Assam Elections 2026: आदिवासियों के अधिकारों की गारंटी दो, वरना भाजपा को वोट नहीं- असम में आदिवासी संगठन का एलान

ऑल असम सन्स ऑफ द सॉयल इंडिजिनस कोचारी समाज ने एक बयान में कहा - "आदिवासी समुदायों को पर्याप्त अवसर, सुविधाएं या उचित पहचान नहीं मिल रही है। इसलिए हम सभी आदिवासी लोगों से एकजुट होने और इस चुनाव में भाजपा का समर्थन न करने का आह्वान करते हैं।"
चुनाव प्रचार के दौरान जन समूह से मिलते मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा
चुनाव प्रचार के दौरान जन समूह से मिलते मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमाफाइल फोटो (x प्लेटफार्म)
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गुवाहाटी- असम में 9 अप्रैल को होने वाले चुनावों से पहले एक आदिवासी संगठन, 'ऑल असम सन्स ऑफ द सॉयल इंडिजिनस कोचारी समाज' ने स्थानीय आदिवासी समुदायों से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का बहिष्कार करने या उसे वोट न देने की अपील की है।

संगठन ने 6 अप्रैल को जारी एक बयान में भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार पर आदिवासी समुदायों के अधिकारों की उपेक्षा और उन्हें कमजोर करने का आरोप लगाया। बयान में कहा गया कि सरकार छह समुदायों को 'संरक्षित वर्ग' में रखकर उनकी मूल पहचान को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।

इन छह समुदायों में आदिवासी (चाय जनजाति), चुटिया, कोच-राजबोंगशी, मटक, मोरान और ताई-आहोम शामिल हैं। मौजूदा आदिवासी समूहों की मांग है कि सरकार इन छह समुदायों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने से पहले यह गारंटी दे कि उनके अपने अधिकारों और विशेषाधिकारों में कोई कमी नहीं की जाएगी।

संगठन का आरोप है कि भाजपा सरकार ने छह समुदायों को एसटी दर्जा देने की प्रक्रिया में मौजूदा आदिवासी समूहों के अधिकारों की रक्षा के लिए कोई ठोस गारंटी नहीं दी है। इसके अलावा, सरकार की नीतियों से उनकी राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक उपेक्षा हुई है, जिसके खिलाफ वे एकजुट होकर भाजपा को वोट न देने का निर्णय ले रहे हैं।

संगठन की ओर से मानस राभा, निल्सिंग मुशाहरी और पबित्रा सोनोवाल द्वारा संयुक्त रूप से जारी बयान में कहा गया, "भाजपा और उसकी सरकार सांप्रदायिक और आदिवासी विरोधी प्रकृति की है। भाजपा का नेतृत्व सभी वर्गों के लिए काम करने का दावा तो करता है, लेकिन उसकी वास्तविक नीतियों और कार्यों ने आदिवासी समुदायों के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक अधिकारों को कमजोर किया है।"

बयान में आगे कहा गया, "वादों के बावजूद, आदिवासी समुदायों को पर्याप्त अवसर, सुविधाएं या उचित पहचान नहीं मिल रही है। इसलिए हम सभी आदिवासी लोगों से एकजुट होने और इस चुनाव में भाजपा का समर्थन न करने का आह्वान करते हैं।"

संगठन का आरोप है कि भाजपा सरकार ने छह समुदायों को एसटी दर्जा देने की प्रक्रिया में मौजूदा आदिवासी समूहों के अधिकारों की रक्षा के लिए कोई ठोस गारंटी नहीं दी है। इसके अलावा, सरकार की नीतियों से उनकी राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक उपेक्षा हुई है, जिसके खिलाफ वे एकजुट होकर भाजपा को वोट न देने का निर्णय ले रहे हैं।

चाय की राजनीति

असम चुनाव में 'चाय जनजाति' के वोटों के लिए जंग छिड़ी हुई है। लगभग 70 लाख की आबादी वाला यह समुदाय राज्य के 20% मतदाताओं को प्रभावित करता है। इसी कड़ी में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी बिस्वनाथ में तेहारू गौर के लिए प्रचार कर रहे थे, जो 'झारखंड मुक्ति मोर्चा' (JMM) के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। सभी कद्दावर नेता चाय बागान वाली सीटों पर दौरा कर वोटर्स को अपने पक्ष में करने का प्रयास कर रहे हैं। राहुल गांधी ने हालिया दौरे में चाय मजदूरों को 450 रुपये दैनिक मजदूरी और छह समुदायों (चाय जनजाति सहित) को एसटी दर्जा देने का वादा किया। उधर, हिमंत बिस्वा सरमा ने सोरेन के दौरे का स्वागत करते हुए कहा कि उन्हें असम के विकास को देखने का मौका मिलेगा।

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