
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए लखीमपुर खीरी में थारू जनजाति के सदस्यों के वन अधिकार दावों को खारिज करने वाले जिला स्तरीय समिति के आदेश को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने संबंधित अधिकारियों को मामले की फिर से सुनवाई करने और उचित समय के भीतर एक नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति शेखर बी सराफ और न्यायमूर्ति एके चौधरी की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए एक बड़ी राहत भी दी है। पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि जब तक इस मामले में प्रशासन द्वारा कोई नया फैसला नहीं लिया जाता, तब तक सभी याचिकाकर्ताओं को उनके मौजूदा वन अधिकारों का लाभ मिलता रहेगा।
यह आदेश गैर-सरकारी संगठन (एन०जी०ओ०) 'उदासा' और लखीमपुर खीरी के पलिया कलां क्षेत्र में रहने वाले थारू समुदाय के 101 सदस्यों द्वारा दायर एक रिट याचिका पर आया है। अनुसूचित जनजाति से ताल्लुक रखने वाले इन याचिकाकर्ताओं ने 15 मार्च, 2021 के उस आदेश को अदालत में चुनौती दी थी, जिसमें उनके सामुदायिक वन अधिकारों के दावों को प्रशासन द्वारा खारिज कर दिया गया था।
मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद अदालत ने पाया कि जिला स्तरीय समिति ने वन अधिकार अधिनियम, 2006 की मूल मंशा और उसके प्रावधानों पर उचित रूप से विचार ही नहीं किया। अदालत के अनुसार, समिति ने अपना फैसला सुनाते समय पूरी तरह से केवल सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2000 के एक अंतरिम आदेश को ही आधार बनाया था।
इस दौरान खंडपीठ ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि वन अधिकार अधिनियम का मुख्य उद्देश्य वनवासी समुदायों के पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देना है। इसके अलावा, उनकी आजीविका और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना भी इस कानून का प्राथमिक लक्ष्य है, जिसे किसी भी परिस्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने संबंधित प्राधिकरण को सख्त निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा है कि प्राधिकरण को सभी याचिकाकर्ताओं को अपना पक्ष रखने और सुनवाई का पूरा अवसर प्रदान करना होगा। इसके बाद, सभी प्रासंगिक तथ्यों तथा रिकॉर्ड की गहराई से जांच करने के बाद ही एक तर्कसंगत और उचित आदेश पारित किया जाना चाहिए।
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