ओडिशा: दलित रसोइया की नियुक्ति हुई तो ग्रामीणों ने बच्चों को भेजना बंद कर दिया, 3 महीने से बंद पड़ा है आंगनवाड़ी केंद्र

ओडिशा के राजनगर ब्लॉक में जातिगत भेदभाव का काला सच: शर्मिष्ठा सेठी की नियुक्ति के बाद सवर्णों ने बच्चों को रोका, प्रशासन की कोशिशें अब तक नाकाम।
Kendrapara Anganwadi, Dalit Cook Boycott
ओडिशा के केंद्रपाड़ा में जातिवाद ने छीना बच्चों का निवाला। दलित रसोइया की नियुक्ति पर ग्रामीणों का बहिष्कार, 3 महीने से आंगनवाड़ी वीरान।फोटो साभार- इंटरनेट
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केंद्रपाड़ा: समाज कितना भी आधुनिक होने का दावा क्यों न कर ले, जातिवाद की जड़ें आज भी कितनी गहरी हैं, इसका जीता-जागता और दुखद उदाहरण ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले में देखने को मिला है। यहाँ एक आंगनवाड़ी केंद्र में एक शिक्षित दलित युवती को रसोइया (हेल्पर) के पद पर नियुक्त किया गया, जिसके विरोध में ग्रामीणों ने अपने बच्चों को वहां भेजना ही बंद कर दिया। इस सामाजिक बहिष्कार के चलते पिछले लगभग तीन महीनों से यह केंद्र वीरान पड़ा है और बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा व पोषण अधर में लटक गया है।

क्या है पूरा मामला?

यह घटना राजनगर ब्लॉक की घड़ियामाल ग्राम पंचायत के नुआगांव की है। प्रशासन ने 20 नवंबर, 2025 को शर्मिष्ठा सेठी नामक एक स्नातक पास युवती को आंगनवाड़ी सहायिका-सह-रसोइया (Helper-cum-Cook) के पद पर नियुक्त किया। शर्मिष्ठा का दलित समुदाय से होना गांव के कुछ लोगों को नागवार गुजरा।

मीडिया के हवाले से शर्मिष्ठा बताती हैं, "मेरी नियुक्ति के तुरंत बाद ही ग्रामीणों ने केंद्र का बहिष्कार करना शुरू कर दिया। वे बच्चों के लिए सत्तू और अंडे जैसे मुफ्त राशन भी नहीं ले रहे हैं। मेरा परिवार बहुत गरीब है और मुझे यह नौकरी काफी संघर्ष के बाद मिली थी। मैं शिक्षिका बनना चाहती थी, लेकिन मेरी गुहार किसी ने नहीं सुनी।"

जातिगत भेदभाव का कड़वा सच

शर्मिष्ठा ने सीधा आरोप लगाया है कि यह बहिष्कार केवल जातिगत पूर्वाग्रह के कारण है। उन्होंने कहा, "वे अपने बच्चों को सिर्फ इसलिए नहीं भेज रहे क्योंकि मैं दलित हूं। समाज भले ही आगे बढ़ गया हो, लेकिन अगर हम आज भी जातिवाद से चिपके रहेंगे तो प्रगति कैसे करेंगे?"

इस गांव में करीब 45 परिवार रहते हैं, जिनमें 7 दलित परिवार भी शामिल हैं। विडंबना यह है कि गांव की समिति, जिसमें अधिकतर सवर्ण सदस्य हैं, ने कथित तौर पर फैसला सुनाया कि बच्चे दलित महिला के हाथ का बना खाना नहीं खाएंगे। रिपोर्ट के अनुसार, समिति ने दलित परिवारों को भी निर्देश दिया है कि वे अपने बच्चों को केंद्र न भेजें।

अधिकारियों और कर्मियों की बेबसी

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता लिजारानी पांडव (जो स्वयं सवर्ण समुदाय से हैं) ने शर्मिष्ठा की बातों की पुष्टि की है। उन्होंने बताया, "केंद्र में 20 बच्चे नामांकित हैं, लेकिन अभी कोई नहीं आ रहा। हम घर-घर गए, लेकिन कोई भी अभिभावक अपने बच्चों को भेजने को तैयार नहीं है।"

गांव के सरपंच शैलेंद्र मिश्रा ने कहा कि उन्होंने ग्रामीणों से अपील की थी, लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं सुनी। स्थिति यह है कि गर्भवती महिलाएं भी केंद्र नहीं आ रही हैं, जिससे वे महत्वपूर्ण स्वास्थ्य लाभों से वंचित हो रही हैं।

प्रशासन की पहल और कानूनी पक्ष

मामले के तूल पकड़ने पर केंद्रपाड़ा जिला प्रशासन हरकत में आया है। सीडीपीओ (CDPO) दीपाली मिश्रा ने बताया कि रसोइया के पद के लिए 2024 और 2025 में विज्ञापन दिया गया था, जिसमें शर्मिष्ठा एकमात्र आवेदक थीं। उन्होंने कहा, "मैंने ग्रामीणों से बात की है। वे खुलकर जाति का कारण नहीं बता रहे, लेकिन परोक्ष रूप से विरोध इसी बात का है। हम बच्चों की वापसी सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं।"

वहीं, दलित समाज के जिला अध्यक्ष नगेन जेना ने प्रशासन पर ढिलाई का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश (20 अप्रैल, 2004 - PUCL बनाम भारत सरकार) की याद दिलाई, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि मिड-डे मील रसोइए के रूप में SC/ST उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

केंद्रपाड़ा के जिला कलेक्टर रघुराम आर. अय्यर ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला समाज कल्याण अधिकारी से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि दलित युवती की नियुक्ति के बहाने बच्चों को केंद्र आने से रोकने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी और मामले को सौहार्दपूर्ण तरीके से सुलझाने के प्रयास जारी हैं।

फिलहाल, शर्मिष्ठा जिसे 5,000 रुपये का मासिक मानदेय मिलता है, बच्चों के इंतज़ार में खाली केंद्र में अपनी ड्यूटी बजा रही हैं, जबकि गांव के लगभग 60 बच्चों और लाभार्थियों का भविष्य जातिवाद की भेंट चढ़ रहा है।

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