द्वारा अतिक्रमण हटाने के लिए अपनाई जा रही प्रक्रिया में सुरक्षा के पर्याप्त उपाय शामिल हैं और यह निष्पक्षता व उचित प्रक्रिया के सिद्धांतों का पालन करती है। अदालत ने सॉलिसिटर जनरल के उस आश्वासन को भी रिकॉर्ड पर लिया, जिसमें कहा गया कि पूरी प्रक्रिया को निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ तरीके से लागू किया जाएगा।

बेदखली से पहले अपनानी होगी यह प्रक्रिया

तय की गई प्रक्रिया के अनुसार, सबसे पहले वन और राजस्व अधिकारियों की एक समिति बनाई जाएगी। इसके बाद कथित अवैध कब्जाधारियों को नोटिस जारी किए जाएंगे और उन्हें अपने दस्तावेजी सबूत पेश करने का पूरा मौका दिया जाएगा। केवल अतिक्रमण की पुष्टि होने के बाद ही बेदखली की कार्रवाई की जाएगी।

यदि जांच में यह पाया जाता है कि कब्जाधारी अधिसूचित वन क्षेत्र से बाहर रह रहे हैं, तो उनके मामलों को राजस्व विभाग को भेज दिया जाएगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी बेदखली से पहले एक विस्तृत 'सकारण आदेश' (Speaking Order) पारित करना होगा और प्रभावित लोगों को 15 दिन का नोटिस देना अनिवार्य होगा।

किन क्षेत्रों पर पड़ेगा असर?

यह मामला मुख्य रूप से दोयांग (Doyang), साउथ नंबार (South Nambar), जमुना मदुंगा (Jamuna Madunga), बारपानी (Barpani), लुटुमाई (Lutumai) और गोलाघाट (Golaghat) के आरक्षित वनों में स्थित गांवों से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि उनके परिवार इन इलाकों में पिछले 70 वर्षों से भी अधिक समय से निवास कर रहे हैं। उन्होंने गुवाहाटी उच्च न्यायालय के पहले के निर्देशों का हवाला देते हुए, जिसमें संरक्षण और निवासियों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की बात कही गई थी, एकमुश्त बेदखली के बजाय संरचित सुरक्षा उपायों की मांग की थी।

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