मणिपुर में हालात फिर तनावपूर्ण: 12 जिलों में बंदी से सब कुछ बंद, जानिए आज क्यों हो रहा है इतना बड़ा विरोध-प्रदर्शन?

मणिपुर में बम हमलों और हत्याओं के विरोध में 12 जिलों में शटडाउन, खोंगजोम दिवस पर बड़े प्रदर्शन की चेतावनी।
कुकी संगठनों द्वारा मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में एक प्रदर्शन के दौरान की तस्वीर.
कुकी संगठनों द्वारा मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में एक प्रदर्शन के दौरान की तस्वीर.फोटो- राजन चौधरी, द मूकनायक
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नई दिल्ली: अधिकारियों के अनुसार, बुधवार को विभिन्न जातीय संगठनों द्वारा बुलाए गए बंद के कारण मणिपुर के 16 में से 12 जिलों में जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ।

बिष्णुपुर जिले के त्रोंगलाओबी में 7 अप्रैल को हुए बम हमले के विरोध में जॉइंट एक्शन कमेटी (जेएसी) ने पांच दिवसीय बंद का आह्वान किया है। इस हमले में दो बच्चों की जान चली गई थी। बुधवार को इस बंद के चौथे दिन घाटी के सभी पांचों जिलों में इसका व्यापक असर देखने को मिला।

इस आंदोलन के तहत प्रदर्शनकारियों ने कई जगहों पर सड़कें जाम कर दीं। अधिकारियों ने बताया कि इंफाल पश्चिम जिले के सगोलबंद और पात्सोई समेत कई इलाकों से सड़क नाकेबंदी की खबरें सामने आई हैं।

इसके अलावा छह पहाड़ी जिलों के नागा बहुल इलाकों में भी यूनाइटेड नागा काउंसिल द्वारा बुलाए गए तीन दिवसीय पूर्ण बंद के दूसरे दिन सामान्य जनजीवन ठप रहा। यह बंद उखरूल जिले के टीएम कसम में 18 अप्रैल को घात लगाकर किए गए हमले में दो तांगखुल नागा लोगों की हत्या के विरोध में बुलाया गया था।

बंद समर्थकों ने नोनी जिले और इंफाल पूर्व के यािंगंगपोकपी में भी सड़कें अवरुद्ध कर दीं। अधिकारियों का कहना है कि इस वजह से केंद्रीय सुरक्षा बलों की आवाजाही में भारी बाधा उत्पन्न हुई।

वहीं चुराचांदपुर जिले में जोमी समन्वय समिति के तत्वावधान में विभिन्न संगठनों द्वारा बुलाए गए 13 घंटे के बंद ने दैनिक गतिविधियों को रोक दिया। यह विरोध प्रदर्शन भाजपा विधायक वुंगजागिन वाल्टे के लिए न्याय की मांग को लेकर था।

मई 2023 में जातीय हिंसा की शुरुआत में भीड़ के हमले में विधायक वाल्टे गंभीर रूप से घायल हो गए थे और उनका इलाज चल रहा था। बाद में उनकी हालत बिगड़ गई और इस साल फरवरी में गुरुग्राम के एक निजी अस्पताल में उनका निधन हो गया।

इन सभी प्रभावित जिलों में स्कूल, बैंक, बाजार और ज्यादातर व्यावसायिक प्रतिष्ठान पूरी तरह बंद रहे। इसके साथ ही सार्वजनिक परिवहन भी सड़कों से नदारद रहा।

कई जगहों पर केवल दवा की दुकानें ही खुली देखी गईं। सड़कें सुनसान पड़ी थीं और सरकारी कार्यालयों में भी कर्मचारियों की उपस्थिति बेहद कम दर्ज की गई।

विरोध का यह सिलसिला यहीं नहीं रुकने वाला है। मणिपुर के कई मैतेई नागरिक समाज संगठनों के एक प्रमुख निकाय ने गुरुवार को थौबल जिले में प्रदर्शन करने की घोषणा की है। यह प्रदर्शन बंदूक और बम हमलों में शामिल लोगों के खिलाफ उचित कार्रवाई और विस्थापितों के पुनर्वास जैसे प्रमुख मुद्दों को हल करने में राज्य सरकार की कथित विफलता के खिलाफ किया जाएगा।

समन्वय समिति ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी (कोकोमी) भी त्रोंगलाओबी में हुए हालिया बम हमले का कड़ा विरोध करेगी। इसके साथ ही 7 अप्रैल को बिष्णुपुर जिले के गेलमोल के पास एक सीआरपीएफ शिविर पर भीड़ के हमले में तीन लोगों की मौत को लेकर भी यह संगठन अपना रोष व्यक्त करेगा।

यह विरोध प्रदर्शन खोंगजोम दिवस के अवसर पर आयोजित किया जाएगा। यह दिन हर साल 23 अप्रैल को 1891 के ऐतिहासिक एंग्लो-मणिपुरी युद्ध में अपने प्राणों की आहुति देने वाले मणिपुरी नायकों की वीरता और बलिदान की याद में मनाया जाता है।

कोकोमी के प्रवक्ता शांता नाहकपम ने बुधवार को स्पष्ट किया कि लोग थौबल में खोंगजोम युद्ध स्मारक परिसर के रास्ते में अपना विरोध दर्ज कराएंगे। इसी रास्ते से 23 अप्रैल को विधायक स्मारक स्थल जाने वाले हैं। न्याय की मांग करते हुए प्रदर्शनकारी तख्तियां लेकर नारेबाजी करेंगे।

प्रवक्ता ने यह भी कहा कि 3 मई, 2023 को मैतेई और कुकी समुदायों के बीच जातीय हिंसा शुरू होने के बाद से कई लोगों की जान जा चुकी है। उन्होंने बंदूक हमलों में उग्रवादी समूहों की भूमिका और आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों के पुनर्वास जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार की कथित चुप्पी पर गंभीर सवाल उठाए।

संगठन ने प्रशासन से जवाबदेही की सख्त मांग की है। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी है कि सरकार से आम जनता का भरोसा लगातार उठ रहा है।

गुरुवार की सुबह थौबल के खोंगजोम युद्ध स्मारक में आयोजित होने वाले कार्यक्रम में राज्यपाल अजय कुमार भल्ला, मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह, राज्य के मंत्री और कई विधायक शामिल होने वाले हैं।

घाटी में रहने वाले मैतेई समुदाय और पहाड़ी जिलों में रहने वाले कुकी समुदाय के बीच जारी इस जातीय हिंसा के कारण मई 2023 से अब तक कम से कम 260 लोगों की मौत हो चुकी है। इसके अलावा हजारों लोगों को अपना घर छोड़कर बेघर होना पड़ा है।

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